सेक्स पर नियंत्रण से व्यक्ति दीर्धायु


आज के युवाओं में यौन रोगो की बढ़ती समस्यायें-संयम से करें होता निराकरण 


प्रकृति ने जींव की संरचना करते समय प्रत्येक जींव के निमार्ण करते समय उसके मुॅह नाक खान की व्यवस्था की है, जींव को जीवन जीने केलिए उसे हवा पानी भोजन की आवष्यकता होती है यह जरूर है कि कौन कौन जींव किस तरह से अपना जीवन व्यतीत कर लेते है लेकिन हम मानव है और मानव सभी जींवों में सर्वोपरि है । मानव काया की सुरक्षा केलिए ही सृष्टि के साथ उपचार इलाज व औषधियों की खोज हुई है और लगातार हो रही है आगे भी होगी । लेकिन  जिस प्रकार दूध में कितने लाभकारी गुण होते है उसके उपयोग की बिधि से ही पता लगाया जा सकता है ।  कोई भी बास्तु के उपयोग एवं उपभोग की बिधि करने से ही उसके स्वाद व लाभ का अनुभव किया गया है ।  हमारे ऋषि, मुनियों, वैद्यों ने करोड़ो साल पूर्व मानव के जीवन जीने की कला व अनुभव लिखे है ।  भारतीय संस्कृति में मानव केलिए लम्बी उम्र जीने केलिए जो बिधियॉ या कलायें बताई गई हैं उनके अनुसार चलने बाले व्यक्ति मानव निरोगी होकर इच्छा मृत्यू तक प्राप्त करने का लेख है ।  हम आप अपने गौरवमयी वेद पुराण,ष्षास्त्रों, उपनिषद, योग, जप तप, यज्ञ, के साथ साथ  ब्रम्हचर्य जीवन जीने एवं संयम से रहने से ही व्यक्ति  निरोगी रह सकता है तथा अपना पुरूर्षा बनाये रख सकता है । 

सेक्स क्या है...?

सेक्स अंग्रेजी भाषा का षव्द है, इसका दूसरा ष्व्द यौन है । हिन्दी में यदि हम काम बासना सीधा कहे तो सभी को समझने में बिंलब न होगा ।  काम बासना नर व मादा दोनो प्राणीाओं का प्रमुख अंग माना गया है । प्रकृति की संरचना को समझने बाले ही बिषेषज्ञ कहे जाते है ,।  बर्तमान समय में सेक्स, यौन व काम बासना पर बिस्तार से चर्चा करना इसलिए आवष्यक हेा चुकी है क्योकि इस भोतिकवादी युग में प्रेम रोग सभी रोगों से ज्यादा खतरनाक व संक्रामक रोग है । इस रोग से आज का प्रत्येक युवा ग्रसित हो चुका है भले ही कुछ युवाओं में परिवारिक संस्कार, सामाजिक मर्यादाये या भारतीय संस्कृति का प्रभाव हो तो वह इस बिषय से दूर हो सकता है लेकिन बर्तमान समय में विज्ञानिक खोज मोबाईल, इंटरनेट की सुविधायें हो जाने के कारण आज का युवा अष्लील चलचित्रों, चित्रों, बर्तमान कपड़ों का पहनाव, आय से अधिक खर्चे, बढ़ती जनसंख्या, मंहगाई,, बिलासता पूर्ण जीवन जीने की ललक इच्छाये, प्रतियोगिता की दौड़ के साथ साथ, परिवारिक एवं सामाजिक मर्यादायें का गिरता स्तर के कारण आज के युवाओं को सेक्स की ओर ले जा रहा है.

