इस जॉच रिपोर्ट के संकेत घातक है.


लिंगदोह समिति की सिफारिशों के बाद राजस्थान में छात्रसंघों के चुनाव हुए। 6 बर्षो के बाद भी चुनाबों को लेकर छात्रों में कोई उत्साह नहीं दिखा था, रही सही कसर चुनाव के बाद प्रशासन और प्रवंधकों के दमन ने पूरी कर दी। इस बीच लोहागढ के नाम से प्रसिद्द भरतपुर जिले का एक छात्रासंघ अध्यक्ष ने हौसला नहीं खोया। उपखंड अधिकारी से लेकर अब अंत में मुख्यमंत्री को खुला पत्र लिखा है। जिसमें ऐसे हालातों में छात्रसंघ चुनावों को बंद करने की बात कही है। छात्रासंघ अध्यक्ष सुमन पटेल की ओर से सिंतबर 2010 में संभागीय आयुक्त भरतपुर को ज्ञापन सौंपकर जॉच कराने की मॉग की थी। इस प्रकरण में तहसीलदार बयाना की जॉच रिपोर्ट यह बताने के लिए काफी है कि शिक्षा के इन आलयों में विधार्थियों का किस प्रकार से शोषण हो रहा है।

प्रदेश में उच्च शिक्षा के लगभग एक हजार कॉलेज है। इन कॉलेजों में एक ओर जहॉ वैधानिक प्रवंधन नहीं है वही विधार्थियों को शिक्षा के नाम पर कोरा कागजी ज्ञान देने की साफ कोशिश की जा रही है। इस एक जॉच रिपोर्ट ने साफ तौर पर संकेत दिया है कि यदि हम ऐसे ही मूकदर्शक विधार्थियों की फौज तैयार करते रहे तो परिणाम घातक होगें। बच्चों में न खेल के प्रति रूचि होगी और न ही संस्कृति की समझ। उनके लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम, शैक्षणिक पत्रिका के कोई मायने नहीं होगें। ऐसे में छात्रांसघ अध्यक्ष सुमन पटेल का मुख्यमंत्री को लिखा खुलापत्र बहुत मायने रखता है, जिसमें लिखा है कि ‘कार्यवाही करो या फिर छात्रसंघों के चुनावों को बंद करों। राजनीति की पहली पाठशाला की ऐसी दुर्गति से तो अच्छा है उन्हें इसका प्रशिक्षण ही नहीं दिया जाए।

25 अगस्त 2010 को छात्रसंघों के चुनाव हुए थे। चुनाब जीतते ही भरतपुर जिले की बयाना तहसील के अग्रसेन कन्या महाविधालय की चुनी गई छात्रासंघ अध्यक्ष सुमन पटेल ने छात्राओं के हितों के लिए संघर्ष करना आरम्भ कर दिया। इस संघर्ष की परिणति के रूप में तहसीलदार बयाना की एक जॉच रिपोर्ट हाल ही में आई है। सीधे तौर पर जॉच रिपोर्ट में छात्रसंघ के तमाम आरोप और मॉगों को सच माना गया है वहीँ कॉलेज प्रशासन और प्रबंधन के पक्ष को हास्प्रप्रद और गुमराह करने वाला। ऐसे में ही उच्च शिक्षा के एक कॉलेज की ये रिपोर्ट बता रही है कि शिक्षा के हमारे तंत्र को व्यवसाईयों ने कैसे कमाई का जरिया बना लिया है।

