बाबरी मामला : आडवाणी, जोशी, उमा के खिलाफ मुकदमा चलेगा

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नयी दिल्ली, 19 अप्रैल, उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या में विवादित ढांचे को ढहाये जाने के मामले में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, श्री मुरली मनोहर जोशी तथा सुश्री उमा भारती सहित 12 नेताओं के खिलाफ आपराधिक साजिश रचने का मुकदमा चलाने का आज आदेश दिया। न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष एवं न्यायमूर्ति रोहिंगटन एफ नरीमन की पीठ ने इस मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की अपील स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। पीठ की ओर से न्यायमूर्ति नरीमन ने फैसला सुनाते हुए कहा, “हम इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सीबीआई की अपील स्वीकार रिपीट स्वीकार करते हैं और इस संबंध में कुछ दिशानिर्देश जारी करते हैं।” न्यायालय ने राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह के खिलाफ फिलहाल आरोप तय नहीं करने का आदेश दिया। पीठ ने कहा कि श्री सिंह राज्यपाल के संवैधानिक पद पर आसीन हैं और जब तक वह इस पद से हट नहीं जाते तब तक उनके खिलाफ आरोप तय नहीं किये जाएंगे। श्री आडवाणी, श्री जोशी और सुश्री भारती के अलावा जिन नेताओं के खिलाफ मुकदमे चलेंगे उनमें भाजपा विधायक विनय कटियार, साध्वी ऋतम्भरा, सतीश प्रधान और सी आर बंसल शामिल हैं। इस मामले में लखनऊ और रायबरेली दोनों जगहों पर अलग-अलग मुकदमे चल रहे थे। लखनऊ में अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ, जबकि राय बरेली में श्री आडवाणी आदि नेताओं के खिलाफ मुकदमे चल रहें हैं। इन नेताओं पर भड़काऊ भाषण के जरिये कारसेवकों को विवादित ढांचा ढहाने के लिए उकसाने के आरोप हैं। पीठ ने राय बरेली में चल रहे मुकदमे को चार सप्ताह के भीतर लखनऊ स्थानांतरित करने का आदेश दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि सुनवाई रोज-रोज चलेगी और इसे दो साल में पूरा करना होगा। सीबीआई यह सुनिश्चित करेगी कि अभियोजन पक्ष का एक गवाह बयान दर्ज कराने के लिए सुनवाई के दौरान निचली अदालत में मौजूद हो। मामले में फैसला सुनाये जाने तक सुनवाई कर रहे न्यायाधीशों के तबादले नहीं किये जाएंगे। न्यायालय ने कहा कि उसके आदेश का अक्षरश: पालन किया जाना चाहिए। इसने स्पष्ट किया कि यदि किसी पक्ष को ऐसा लगता है कि न्यायालय के दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है तो उसे शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाने की छूट होगी। गत छह अप्रैल को पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। निचली अदालत ने इन नेताओं को आपराधिक साजिश रचने के आरोपों से बरी कर दिया था, जिसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 21 मई 2010 को सही ठहराया था। इसके बाद सीबीआई ने शीर्ष अदालत की शरण ली थी।

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