विशेष : बढ़ता तापमान - पिघलते हिमखंड

गत कुछ दशकों में वैश्विक तापमान निरन्तर बढ़ रहा है। बढ़ते प्रदुषण के कारण तापमान प्रभावित हो रहा है। जिसके कारण तीव्रता से जलवायू परिवर्तन हो रहा है। जुलाई 2016 गत वर्षों में सर्वाधिक गर्म मास रहा वहीं वर्ष 2016 सर्वाधिक गर्म वर्ष और यह स्थिति केवल भारत की नहीं बल्कि विश्व के लगभग सभी देश इससे प्रभावित व परेशान हैं। वर्ष 2017 के आरम्भ में जनवरी में बहुत कम सर्दी रही और फरवरी में अप्रैल जैसा मौसम। 18 अप्रैल को 40 से 46 तक का तापमान बहुत चिंतनीय है। 18 अप्रैल 2017 को दौसा में 46 डिग्री तापमान भविष्य के खतरे का स्पष्ट संकेत है। कहीं अति वर्षा, कहीं बर्फीला तुफान, कहीं कोई और प्राकृतिक आपदा यह सब जलवायू परिवर्तन का ही प्रभाव है। तापमान के निरन्तर बढ़़ने के कारण हो रहे जलवायू परिवर्तन से वर्षा प्रभावित हो रही है और समयानुसार व सामान्य वर्षा की बजाय असामयिक व असामान्य (अति या कम) वर्षा हो रही है। अति वर्षा से बाढ़ आती है और विनाश का कारण बनती है वहीं कम वर्षा से पानी की कमी होती है जो अन्यथा और दैनिक परेशानी का कारण बनती है। जल की आपूर्ति के लिए भूजल दोहन किया जाता है और इसी कारण देश भर में 50 प्रतिशत से अधिक भूजल ब्लाक डार्क जोन (खतरनाक स्थिति) में चले गए हैं और यह संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। 


तापमान को नियन्त्रण में रखने और गर्मी के मौसम में नदियों में जल आपूर्ति के लिए पहाड़ों पर हिमखंड (गलेशियर) का बहुत महत्व रहा है। बर्फ से ढ़के बहुत बड़े पर्वतीय भाग को हिमखंड (ग्लेशियर) कहते हैं और सर्दी में पहाड़ों पर जमने वाली बर्फ इसका विस्तार करती है। विश्व के भूूभाग का 150 लाख वर्ग कि.मी. लगभग 10 प्रतिशत क्षेत्र हिमखंड हैं। एक समय था जब 32 प्रतिशत भू क्षेत्र व 30 प्रतिशत समुद्री क्षेत्र हिमखंड (ग्लेशियर) था और उसे बर्फ युग कहा जाता था। कुल हिमखंड का एन्टार्क्टिक (दक्षीणी ध्रुव) में 84.5 प्रतिशत व ग्रीनलैंड में 12ः हिमखंड है। भारत में सबसे बड़े ग्लेशियर सियाचिन के अलावा गंगोत्री, पिंडारी, जेमु, मिलम, नमीक, काफनी, दरांग-र्दगं, हरी पर्वत, शीम्मे, रोहतांग, ब्यास कुंड, चन्द्रा, सोनापानी, ढाका, भागा, पार्बती, शीरवाली, चीता काठा, कांगतो, नन्दा देवी श्रंखला, पंचचुली, जैका आदि अनेक हिमखंड हैं। जम्मु कषमीर, अरुणाचल, सिक्किम, उतराखंड व हिमाचल में गर्मियों में सुहावने मौसम का श्रेय इन हिमखंडों को मिलता रहा है। 1995 व 1996 में अमरनाथ यात्रा के समय में स्वयं अनेक हिमखंड देखे थे और स्थानीय लोगों को उन पर ऐसे ही चलते देखा जैसे सड़क पर चलते हों। बढ़ते तापमान का प्रभाव मैदानी क्षेत्रों पर नहीं पर्वतीय क्षेत्रों पर भी स्पश्ट है और हिमखंडों की श्रंखला व क्षेत्र निरन्तर घटता जा रहा है जो एक और चिन्ता का विशाय है। पहाडों पर जहां अप्रैल में सामान्यतः 4-ं6 डिग्री तक तापमान रहता है वह गौमुख क्षेत्र में गत सप्ताह 14 डिग्री तक हो चुका है। चारों ओर बर्फ हीं बर्फ दिखने वाले पहाड़ी क्षेत्रों में भी कहीं .कहीं बर्फ दिखती है। मौसम विज्ञान केन्द्र देहरादून के निदेषक विक्रम सिंह अनुसार इस बार अप्रैल में सामान्य से 4 से 7 डिग्री तापमान अधिक है। हिमखंडों के ऐसे पिघलने से पानी की कमी और बढ़ेगी क्योकि आवष्यकता से पूर्व व अधिक मात्रा में पानी नदियों के माध्यम से समुद्र में चला जायेगा जिससे तापमान नियन्त्रण भी प्रभावित होगा। आवष्यकता है पृथ्वी दिवस पर हर व्यक्ति जल-ंउर्जा तथा प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करने का संकल्प करे तथा हर वर्श कम से कम एक वृक्ष अवश्य लगाये।  





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---रमेश गोयल---
मो. 9416049757
लेखक पर्यावरण एवं जल संरक्षण को समर्पित कार्यकर्ता, पर्यावरण प्रेरणा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा जल स्टार व अनेक पुरुस्कारों से सम्मानित हैं। 
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