जुलाई 2010 से छात्रसंघों के चुनावों की चर्चा हुई थी हमने लगातर उस पर अपनी पैनी नजर रखी। 25 अगस्त 2010। इस दिन प्रदेश भर में राजनीति की पहली पाठशाला के लिए 6 वर्ष बाद मतदान किया। युवाओं ने उत्साह के साथ बढचढ कर हिस्सा लिया। उनका उत्साह धीरे धीरे शांत पड़ गया और पडता भी क्यों नहीं? प्राचार्य, प्रबंधन और प्रशासन किसी ने भी उनकी एक न सुनी। इस बीच एक छात्रासंघ अध्यक्ष छात्रा ऐसी भी रही जिसने अनवरत संघर्ष जारी रखा। संभागीय आयुक्त तक अपनी शिकायत को पहुंचाया, वही कॉलेज में लगातार छात्राओं के बीच अपनी सक्रियता बनाये रखी। मजबूरन एक जॉच कराई गई। उपखंड अधिकारी की लीपापोती वाली जॉच के बाद तहसीलदार बयाना ने मौके पर अपनी जॉच की। इस जॉच रिर्पोट में कॉलेज की तस्वीर साफ हो गई है। न तो खेल है,न ही महाविधालय की पत्रिका,स्वास्थ्य के नाम पर औपचारिकता है तो सास्कृतिक, सह्शैक्षनिक गतिविधियॉ कोसों दूर तक नजर नही आ रही। बार्षिक उत्सव तो बर्षो से नहीं कराया गया है। वहीं हर मद में पैसा बराबर लिया जा रहा है। कुल मिलाकर कहा जाये तो ये महाविधालय छात्राओं के लिए शिक्षा के नाम पर कलंक से कम नहीं है। जॉच अधिकारी ने अंत में लिखा भी है ‘‘इस प्रकार छात्राओं,कॉलेज शिक्षकों में समरसता,समंवय का भाव नहीं पाया जाना प्रतीत हुआ है। ऐसी परिस्थितियों में शिक्षा का वातावरण भी नहीं बनता है इस क्रम में निरंतर शिकायतें चली आ रही है’’।

प्रदेष के पूर्वी सिंह द्वार भरतपुर में बयाना एक कस्बा है। कस्बें में कन्याओं का एक निजी महाविधालय अग्रवाल समाज के द्वारा संचालित है। छात्रसंघ चुनावों की आहट के साथ ही इस महाविधालय की छात्राओं का आक्रेाश बाहर निकल आया। सर्वप्रथम 16 अगस्त को रैली निकालकर कस्बा सहित प्रशासन को यह सन्देश दिया कि कॉलेज के अन्दर खाने में सब कुछ ठीक ठाक नहीं है। शिक्षा के इस मन्दिर में कोरा कागजी ज्ञान है। उसे भी देने वाले कुछ तो समकक्ष शिक्षाधारी है। फीस के नाम पर मोटी राशी ली जाती है। उसे भी गतिविधियों के अनुसार दर्शाया जाता है,जबकि होता कुछ भी नहीं है।

छात्रसंघ की ओर से कॉलेज प्रशासन के समक्ष अपनी मॉगे रखी गई। जब महीनों कोई सुनवाई नहीं हुई तो संभागीय आयुक्त को अपनी मॉगों का ज्ञापन 29 सितंबर को सोंपा गया। वैसे देखे तो मॉग भी नहीं कह सकते। छात्राओं ने केवल शिक्षा से जुडे अपने अधिकारों की मॉग की थी। छात्रसंघ के नाम पर लगातार जो राशि ली जा रही है उसका हिसाब।स्वास्थ्य परीक्षण,बार्षिक उत्सव,सांस्कृतिक गतिविधिया,खेल कूद की व्यवस्था,आयोजन और सह्शैक्षनिक रूप में होने वाले अति आवष्यक कार्य जो कभी बर्षो से नहीं कराये कम से कम अब कराये जाये। कॉलेज के स्तर पर भ्रामक जबाब दिये गये। लेकिन रिर्पोट से सब कुछ साफ कर दिया है।

जॉच रिर्पोट के बिन्दु संख्या एक में लिखा है। 16837 रूप्यों में से 11837 का कोई बाउचर या खर्च के बारे में प्रबंधन द्वारा कोई जबाब नहीं दिया गया है। लिहाजा शेष राशि अन्य मद में खर्च किया जाना प्रतीत होता है इसलिए शिकायत सही पाई गई। बिन्दु संख्या एक ये आरम्भ हुआ ये सिलसिला रिपोर्ट के अंत तक और भी तीखे शब्दों में जारी रहा है जो साफ तौर पर कठोर कार्यवाही की मॉग करता नजर आता है। देखते है किसी के कान पर जूँ रेंगती भी है या नहीं।

बिन्दु संख्या दो में महाविधालय पत्रिका का जिक्र है। इसमें इस सत्र का विस्तार से जिक्र किया है। 289 छात्राओं से 14450 रूप्यों की प्राप्ति बताई गई है। जॉच अधिकारी ने साफ लिखा है कि ‘‘छात्राओं की रचनात्मक रचनात्मक कार्य,उत्कृष्ट सेवा,समाज उपयोगी कार्य,सांस्कृतिक सह्शैक्षनिक भ्रमण,बार्षिक उत्सव एंव महाविधालय की उपलब्धियों का उल्लेख करने वाली इस प्रकार की पत्रिका का महाविधालय द्वारा प्रकाशन नहीं किया जा रहा है। जॉच अधिकारी की आगे की टिपण्णी तो और भी गंभीर है जिसमें प्राचार्य द्वारा महाविधालय पत्रिका के रूप में दैनिक समाचार पत्रों को बताने वाले विचार को हास्यप्रद बताया गया है। इस राशि का उपयोग भी महाविधालय द्वारा अपनी मर्जी से व्यय किया जाना बताया गया है।

