अंग्रेजी के विद्वान डाॅ बीरबल झा को फिर मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मान

birbal jha
प्रख्यात शिक्षाविद और अंग्रेजी के विद्वान डाॅ बीरबल झा को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है। प्रसिद्ध आस्ट्रेलियाई लेखक वाल्टर जाॅन्सटन ने अपनी प्रेरक पुस्तक ‘219 सक्सेस फैक्टस" में उनकी रचनाओं और समाज की बेहतरी में उनके योगदानों की भूरी-भूरी प्रशंसा की है। 216 पन्नों की आॅस्ट्रेलिया के इमेरियो पब्लिकेशन से प्रकाशित इस पुस्तक में उन्होंने झा द्वारा कमजोर लोगों को दी जाने वाली अंग्रेजी की ट्रेनिंग और इससे उनके जीवन में आ रहे सकारात्मक व रचनात्मक बदलाव का उल्लेख किया है।

अंग्रेजी शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए झा को इससे पहले भी कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं। इससे पहले अमेरिका की एक अंतरराष्ट्रीय वेबसाइट ने उनको विश्व के प्रमुख सेलिब्रिटी की सूची में शामिल किया था। इस अमेरिकन वेबसाइट का नाम ूूू.सनबलूीव.बवउ है। डॉ बीरबल झा को मिथिला मिरर ने ‘पर्सन ऑफ द ईयर-2014‘ के सम्मान से भी सम्मानित किया था। 

झा लगभग दो दशक से शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने दो दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। वह प्रेरक वक्ता भी हैं। अपनी इस कला को उन्होंने ‘सेलिब्रेट योर लाइफ‘ नामक एक प्रेरक पुस्तक के जरिए सामने रखा जिसे खूब पढ़ा और सराहा गया। समाज में बदलाव के बड़े मकसद के साथ वर्ष 1993 में उन्होंने पटना में ब्रिटिश लिंग्वा नामक संस्था की नींव रखी थी। आज यह संस्था बिहार ही नहीं, बल्कि कुछ अन्य प्रदेशों सहित दिल्ली में भी लोगों को अंग्रेजी का प्रशिक्षण दे रही है। वह ‘लिंग्वा बुलेटिन‘ नामक मासिक अंग्रेजी पत्रिका के संपादक भी हैं। डॉ. झा ने अपनी मुहिम को और आगे बढ़ाते हुए अब बिहार अंग्रेजी आंदोलन के जरिए अंग्रेजी को गांव-गांव और घर-घर तक पहुंचाने का कार्यक्रम चला रखा है, जिसकी इन दिनों काफी चर्चा है। 

पिछले दिनों प्रख्यात लेखक चेतन भगत पर साहित्यिक चोरी के आरोप के कारण भी झा चर्चा में रहे। झा ने दावा किया था कि भगत ने अपनी किताब हाफ गर्लफ्रेंड का प्लॉट उनके द्वारा लिखे गए नाटक ‘इंग्लिशिया बोली‘ से चुराया है। गौरतलब है कि भगत, झा के ब्रिटिश लिंगुआ गए थे और इस दौरान उन्होंने भगत को झा ने कई किताबें गिफ्ट के तौर पर दी, जिसमें इंग्लिशिया बोली भी थी, जो एक एजुकेशनल सोशल ड्रामा है।

उल्लेखनीय है कि मिथिलांचल के मधुबनी जिले के सिजौल नामक एक छोटे से गांव से अपना सफर शुरू करने वाले झा ने अंग्रेजी न जानने की अपनी कमजोरी और उसके कारण मिली उपेक्षा को ही अपना हथियार बनाया। झा की प्रारंभिक और उच्च शिक्षा सुदूर देहात के सरकारी विद्यालय से हुई। उन्होंने मास्टर डिग्री और पीएचडी पटना विश्वविद्यालय से की। बचपन में झा को भारी अभाव का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनके पिता का निधन उस समय हो गया था, जब वे महज डेढ़ साल के थे। उनका जन्म 1972 में हुआ था। 
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