आलेख : बाबरी विध्वंश या आडवाणी के खिलाफ साजिश ?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस बात को लेकर बहश तेज हो गयी है कि क्या अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती समेत बीजेपी के 13 नेताओं पर आपराधिक साजिश का केस चलाना सही है या गलत, यह तो वक्त बतायेगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की पिटीशन पर सभी पर केस चलेगा इजाजत दे दी है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यह है कि कहीं राष्ट्रपति के दौड़ में सबसे आगे चल रहे लालकृष्ण आडवाणी को किनारे लगाने की साजिश तो नहीं? वैसे भी आयोध्या में जो कुछ हुआ वह सब कुछ खुल्लम खुल्ला था तो साजिश कैसे? अयोध्या में राम मंदिर भी और साजिश भी दोनों एक साथ कैसे चल सकता है? क्या मर्यादा पुरुराम के लिए लालकृष्ण आडवाणी, उमाभारती का सियासी बलिदान है? 




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फिरहाल, बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में साजिश के केस में फंसने के बाद बीजेपी की फायरब्रांड नेता और केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने साफ कहा कि वो इस्तीफा नहीं देंगी। उनका कहना है कि अयोध्या में कुछ भी साजिश नहीं थी, बल्कि जो कुछ हुआ वो खुल्लम खुल्ला था। अयोध्या में राम मंदिर बनकर रहेगा। जहां तक विपक्ष का सवाल है तो बताएं ‘क्या 1984 के दंगों के लिए सोनिया गांधी ने साजिश रची थी? हो जो भी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के बाद राजनीतिक बहस इस बात को लेकर तेज हो गयी है कि राष्ट्रपति के घुडदौड़ में सबसे आगे चल रहे लालकृष्ण आडवाणी क्या अब बाहर हो गए है। या फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती याचिका देकर कोई तरकीब निकालेंगे?। यहां गौर करने वाली बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ‘अयोध्या में राम मंदिर बनेगा या नहीं, अयोध्या में राम मंदिर था या नहीं‘ से कोई लेना-देना नहीं है। गौरतलब है कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को हिंदू कारसेवकों ने तोड़ दी थी। इसको लेकर दो एफआईआर दर्ज हैं, जिसमें एक में उमा भारती और बीजेपी और वीएचपी के 21 बड़े नेता शामिल हैं। आज उनमें से कई की मौत हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की पिटीशन पर यह फैसला सुनाया। 


इस केस में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा, सतीश प्रधान, चंपत राय बंसल, विष्णु हरि डालमिया, सतीश प्रधान, आरवी वेदांती, जगदीश मुनी महाराज, बीएल शर्मा, नृत्य गोपाल दास, धर्म दास का नाम शामिल है। इसके अलावा बाल ठाकरे, गिरिराज किशोर, अशोक सिंघल, महंत अवैद्यनाथ, परमहंस राम चंद्र और मोरेश्वर सावे के नाम भी हैं। इन सभी लोगों का निधन हो चुका है। लेकिन इस फैसले का सर्वाधिक असर लालकृष्ण आडवाणी पर ही पड़ेगा। क्योंकि इनका नाम अगले राष्ट्रपति की दौड़ में सबसे आगे है। उन्हें नरेंद्र मोदी की पसंद बताया जा रहा है। आडवाणी और मुरली पर सांसद पद छोड़ने का दबाव बन सकता है। फिलहाल राजस्थान के गवर्नर हैं। सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक पद पर रहने की वजह से इस मामले से उन्हें दूर रखा है। दरअसल, दिसंबर, 1992 को दो एफआईआर दर्ज की गई थीं। पहली अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ। इन पर मस्जिद को ढहाने का आरोप था। इसकी सुनवाई लखनऊ कोर्ट में हुई थी। वहीं दूसरी एफआईआर आडवाणी, जोशी और अन्य लोगों के खिलाफ थी। इन सभी पर मस्जिद ढहाने के लिए भड़काऊ स्पीच देने का आरोप था। यह केस राय बरेली के सेशन कोर्ट में चला था। पिछली सुनवाई में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती समेत 13 लोगों के खिलाफ आपराधिक साजिश का मामला चलना चाहिए। सीबीआई के वकील ने कोर्ट को बताया कि रायबरेली में 57 लोगों की गवाही ली जा चुकी है। वहीं, 100 से ज्यादा लोगों की गवाही ली जानी है। यह भी बताया कि सभी 21 आरोपियों के खिलाफ आरोपों को हटा लिया गया था। इनमें बीजेपी नेता भी शामिल हैं। इसके अलावा, बाबरी मस्जिद को ढहाने के मामले में सभी आरोपियों के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गई थीं।