बिन्दु संख्या तीन में बार्षिक उत्सब की चर्चा है। जॉच अधिकारी ने माना है कि प्रतिवर्ष प्रतिछात्रा पचास रूप्ये लिये जा रहे है। रिपोर्ट में लिखा है कि महाविधालय स्वीकार करता है कि बर्ष 2005 से ऐसा कोई उत्सब आयोजित नहीं किया गया है। ये राषि लाखों में बैठती है। रिपोर्ट में आगे लिखा है कि इस मद में बसूली फीस का खर्च कहॉ किया गया है उसे भी प्राचार्य द्वारा अवगत नहीं कराया गया है।

विन्दु संख्या 4 में लिखा है कि शैक्षणिक सांस्कृतिक गतिविधयों के नाम पर प्रतिवर्ष 150 प्रतिछात्रा लिया जाता रहा है। यह राशि लगभग 50 हजार रुपये वार्षिक होती है। रिपोर्ट में छात्रासंघ अध्यक्ष के हवाले से कहा है कि तीन बर्ष के उसके अध्ययन काल में कभी इस महाविधालय में कुछ भी नहीं कराया गया है जो कुछ भी छात्राओं के लिए इस बर्ष रचनात्मक किया गया है वह छात्रासंघ की राशि में से निकाला जाना संभव हुआ है।जॉच अधिकारी ने आगे साफ किया है कि प्रवंधन ने इस मद के इस बर्ष के 43350 में 21585 रूप्यों का जो खर्चा दर्शाया है उसका भी कोई बाउचर जॉच के लिए प्रस्तुत नहीं किया। जिससे साफ होता है कि इन गतिविधियों के नहीं कराये जाने का छात्रासंघ का आरोप और षिकायत पूरी तरह से सही हैं। जॉच अधिकारी ने साफ किया है कि कॉलेज प्रवंधन द्वारा ऐसे मद की राषि का अन्य किसी मद में खर्च कर ‘‘छात्राओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई है तथा जॉच अधिकारी को भी गलत तथ्य तथ्य व पत्रादि प्रस्तुत किये गये है’’।

बिन्दु संख्या पॉच में स्वास्थ्य परीक्षण के ढकोसले को चिंदी किया गया है। रिपोर्ट बताती है 289 छात्राओं में से 80 का स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाना बताया गया है। जिनमें से न कोई छात्रा अस्वस्थ पाई गई और न ही किसी को कोई उपचार दिया गया। जॉच अधिकारी कहते है ‘‘ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य परीक्षण मात्र एक औपचारिकता है महाविधालय प्रषासन द्वारा इस क्रम में कोई ठोस एंव संतोषजनक जबाब नहीं दिया गया’’।
बिन्दु संख्या 6 में खेल,क्रीडा की चर्चा है। महाविधालय द्वारा प्रतिवर्ष प्रतिछात्रा 100 रूप्ये लेना बताया गया है। चालू सत्र में 28900 की आय दर्षायी गई है। इतनी राषि में से केवल वर्तमान सत्र में 1930 का सामान क्रय किया जाना बताया गया है। इससे पहले कभी कुछ खर्चा खेल या सामान को लेकर कोई खर्चा नहीं किया गया है। जॉच अधिकारी छात्रासंघ अध्यक्ष के हवाले से लिखते है कॉलेज के पास किसी भी खेल गतिविधि के लिए कोई ग्राउंड और सुविधा नहीं है। आगे लिखा है चालू सत्र की शेष राषि का का प्रवंधन द्वारा कोई संतोषजनक जबाब नहीं दिया गया है तथा शेष राशि किस मदद में खर्च की गई है यह भी अवगत नहीं कराया गया है।

