उत्तराखण्ड में चौराहे पर भाजपा, जिम्मेदार कौन - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 22 अप्रैल 2012

उत्तराखण्ड में चौराहे पर भाजपा, जिम्मेदार कौन

गोवा, पंजाब, मुंबई महानगर पालिका और अब दिल्ली नगर निगम चुनाव। एक के बाद एक मिलती सफलताओं ने भारतीय जनता पार्टी की टूटती उम्मीदों में प्राण फूंक दिए हैं। जाहिर है, इन सफलताओं में पार्टी 2014 में दिल्ली की कुर्सी तक पहुंचने के सपने भी देखने लगी है, लेकिन दुर्भाग्य से कुछ राज्यों में पार्टी के मौजूदा हालात इस कदर बदतर हो चुके हैं, कि ये सुनहरे सपने कब टूट कर बिखर जाएं मालूम नहीं। इसका ताजा उदाहरण है उत्तराखण्ड। 

उत्तराखण्ड में भातरीय जनता पार्टी के हालात कुछ ठीक नहीं हैं, या यूं कहें कि इस पर्वतीय राज्य में पार्टी गर्त में जाने लगी है। ये वही राज्य है जहां महज तीन महीने पहले तक भाजपा का झंठा बुलंद था। अब इसे पार्टी की सांगठानिक नीतियों का दुष्परिणाम कहें या फिर हठी नेताओं का कुचक्र। लेकिन राज्य की राजनीति में पार्टी संगठन दिन प्रति दिन कमजोर होता जा रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि पार्टी के ही कुछ वरिष्ठ कहे जाने वाले नेता पार्टी को बर्बाद करने में जुटे हैं। पार्टी के कुछ केन्द्रीय नेतागण भी इस काम में मदद कर रहे हैं और आलाकमान आंखें मूंदे बैठा है। 

पार्टी की हालिया सियासी गतिविधियों पर नजर डालें तो राज्य में पार्टी के दो बड़े नेता पार्टी के लिए नासूर बनते जा रहे हैं। पार्टी को इन्हें न तो उगलते बन रहा है और न निगलते। जहां तक बात करें इन दोनों नेताओं की तो राज्य में कभी भी ऐसा समय नहीं आया जब इन दोनों नेताओं ने पार्टी को मजबूती देने का काम किया हो। जब भी मौका मिला इन्होंने दबाव और दुष्प्रचार की राजनीति अपना हित साधने का प्रयास ही किया। 

भगत सिंह कोश्यारी उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं तथा वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं। कोश्यारी ने हमेशा ही पार्टी को अस्थिर करने की कोशिेशें की। 2000 में जब पार्टी ने नित्यानंद स्वामी को अंतरिम सरकार का मुखिया मनोनीत किया तो कोश्यारी ने पहले ही दिन से स्वामी के खिलाफ झंडा बुलंद किए रखा। आखिरकार छह महीने के बाद पार्टी पर दबाव बनाकर कोश्यारी ने स्वामी को कुर्सी से हटवाकर खुद मुख्यमंत्री बन बैठे। 2002 को विधानसभा चुनाव पार्टी ने कोश्यारी के नेतृत्व में लड़ा। जिसमें पार्टी को करारी हार का मुहं देखना पड़ा। भाजपा को महज 19 सीट देकर जनता ने सीधा संदेश दिया कि कोश्यारी को मुखिय बनाने का फैसला गलत था।

इसके बाद 2007 में जब पार्टी सत्ता में आई तो खंडूडी को मुख्यमंत्री बनाया गया। इस बार भी कोश्यारी ने पार्टी के इस फैसले के खिलाफ आवाज बुलंद की। वे लगातार खंडूडी को अस्थिर करने में जुटे रहे। यहां तक कि कोश्यारी ने खंडूडी को हटवाने के लिए राज्य सभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया। आखिरकार 2009 में पार्टी ने खंडूडी को पद से हटा दिया। परंतु इस बार पार्टी ने 2002 की गलती से सबक लेकर पार्टी की कमान कोश्यारी के बजाय, राज्य के पहले वित्त मंत्री रहे निशंक को सौंप दी। कोश्यारी फिर भी चुप नहीं बैठे, उन्होंने पार्टी को अस्थिरता का अभियान निशंक के खिलाफ भी तेज कर दिया। आश्चर्य की बात यह थी कि इस बार कोश्यारी का साथ खुद खंडूडी ने भी दिया। अंदरूनी गुटबाजी तथा दोनों नेताओं की दबाव की राजनीति के चलते पार्टी ने निशंक को पद से हटाने का फैसला किया।