बता दें, 6 दिसंबर, 1992 को देश भर से हजारों कार सेवक अयोध्या पहुंचे थे। विहिप, बजरंग दल सहित बीजेपी के तमाम बड़े नेता अयोध्या में मौजूद थे। सुबह करीब साढ़े दस बजे का वक्त था जब हजारों कार सेवक हजारों पुलिस वालों की मौजूदी में विवादित ढांचे तक पहुंच गये। हर किसी की जुबां पर उस वक्त जय श्री राम का ही नारा था। विवादित ढांचे तक पहुंचने के साथ ही भीड़ उन्मादी हो चुकी थी। इस वक्त तक ढांचे की सुरक्षा को खतरा पैदा हो चुका था। ढांचे के आसपास करीब एक लाख कार सेवक पहुंच चुके थे। अयोध्या में स्थिति भयानक हो चुकी थी। पुलिस के आला अधिकारी मामले की गंभीरता को समझ रहे थे लेकिन गुंबद के आसपास मौजूद कार सेवकों को किसी को रोकने की हिम्मत किसी में नहीं थी। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का साफ आदेश था कि कार सेवकों पर गोली नहीं चलेगी। तत्कालीन एसएसपी अखिलेश मेहरोत्रा बताते हैं कि हर किसी को अनहोनी की आशंका हो चुकी थी। अयोध्या पहुंचने वाले तमाम रास्ते बंद कर दिये गये। बाकी जो कार सेवक रास्ते में थे उन्हें वहीं रोक दिया गया। इसके बाद जैसे जैसे दिन चढ रहा था भीड़ उन्मादी होकर विवादित ढांचे को तोड़ने की तैयारी कर रही थी। वहां मौजूद हजारों पुलिस वालों में से किसी को रोकने की हिम्मत नहीं थी। अयोध्या में सुरक्षा के लिहाज से उस दिन दस हजार से ज्यादा पुलिस वाले लगाए गए थे। 

अयोध्या के तत्कालीन एसएचओ पीएन शुक्ला ने बताया कि भीड़ में हर कोई गुंबद को तोड़ने में नहीं जुटा था लेकिन माहौल ही ऐसा हो गया था कि उन्मादियों को वहां मौजद हर शख्स का मानो समर्थन मिल रहा था। दोपहर के तीन बजकर चालीस मिनट पर पहला गुंबद भीड़ ने तोड़ दिया और फिर 5 बजने में जब पांच मिनट का वक्त बाकी था तब तक पूरा का पूरा विवादित ढांचा जमींदोज हो चुका था। भीड़ ने उसी जगह पूजा अर्चना की और राम शिला की स्थापना कर दी। हजारों पुलिस वालों की मौजूदगी में करीब डेढ लाख लोगों की भीड़ इस घटना की गवाह बनी। बाद में तत्कालीन सीएम कल्याण सिंह ने इस घटना को अपने लिए खुशी का दिन बताया। इस घटना ने देश की राजनीति उसी दिन से बदलकर रख दी। 6 दिसंबर को विवादित ढांचा गिरा और इसके बाद केंद्र सरकार ने कल्याण सिंह की सरकार बर्खास्त कर दी थी। यह अलग बात है कि मस्जिद ढहाए जाने से पहले भी 139 साल पूर्व अयोध्या में हिंसा भड़की थी। उस वक्त निर्मोही अखाड़े ने दावा किया था कि बाबर के समय एक मंदिर को गिराकर मस्जिद बनाई गई थी। ब्रिटिश एडमिनिस्ट्रेशन ने फेंसिंग हटाकर पूजास्थल को अलग कर दिया। 1853 में नवाब वाजिद अली शाह के समय पहली बार मंदिर को लेकर हिंसा भड़की थी। बताया जाता है कि तब निर्मोही अखाड़े ने दावा किया था कि बाबर के समय एक मंदिर को गिराकर मस्जिद बनाई गई थी। 1859 में ब्रिटिश एडमिनिस्ट्रेशन ने फेंसिंग हटाकर पूजास्थल को अलग कर दिया। मुस्लिमों को अंदरूनी तो हिंदुओं को बाहरी हिस्से का इस्तेमाल करने की इजाजत दी गई।