सेक्स प्रकृति सृष्टि संचालन की व्यवस्था थी लेकिन इस पर नियंत्रण हर कोई नही कर पाता है जिस कारण यह व्यक्ति या मानव नर-नारी के जीवन का बहुमूल्य सुख बन कर ज्वाला मुखी की तरह बिस्फोट हुआ जिसका असर आज के युवाओं से लेकर बृध्दजन तक इसका असर हुआ है । आज दिन होने बाली अपराधिक घटनाओं में कही न कहीं  कामवासना का प्रभाव रहता है जिसका सीधा कारण है कि व्यक्ति जब अपनी आवष्यकताओं की पूर्ति करने लगता है तो उसकी इच्छायें कामबासना की पूर्ति की ओर भागती है । इस कामबासना की पूर्ति केलिए मानव क्या नही कर सकता है यह आज हर गली कोने हाट बजार गॉव गॉव तक इसका जहर फैल चुका है ।  जिसका सीधा कारण है कि  इस सेक्स (यौन) बिषय को हमेषा मर्यादाओं में बॉध कर रखा । इसके बारे में किसी भी  रचनाकार ने इसके ऊपर इस प्रकार का प्रकाष नही डाला जिससे आम आदमी इसके अच्छे व  बुरे  प्रभाव को समझ सके । भारतीय धर्म ग्रन्थों में प्रकृति की संरचना एवं संहार का मूल कारण काम इच्छा पूर्ति ही रही है ।  काम इच्छाओं की पूर्ति के लिए राजाओं एवं राक्षसों का युध्द हुआ है काम बासना की प्रबलता नारी में ही विद्यमान होती है ।  नारी का जहां सम्मान किया गया है वही नारी की मन की चंचलता पर नियंत्रण प्रकृति के बष में ही रखा गया है । सेक्स का अनुभव संसार के सभी सुखो से ऊपर होता है ।  इस क्षणि खुख के अनुभव  के दुष्परिणाम कितने खतरनाक होते है उनके बारे में भी समझना होगा , क्योकि काम बासना की संतुष्टि किसी की पूर्ति नही करती है जिस कारण जिसका अंत भी मौत से ही होता है । 

काम बासना की उत्पत्ति किसी भी पुरूष या नारी की इच्छाओं पर निर्भर है, काम (सेक्स) की प्रबलता एक पक्ष पर निर्भर नही करती है ।  कोई भी पुरूष जब  बालक रूप में पैदा होता है , और वह अपने मॉ के स्तन पान करता हैं तो मॉ जब अपने बच्चे को दूध पिलाती है तो उसके ऑचल से मन से ममता का प्यार दुलार स्नेह उमड़ता है तो उसके स्तनों से बच्चे केलिए दूध निकलता है लेकिन उस समय मॉ की इन्द्रियॉ पूरी तरह बच्चें के प्यार पर होती है । बच्चा मॉ के स्तन पर हाथ फेरता है उनके साथ खिलवाड़ करता है तो मॉ की इच्छायें अत्याधिक बच्चें के प्यार व उसके दुलार पर होती है यदि यही मॉ अपने बच्चे के स्थान पर अपने पति या पुरूष के साथ होती है तो जब उसका स्नेह व प्यार का रूप  बदल जाता है ।  नारी का जिस पुरूष या व्यक्ति से काम बासना की इच्छा पूर्ति का  स्नेह व प्यार होता है तो उसी नारी की मन की तंरगे उसके अंदर स्थापित काम बासना को इतनी जल्दी जाग्रत कर देती है कि नारी अपना सब कुछ भूल कर अपनी मान मर्यादाये, जाति धर्म परिवारिक, सामाजिक मर्यादायें तथा रिष्ते दर किनार कर देती है तथा संसारिक सुखं का त्याग कर क्षणिक सुख केलिए काम के बष में होकर पुरूष के बष में हो जाती है । इसी प्रकार किसी भी बालक या व्यक्ति को जब तक  सेक्स (कामबासना) का अनुभव न हो, उसे इसके बारे में जानकारी न हो, या वह काम बासना के चित्र , चल चित्र कहानी, किस्से या प्रेम कहानी के बारे में उसे जानकारी न हो तो उसे कामबासना ग्रसित नही कर सकती है । कामबासना या सेक्स संसार का ऐसा अनुभव है कि एक बार जिस पुरूष या नारी को इसका अनुभव हो जाता है, फिर उससे छुटकारा पाना असंभव सा हो जाता है । इसलिए काम बासनाओं को किस तरह से नियंत्रण में रखा जा सके तथा इससे कैसे बचा जा सके इसके बारे मे युवा अवस्था में आने के पूर्व बच्चों को इसके परिणामों के बारे में जानकारी भी देना आवष्यक है । 

किसी भी युवा या युवती, नर या नारी  स्वस्थ्य होने पर उसके अंदर एक उम्र के हिसाब से यौन अंगों का विकाष होता है , यौन का मालिक षरीर के अंदर संग्रह रक्त से निर्मित बीर्य का निमार्ण होता है । यह बीर्य षरीर के बहुमूल्य पोषक तत्वों से बना हेाता है ।  यदि नर या मादा के अंदर पुरूर्षाथ बीर्य नही होता है तो वह यौन क्रियाओं की पूर्ति नही कर सकता है न ही संतान उत्पत्ति करने की क्षमता रख सकता है ।  बीर्य की रक्षा करने केलिए नर-नारी को संयम के साथ नियम से चलने की आवष्यकता होती है । 