पार्टी ने कोश्यारी को 2012 में विधानसभा चुनाव संचालन समिति अध्यक्ष नियुक्त किया। किंतु आश्चर्य की बात ये रही कोश्यारी अपने घर कपकोट की सीट भी नहीं बचा पाए। यही नहीं, उनके प्रभाव वाले दो जिलों बागेश्वर व पिथौरागढ़ में पार्टी को एक-एक सीट मिल पायी। इन दिनों खबर है कि कोश्यारी भाजपा के पूर्व मंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए फिर से पार्टी पर दबाव बनाने में जुटे हैं। कोश्यारी के इस दांव पर पार्टी के ही कुछ लोग ये कहने से नहीं चूक रहे कि कोश्यारी उस नेता को अध्यक्ष बनाने में जुटे हैं जो खुद एक प्रधान से चुनाव हार गया।

वहीं बात करें पार्टी के दूसरे बुजुर्ग नेता जनरल खंडूडी की तो उनके भी मिजाज कोश्यारी से कुछ जुदा नहीं हैं। 2007 में खंडूडी दिल्ली पर दबाव बनाकर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने में सफल तो हुए लेकिन 2009 में हुए लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार ने उनकी राजनीतिक योग्यता पर बट्टा लगा दिया। राज्य की पांचों लोकसभा सीटें कांग्रेेस के खाते में गई और कोश्यारी के दबाव के चलते खंडूडी को कुर्सी से हटना पड़ा। लेकिन हटने के बाद भी खंडूडी चुप न बैठे। निशंक सरकार को अस्थिर करने के लिए उन्हांेने हर दांवपेंच का इस्तेमाल किया। आश्चर्य की बात यह थी कि इस काम में उन्होंने कोश्यारी की ही मदद ली जिन्होंने उन्हें हटवाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। 2009 में दोनों नेताओं के दबाव के बाद निशंक की जगह खंडूडी को फिर मुख्यमंत्री बनाया गया।

खंडूडी चाटुकारों ने चुनाव से ऐन पहले ‘खंडूडी है जरूरी’ का नारा देकर खंडूडी को पार्टी से उपर उठाने की कोशिश भी की। लेकिन देश भर में लोकायुक्त का डंगा पीट कर अपनी इमानदारी साबित करने में जुटे खंडूडी को उत्तराखण्ड की जनता ने मुंह तोड़ जवाब दिया। नतीजा ये हुआ कि खंडूडी को ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा। पहली बार किसी राज्य में मुख्यमंत्री समेत पांच कैबिनेट मंत्रियों को जनता ने सदन से बाहर का रास्ता दिखा दिया। वो भी तब जब भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रही टीम अन्ना ने राज्य में घूम घूमकर खंडूडी की प्रशंसा का गुणगान किया। लेकिन कहते हैं कि जैसे व्यापार में ग्राहक ही सही होता है, वैसे ही राजनीति में जनता ही सही होती है। खंडूडी की संसदीय सीट में आने वाली 14 विधानसभा सीटों में से 11 सीटें पार्टी हार गई। पार्टी को 31 सीटें तो मिली लेकिन बद्रीनाथ से ऋषिकेश तक जो पार्टी का हमेशा दबदबा रहता था वो खत्म हो गया। खंडूडी ने अपनी हार के लिए भितरघात की सफाई देने में जुटे रहे लेकिन ये सफाई नहीं दे पाए कि वो पांच हजार वोटों से कैसे हार गए। लेकिन उनके बुढ़ापे की टीस देखिए आज भी वो मुख्यमंत्री बनने के लिए आतुर हैं।