1885 में महंत रघुबीर दास ने पहला केस दायर किया। इसमें मस्जिद के बाहर राम चबूतरे पर एक छतरी लगाने की परमिशन मांगी गई। फिरोजाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने पिटीशन नामंजूर कर दी। लेकिन 1949 में रामलला की प्रतिमा प्रकट होने के बाद फिर विवाद बढ़ गया और हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षों की तरफ से केस किया गया। सरकार ने पूरे इलाके को विवादित घोषित कर परिसर के गेट पर ताला लगा दिया। 1950 में गोपाल सिंह विषारद और महंत परमहंस रामचंद्र दास ने फिरोजाबाद कोर्ट से जन्मस्थान में पूजा की परमिशन मांगी। चूंकि अंदरूनी हिस्से में ताला था, इसलिए परमिशन दे दी गई। 1959 में निर्मोही अखाड़े ने तीसरा केस दायर किया। इसमें विवादित हिस्से पर हक की मांग की गई। साथ ही रामजन्मभूमि के संरक्षक होने का दावा किया। 1961 में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने मस्जिद के अंदर प्रतिमा रखने पर केस दायर किया। साथ ही मस्जिद होने का दावा किया और उसके चारों ओर की जमीन को कब्रिस्तान बताया। 1984 में एक हिंदू ग्रुप ने राम मंदिर बनाने के लिए एक कमेटी का गठन किया। इसी समय लालकृष्ण आडवाणी की अगुवाई में मंदिर आंदोलन ने भी जोर पकड़ा। 1986 में हरिशंकर दुबे नामक शख्स की पिटीशन पर डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने मस्जिद के गेट खोलने के ऑर्डर दिए और हिंदुओं के पूजा करने की परमिशन दी। मुस्लिमों ने इसका विरोध किया। इसी दौरान बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बनी। 

1989 में विश्व हिंदू परिषद ने बाबरी मस्जिद के बगल वाली जमीन पर राम मंदिर की आधारशिला रख दी। वीएचपी के पूर्व प्रेसिडेंट जस्टिस देवकी नंदन अग्रवाल ने पिटीशन दायर कर पूछा कि क्या मस्जिद को कहीं और ले जाया जा सकता है? फिरोजाबाद कोर्ट में पेंडिंग पड़े 4 केस हाईकोर्ट की स्पेशल बेंच को ट्रांसफर कर दिए गए। 1990 में वीएचपी वालंटियर्स ने मस्जिद के कुछ हिस्से को नुकसान पहुंचाया। तब पीएम रहे चंद्रशेखर ने आपसी बातचीत से मसले को हल करने की कोशिश की। कोशिश नाकाम रही। इसी दौरान सितंबर में अयोध्या आंदोलन हवा देने के मकसद से आडवाणी ने रथयात्रा निकाली। सोमनाथ से शुरू हुई ये यात्रा अयोध्या में खत्म हुई। 1991 में बीजेपी की सरकार बनीं। मंदिर आंदोलन के चलते अयोध्या कारसेवक पहुंचने लगे। 6 दिसंबर 1992 को वीएचपी, बीजेपी और शिवसेना कार्यकर्ताओं ने विवादित बाबरी ढांचा गिरा दिया गया। 16 दिसंबर को पीएम पीवी नरसिम्हाराव ने अयोध्या मामले की जांच के लिए लिब्रहान कमीशन का गठन कर दिया। 2001 में वीएचपी ने एक बार फिर मंदिर बनाने की बात दोहराई। 2002 में गुजरात के गोधरा में एक ट्रेन पर हमला हुआ। माना जाता है कि ट्रेन में अयोध्या से लौट रहे कारसेवक थे। हमले में 58 लोगों की मौत हो गई। इसके चलते गुजरात में दंगे भड़क गए और एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। इसी दौरान हाईकोर्ट ने आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) से विवादित जगह पर यह जांच करने को कहा कि वहां मंदिर था या नहीं। अप्रैल 2002 में तीन जजों की बेंच ने इस पर सुनवाई शुरू की कि उस जगह का संबंध किससे है।


2003 में एएसआई ने बताया कि मस्जिद के नीचे एक मंदिर के सबूत मिले। सितंबर में कोर्ट ने 7 हिंदू नेताओं पर हिंसा भड़काने का केस चलाने को कहा। उस वक्त आडवाणी डिप्टी पीएम थे, लिहाजा उनपर कोई चार्ज नहीं लगा। 2004 में केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी। एक यूपी की अदालत ने कहा कि आडवाणी को दोषी नहीं बताने वाले ऑर्डर का रिव्यू होना चाहिए। जून 2009 में लिब्रहान कमीशन ने अपनी रिपोर्ट पेश की। इसमें विवादित ढांचा ढहाने में बीजेपी नेताओं को जिम्मेदार बताया गया। रिपोर्ट पर संसद में काफी हंगामा हुआ। 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसले सुनाया। इस फैसले के बाद मई 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के ऑर्डर पर स्टे देते हुए यथास्थिति बनाने की बात कही। 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की बहुमत की सरकार आई। 2015 में वीएचपी ने मंदिर के लिए पूरे देश से पत्थर इकट्ठा करने की बात कही। दिसंबर में दो ट्रक पत्थर अयोध्या पहुंचाए गए। महंत नृत्य गोपाल दास ने कहा कि मोदी सरकार ने मंदिर बनाने को हरी झंडी दे दी है। मार्च 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बाबरी मस्जिद ढहाने के मामले में आडवाणी समेत दूसरे नेताओं का नाम हटाया नहीं जाएगा। 21 मार्च 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मंदिर विवाद कोर्ट से बाहर आपसी सहमति से हल होना चाहिए। 




(सुरेश गांधी)
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