सेक्स में संसय-कियी भी नर या मादा में सेक्स करने की क्षमता उसके षारीरिक बल पर निर्भर करती है ।  जींव जन्तुओं  पषुओं में सेक्स करने का प्रकृतिक नियम होता है । लेकिन मानव ही ऐसा है जिसका सेक्स का कोई समय व नियम निर्धारित नही है ।  मानव को सेक्स या कामबासना करने केलिए भारतीय ऋषि मुनियों, योगिओं ने अनेक रास्ता निर्धारित किये है । मानव को चार भागों में विभाजित किया है जिसमें बाल अवस्था मे  ब्रम्हचर्य जीवन जीने केलिए मार्ग दिया है इस अवस्था में जो भी युवा युवती अपने षरीर को स्वस्थ्य रखते हुये संयम के साथ के साथ ष्षक्ति अर्जित कर लेता है वह उसकी क्षमता पूरे जीवन उसको कार्य करने की षक्ति प्रदान करता है ,इसको हम इस प्रकार से भी समझ सकते है कि यदि हमारे मकान /भवन की नींव मजबूत नही होती है तो हवा व पानी में मकान/भवन ढह जाता है इसी प्रकार युवा अवस्था है इसमें जीवन को जीने की कला अर्जित करने का समय होता है , मॉ की गोद से महाविद्यालय तक की षिक्षा मैं परिवारिक, सामाजिक, नैतिक, व्यवहारिक अध्ययन व अनुभव लेने का समय होता है । प्रत्येक युवा -युवती को अपने जाति व धर्म के अनुसार धार्मिक ग्रन्थों ,महापुरूषों के व्दारा लिखे गये व बताये गये जीवन मार्ग को अपनाना चाहिये ।  इसके साथ जैसे ही हम युवा अवस्था को पार करते है हमें  बैबाहिक जीवन में परिवारिक एवं सामाजिक परम्पराओं के साथ बंधन में बॉधा जाता है। इसी उम्र मेे हम अपने जीवन के उस भवन का निमार्ण करते है जिसमे कार्य करने का रास्ता तय करते है अपना कर्तव्य का निर्वाहन करने का रास्ता तय कर लेते है ।  कुछ समय बाद ग्रहस्थ जीवन मे प्रवेष करते है ।  इस उम्र में हम स्व्यं पिता व मॉ बन जाते है । साथ ही परिवारिक एवं सामाजिक, राष्ट्रप्रेम देष प्रेम में लगकर अपना कर्तव्य का निर्वाहन करते है । इसी उम्र में व्यक्ति जबान कहलाता है उसे अपनी जवानी को व्यस्त रखना चाहिये , कामबासनाओं से बचने केलिए जीवन को नियम में बॉध लेना चाहिये तथा संयम से काम लेना चाहिये । बार बार बता चुका हॅू और अनुभव कर चुका हॅू कि कामबासना सेक्स ऐसा अनुभव है इसकी पूर्ति कोई नही कर पाता है इसलिए संयम से ही कार्य करना चाहिये । जीवन बहुमूल्य है , जीवन है तो सब कुछ है ।  साठ की उम्र पार करने के बाद ग्रस्थ्य जीवन का त्याग कर पूर्ण रूप से ईष्वर भक्ति में लग जाना चाहिये । 