जॉच रिपोर्ट में आगे कहीं गई बात बहुत गंभीर है जिसका कि संबंध कॉलेज पर लगने वाले ऐसे आरोपों से है जो लंबे समय से लगते आ रहे है। जातीय भेदभाव। जॉच अधिकारी लिखते है कॉलेज प्राचार्य ने बताया कि छात्राओं कि फीस माफी बावत कोई मापदंड नहीं है। षिक्षण सत्र 2009-10 की फीस माफी की सूची से जॉच अधिकारी ने उद्वत किया है कि छात्रा हर्षिता शर्मा की फीस 60 रूप्ये माफ कि गई है वही पूजा,प्रियका गर्ग और निशा बंसल की पृथक पृथक 4110 रूप्ये की फीस माफ की गई है। जॉच अधिकारी का ये खुलासा साफ करता है कि कॉलेज प्रवंधन छात्राओं की फीस माफी करने में किस तरह से खुलेआम जातिगत भेदभाव का व्यवहार करता है। जॉच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में कॉलेज प्रवंधन पर बर्षो से लगे आ रहे एक और आरोप को पुष्ट किया है। केवल अग्रवाल समाज के लोगों को ही प्रवंध समिति में शामिल किया जाना। इसकी जॉच के लिए जॉच अधिकारी को षिक्षण सत्र 2009-10 के लिए प्रवंध समिति की सूची उपलब्ध कराई गई है। उस समिति का गठन भी 28.11.10 की मीटिग में किया जाना बताया है। इसमें भी 18 सदस्य केवल अग्रवाल समाज के है। प्रवंध समिति के गठन के विधान के अनुसार यह किसी भी स्थिति में सही नहीं है। जिस विष्वविधालय प्रतिनिधि का चयन किया गया है उसका भी अनुमोदन नहीं हो पाया है।

जॉच अधिकारी की इस संवंध में की गई टिपण्णी गंभीर है। वो लिखते है‘‘ प्रवंध समिति में नियमों के विपरीत एक ही जाति के सदस्यों का बर्चस्व है। पूर्व की गठित समिति की सूची भी उपलब्ध नहीं कराई गई है’’। यहॉ भी मामले में गंभीर लोच है। जॉच अधिकारी से पूर्व महाविधालय ने संभागीय आयुक्त भरतपुर तक को भ्रामक जबाब दिये है। जो प्रवंधन समिति जॉच अधिकारी को 09-10 की दर्षायी गई है दरअसल वो है नहीं। इस प्रवंध समिति का गठन 18 जून 2006 को हुआ है। और तभी से ये पूर्णत नियमों के विरुद्ध गठित समिति आज दिन तक काम कर रही है। इसका गठन ही अवैधानिक नहीं,कार्यकाल भी वैधानिक नहीं है। पॉच साल से लगातार एक ही प्रवंध समिति जो कि अवैधानिक है कॉलेज का संचालन किये जा रही है।

सितंबर 2010 से चली प्रक्रिया अप्रेल 2011 में यहॉ तक पहुंची है। जिस छात्रसंघ और छात्राओं ने इसके लिए संघर्ष किया उनमें से अधिकांष की षिक्षा इस महाविधालय से पूरी हो गई है। कुछ शेष है। लेकिन ऐसे में बडा सवाल ये है कि क्या प्रषासन के कान पर जूँ रेगेंगी। आधे अधूरे अक्षर ज्ञान के रूप में नारकीय शिक्षा पा रही इन छात्राओं का आगे कुछ भला हो पायेगा। निजीकरण के रूप में षिक्षा की दुकाने खोले जा रही सरकारें और उनकी नौकरशाही की नींद कहीं खुलेगी भी या फिर सब कुछ यों ही कागजों में सिमटता जायेगा। यदि ऐसा होता रहा तो आने वाली पीढियों से जो उम्मीदें हम लगायें बैठे है वो कभी पूरी नहीं हो पाऐगी। छात्राओं को जब कॉलेज स्तर की शिक्षा में खेल,सांस्कृतिक, सह्शैक्षनिक गतिविधियों,पत्रिका प्रकाशन जैसी महत्वपूर्ण गतिविधियों तक के आयोजन के लिए फीस देने पर प्रकाशन के चक्कर लगाने पड रहे हों तो उनसे उम्मीद करना बेमानी ही है। इस पूरे मामले पर छात्रासंघ अध्यक्ष सुमन पटेल का कहना है कि इतने पर भी कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं हुई तो उसका लोकतंत्र और उसके चलाने वालों,सरकारी मशीनरी पर से विशवास पूरी तरह से उठ जायेगा।



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राजीव शर्मा
भरतपुर
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