2012 के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने भाजपा आलाकमान को ये समझाने की पूरी कोशिश की कि उनकी रणनीति कितनी गलत थी, और पार्टी की दशा-दिशा कुछ ठीक नहीं है। लेकिन केन्द्र में बैठे कुछ हठी नेता इन नतीजों को नजर अंदाज कर खंडूडी और कोश्यारी को सही साबित करने में जुटे हैं। ये वही नेता हें जिनके कंधों पर उत्तराखण्ड चुनाव की जिम्मेदारी थी। इन्हीं नेताओं ने निशंक कार्यकाल में एक फर्जी सर्वे कराकर आलाकमान को ये समझाने की कोशिश की थी कि राज्य में मुख्यमंत्री बदलकर ही सत्ता वापस लायी जा सकती है। लेकिन जनता ने उनके इस फर्जी सर्वे की हवा निकाल दी।

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष धमेंन्द्र प्रधान तो चुनाव नतीजों के बाद भी राज्य सभा चुनाव और विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव में अपनी रणनीति का डंका बजाते रहे। किंतु जब इन दोनों चुनावों के नतीजे सामने आए तो उनकी तथाकथित रणनीति धरी की धरी रह गई और उन्होंने उत्तराखण्ड से बोरिया-बिस्तर समेट कर दिल्ली जाना ही सही समझा। अपनी-अपनी हार से खिसियाये ये सभी नेता अब मिलकर अपने चहेतों को नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष बनवाने के लिए दांव खेल रहे हैं। राजनीतिक हालातों पर गौर करें तो वर्तमान में उत्तराखण्ड में नेता विपक्ष या प्रदेश अध्यक्ष के लिए निशंक सबसे बड़े दावेदार हैं। लेकिन ये नेता नहीं चाहते कि निशंक को फिर से किसी कुर्सी पर बैठाया जाए। निशंक को छह महीने पहले उनके विरोधियों ने गलत ठहराने की जो कोशिश की थी, जनता ने उन्हें चुनाव जिताकर यह साबित कर दिया कि गलत कौन था और सही कौन। ये वही निशंक हैं जिन्होंने मुख्यमंत्री बनते ही विकासनगर सीट पर उपचुनाव में कांग्रेस के पूर्व मंत्री के खिलाफ एक मामूली कार्यकर्ता को चुनाव जिताकर इतिहास रच दिया था। इससे पहले इस सीट पर कभी भी भाजपा को जीत हासिल नहीं हुई थी। 

बहरहाल, इन सभी खामियों और गुटबाजी के बीच आज भी भाजपा आलाकमान परिस्थिति तथा राजनीतिक सच्चाई को समझने को तैयार नहीं है। दिल्ली में बैठे कुछ नेता आज भी मीडिया को मैनेज करके दोनों बुजुर्ग नेताओं को ही सही ठहराने में जुटा है। लेकिन युवा नेतृत्व की बात करने वाली पार्टी कैसे बूढ़े घोड़ों दांव खेल रही है यह बात आम कार्यकर्ता के गले भी नहीं उतर पा रही है। दुर्भाग्य की बात यह है कि पार्टी ने उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय प्रदेश ही जिम्मेदारी जिन दो नेताओं धर्मेद्र प्रधान व राजनाथ सिंह को दी है, उनके अपने प्रदेशों में भाजपा का बंटाधार हो गया है और अब वे उत्तराखण्ड में आकर राजनीतिक प्रयोग कर रहे हैं। ऐसे में साफ है कि नेताओं की आपसी खींचतान से पार पाकर यदि पार्टी आलाकमान जल्द ही कोई परिस्थितिजन्य तथा तर्कंगत निर्णय नहीं ले पाता है तो उत्तराखण्ड में भाजपा की हालत उत्तर प्रदेश जैसी ही हो जायेगी, ये तय है। 


(राजेन्द्र जोशी)

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