सेक्स में संसय

अधिकांष यह बीमारी देखी जाती है कि व्यक्ति की इन्द्रियॉ षिथिल हो जाती है तथा उसे सेक्स से डर हो जाता है , सेक्स के नाम से दूर भागता है, बर्तमान समय में सेक्स रोगियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है इस बीमारी को दूर करने के नाम पर नीम हकीम बैद्य व डाक्टरों व्दारा ऐसे व्यक्तियों से मोटी रकम बसूली की जाती है । जबकि मेरे अनुभव के अनुसार यौन रोग जन्म जात नही होता है । यह रोग व्यक्ति अपनी युवा अवस्था से ही पैदा करता हैं जिस कारण आगे चल कर भंयकर रोग से ग्रस्ति हो जाता है । इस रोग का पहिला कारण युवाओ में खाना खाने का समय निर्धारित नही होता है, समय से सोने का नियम नही होता है , सुबह से व्यायाम खेंल कूॅद, घूमने केलिए समय नही होता है , रात्रि में भोजन करने का समय निर्धारित नही है । दूसरा जब युवाओ की इन्द्रियॉ (प्रमुखअंग) विकषित होता है तो वह अनैतिक कृत्य  हस्तमैथुन करते है जिससे युवाओं का जोष अंदर से समाप्त हो जाता है तथा इन्द्रियॉ षिथिल हो जाती है ।  युवाओ को ज्ञान न होने के कारण तरह तरह के नषा करते है जिससे मानसिक विकाष समाप्त हो जाता है तथा नषा का बुरा प्रभाव व्यक्ति के पुरूषार्थ पर सीधा होता है । नषा के कारण वीर्य बनने की क्षमता समाप्त हो जाती है ।  गन्दे चित्र, अष्लील फिल्मे देखने के कारण बार बार इन्द्रियॉ उत्तजित होती है और षिथिल होती है उससे मर्दाना षक्ति समाप्त हो जाती है । जब ऐसे युवाओं का विवाह होता है या किसी प्रेमिका से उनका ष्षारीरिक सम्बन्ध स्थापित करते है तो वह ष्षीध्र पतन के रोगी होते है , वह सेक्स के पूर्व ही किसी कार्य में सफल नही होते है । जब ऐसा होता है तो कोई भी युवा सामने बाले को सन्तुष्ट करने की क्षमता नही रखता है तो वह नरवष हो जाता है तथा यहीं से मानसिक तनाव , डिप्रेषन में चला जाता है, युवा योैन रोग के साथ साथ अपनी दुर्बलता के कारण तनाव व अवसाद में होने के कारण यह बीमारी न तो किसी को बताता है न सहन करने का साहस करता हैं चोरी छुपे अपना इलाज कराना चाहता है । जबकि इस प्रकार की बीमारी यदि होती है तो उसका समाधान ष्षीध्र होना चाहिये तथा हमारे ऋषि, मुनियों , योगी बेद्य के बताये व लिखी हुई यौन रोगों व उनके उपचार की पुस्तकों का अध्ययन करें तथा औषधिओं का सेवन करें , दवाओं के साथ साथ  यौन रोग का उपचार कुछ इस प्रकार से समाधान किया जा सकता है । यदि आप ष्षादी सुदा है और आप युवक हो या युवती हो । सेक्स की सन्तुष्टि केलिए सबसे पहिले एकान्त होना चाहिये । बिस्तर साफ सुतरे व स्वच्छ हो, सुगंधित हो, जिस कमरे में आप विश्राम करते हो किसी भी प्रकार का मन के अंदर भय नही होना चाहिये । आप अपने साथी को मानसिक रूप से प्रषन्न करते हुये काम बासना के प्रति आकर्षित करने केलिए योग क्रियाओं का सहारा ले, तन को मन से सललाते हुये काम इन्द्रियॉ जाग्रत करें । जब आप व आपका साथी इस क्रिया केलिए समर्पित हो जाये तभी आप सहभागिता के साथ संभोग करें । उतावलेपन में किया जाने बाला संभोग ष्षीध्रपतन की बीमारी को जन्म देता है, इस क्रिया के दौरान अपने जीवन के अच्छे बिचारों को भी एक दूसरे के सामने परोस सकते है । भावी योजनाओं को जन्म देने केलिए यह समय उचित होता है।  अपनी गल्तियों एवं गलत फहमियों को दूर करने का अच्छा मौका होता है । एक दूसरे के प्रति समर्पित भावना होने के कारण जीवन की गल्तियों को दूर किया जाता है ।  पति-पत्नि का मिलन प्रकृतिक रूप से आत्मा का मिलन होता है इस दौरान छल कपट का त्याग होता है । पवित्रता को कायम रखें । यदि आप योग विधि के माध्यम से संभाग क्रिया करते है तो आप स्वयं व सामने बाले को संतुष्ट करने की क्षमता रखते है । अन्यथा संतुष्टि न होने पर ही एक दूसरे अपनी अपनी संतुष्टि केलिए इधर उधर तॉक झॉक करते है जो परिवार के बिघटन का कारण बनता है इसी कारण आत्म हत्यायें या हत्या के अपराध घट जाते है इसलिए अपनी गल्तियों का जल्दी समाधान कर लेना चाहिये तथा एक दूसरे के सुख-दुःख में सहभागीदारी का निर्वाहन करते हुये सुखी जीवन व्यतीत करने केलिए ही कामबासना अन्तिम सुख बताया गया है इस सुख की खोज केलिए ही प्रत्येक नर व नारी अपना जीवन न्यौछावर करने में पीछे नही रहता है । 

यौन षक्ति कैसे प्राप्त करें ..?

किसी भी युवा व युवती को किसी भी प्रकार की यौन समस्या है तो सर्व प्रथम वह अपने आपको सुबह 4 बजे उठने को तैयार हो, सुबह 4 बजे उठ कर कुल्ला कर मुॅह धोकर ताजा या तॉबे के लोटा में रात्रि को भरा पानी खाली पेट पीने की आदत बनाये , एक घंटे सुबह टहने केलिए आवष्यक जावे, नाष्ता आवष्यक करें नाष्ता में दलिया दूध , फल या दाले आदि का उपयोग करे । दोपहर के भोजन में  हरी सब्जियॉ , सलाद व फल जरूर ले, ष्षॉय के समय हल्का नाष्ता करें । रात्रि 8 बजे आवष्यक रूप से भोजन करें, सोने के पूर्व कुनकुना हल्का गर्म दूध आवष्यक पीयें । यदि पेट साफ न होता हो तो दोपहर के भोजन के बाद दो हर्रे हल्की भुजवा कर पूर्ण बनाकर खाना के बाद आवष्यक खाये  । पाचन ष्षक्ति ठीक होने के साथ ही ष्षरीर में खून बनेगा तथा खून से बीर्य बनना ष्षुरू होगा बीर्य जब गाड़ा होने लगेगा तो अंदर से उत्तेजना व ष्षक्ति संचय होगी । यौन रोग से पीड़ित व्यक्ति को सुबह छुहारे बड़ी दाख, दो बादाम दूध के साथ लेना चाहिये । 

दोपहर भोजन के एक घंटे पूर्व एक गिलास फलों का जूष जो अच्छा लगे प्रतिदिन लेना चाहिये । इस दौरान किसी  भी प्रकार की गंदे बातावरण में न रहे , गंदी बातें न करें, महिलाओं की चर्चाओं से दूर रहे, अष्लील फिल्मे चित्र आदि न अवलेाकन करें । प्रत्येक ऐसे रोगी को अध्यात्मिकता से आवष्यक जुड़ना चािहये तथा धर्म व षास्त्र का ज्ञान अर्जित करें । परिवार के सदस्यों के साथ समय दे साथ साथ भोजन करें मनोरंजन करे । अपने मन को स्वतंत्रता से भ्रमण करने दें ।  किसी भी बुरे बिचारों को अपने मन में स्थान न दें । किसी युवक या युवती के बारे में चिन्तन व मनन करने से ही मन खराव होता है तथा कपड़े भी खराब होते है । 

सेक्स सृष्टि संचालन का माध्यम है

हम आप सभी जानते है कि सेक्स के बिना जीवन अधूरा होता है लेकिन इसकी एक उम्र होती है । हर व्यक्ति के माता-पिता अपने संतान की उम्र की अनुसार उसको बैबाहिक जीवन मे बॉध देते है लकिन जो सेक्स को ही महत्व देते है । उनकी उम्र कम हो जाती है तथा अनेक बीमारियों से ग्रस्त हो जाते है । लम्बी उम्र जीने केलिए प्रत्येक पुरूष को एक पत्नी की आवष्यकता होती है इसी प्रकार एक नारी को पति की आवष्कयता होती है यदि आप पति-पत्नि में प्रेम प्यार स्नेह है तो आपके पास मानसिक बीमारियां कभी नही आ सकती है तथा कितना बड़ी संकट भी आपके सामने आ जावे उसे हल करने की क्षमता दोनेा में होती है । सेक्स सृष्टि संचालन का माध्यम है । इसको जितना सुरक्षित रखोगें उतना ही लाभ होगा , उम्बी उम्र पाने केलिए अपने बीर्य की रक्षा करें अपने मन को बिचलित होने से रोके संयम व नियम का पालन करे ।


---संतोष गंगेले---
(लेखक/पत्रकार नौगॉव जिला छतरपुर)
यह आलेख किसी व्यक्तिगत जीवन की गाथा से जुड़ा नही है, इस आलेख को मैं अपने अनुभव के अनुसार लिख रहा हैू जीवन में नियम व संयम को जो जीवन में अपना सलाहकार, दोस्त वैद्य या डाक्टर समझ कर पालन करते हे उनका जीवन आनंदमय, सुखमय व लाभकारी होगा । 
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