विशेष आलेख : आडवाणी पर जिन्ना की साढ़ेसाती !!

राष्ट्रपति के दौड़ में सबसे आगे चल रहे लालकृष्ण आडवाणी पर एक बार फिर जिन्ना की काली छाया मंडराने लगी है। यह वहीं जिन्ना है जिसके मजार पर आडवाणी फूट-फूट कर रोएं। इसके बाद तो साढ़ेसाती की ऐसी छाया पड़ी कि न सिर्फ वह पार्टी से अलग-थलग पड़ गए, बल्कि प्रधानमंत्री बनने की ललक भी धरी की धरी रह गयी। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राष्ट्रपति बनने के ख्वाब को पलीता लग गया है। ऐसे में सवाल तो यही है क्या आडवाणी को किनारे लगाने की साजिश तो नहीं? या फिर श्रीराम के लिए लालकृष्ण आडवाणी, उमाभारती का सियासी बलिदान है? ये ऐसे सवाल है जो राजनीतिक गलियारों के आवोहवा में तैर रहे है 




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बेशक, भाजपा अगर आज यहां तक पहुंची है तो उसकी नींव राम जन्म भूमि आंदोलन ही है, जिसके सूत्रधार लाल कृष्ण आडवाणी ही थे। यह अलग बात है कि बाबरी विध्वंस के बाद आरोपी बनाएं जाने पर आडवाणी जिन्ना के मजार पर पहुंचकर छबि बेदाग करने की कोशिश  की, लेकिन उनका यह दांव उल्टा पड़ गया। यही से उनके राजनीतिक पतन की पटकथा लिखा जाने लगा। हालांकि संघ के रहमो करम पर वह उप प्रधानमंत्री तो बन गए, लेकिन उनका खोया हुआ आत्मसम्मान नहीं लौट सका। राम जन्म भूमि आंदोलन के कर्ताधर्ता अशोक सिंघल ने उनके राजनीतिक कद में ऐसा पलीता लगाया कि वह आज तक उबर नहीं सके। जिन्ना की मजार पर मत्था टेकने के हवाला देकर सिंहल यह साबित करने में सफल रहे कि आडवाणी सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक हिंदू हैं। आडवाणी का राम जन्म भूमि से कोई मतलब नहीं है। वह अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते मंदिर आंदोलन से जुड़े हैं। हालांकि सिंघल के इस बयान पर आडवाणी ने अपनी छबि बताने के लिए कई चालें चली, लेकिन संघ और विहिप की निगाह में अच्छे साबित नहीं हो सके, उल्टे सिंघल से तकरार बढ़ती गयी। यह तकरार इस कदर बढ़ी कि जब मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनवाने की पहल शुरु हुई तो सिंहल सबसे आगे रहे और संत समाज से लेकर संघ और भाजपा नेताओं को मोदी के पक्ष में खड़ा कर दिया। मोदी आज संघ, विहिप समेत भाजपा के एजेंडे पर चल रहे है। विकास और राष्ट्रवाद का मोदी ने ऐसा ताना-बुना है कि 2019 का लोकसभा चुनाव भी उनके पक्ष में जाता दिखाई दे रहा है। क्योंकि अब तक उिनके सामने मजबूत विपक्ष दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा है। 

फिरहाल, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजनीतिक बहस इस बात को लेकर तेज हो गयी है कि राष्ट्रपति के घुडदौड़ में सबसे आगे चल रहे लालकृष्ण आडवाणी की राजनीतिक कद और काठी किस मुहाने पर खड़ी होगी। या फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती याचिका देकर वह कोई तरकीब निकालेंगे?। हो जो भी लेकिन इतना तो तय है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लाल कृष्ण आडवाणी के राजनीतिक जीवन का पटाक्षेप होता दिख रहा है। जिंदगी लोगों को दोबारा मौका कम ही देती है। आडवाणी को कई मौके मिले। 2005 में पाकिस्तान के दौरे से लौटने के बाद साफ इबारत लिखी थी कि संघ और भाजपा में अब उनका स्वागत नहीं है। उन्होंने पद छोड़ने का मन बनाया पर तत्कालीन उप राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत की सलाह पर रुक गए और उसके बाद से अपनों से ही अपमानित होते रहे। 2009 में और फिर 2013 में उनको फिर अवसर मिला कि वे अपनों द्वारा सम्मानित हों पर उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। अब वह ऐसे मोड़ पर आ खड़े है जहां उनका पूरा राजनीतिक भविष्य ही दांव पर लग गया है। इसी साल जुलाई में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। आडवाणी और जोशी के नाम की चर्चा थी। लेकिन अब लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की राष्ट्रपति पद की नैतिक दावेदारी छिन जाएगी, क्योंकि जब तक फैसला होगा उससे बहुत पहले राष्ट्रपति का चुनाव हो जाएगा। यह अलग बात है कि आडवाणी एक-दो नहीं कई बार कह चुके हैं कि देश ने उन्हें जो स्नेह दिया है वह किसी भी पद से बढ़ कर है। फिर चेहरों पर चिंता क्यों? शायद इसलिए कि जो हुआ वह क्यों हुआ और कैसे हुआ? इसको लेकर चर्चाओं में जिस तरह आडवाणी का नाम रहा है, वह व्यथित करने वाला है। तो क्या राम मंदिर आंदोलन की परिणति आडवाणी को आज इस मुकाम पर ले आई है? आडवाणी कहते हैं- मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा और दशा बदल दी। मेरी राजनीत के लिए भी यह टर्निंग प्वाइंट रहा। 

हालांकि आडवाणी अभी दोषी करार नहीं दिए गए है। इसलिए कानूनी तौर पर राष्ट्रपति उम्मींदवार हो सकते हैं, लेकिन नैतिकता के तौर पर नहीं। क्योंकि भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है। यहां सभी संप्रदाय समान है। ऐसे में यदि किसी के खिलाफ भड़काउ भाषण और विवादित धार्मिक ढ़ाचा गिराने की साजिश का आरोप हो तो वह धर्म निरपेक्षता के विपरीत है। सवाल अगर राष्ट्रपति का है तो यहां नैतिकता का सवाल अहम हो जाता है। क्योंकि ऐसे लोगों को यह चुनाव नहीं लड़ना चाहिए जिनके उपर आरोप हो कि दो समुदायों में नफरत फैलाने के नजरिए से भड़काउ भाषण दिया गया। जबकि राष्ट्रपति पद की गरिमा है और इस तरह के आरोपों से घिरे व्यक्ति का चुनाव लड़ना नैतिकता के खिलाफ है। खासकर यह नैतिकता तब और बढ़ जाती है जब यह आरोप देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआइ की हो। यह अलग बात है कि इस केस में दो साल बाद सजा हो या न हों। लेकिन इसके परिणाम देश में हिंदुत्व राजनीति की धार और तेज होगी, से इंकार नहीं किया जा सकता। उमा भारती के बयान से इसके लक्षण दिखने भी लगी है। उमा भारती ने साफ शब्दों में कहा है कि सब खुल्लम खुल्ला किया, मंदिर बनेगा और कोई उसे रोक नहीं सकता। मतलब साफ है कि आने वाले दो वर्षों तक फिर राम मंदिर राजनीतिक मुद्‌दा बनेगा। इसमें धर्मनिरपेक्ष दलों और ताकतों की स्थिति सांप छछूंदर जैसी होनी है। वे चाहकर भी इस मुद्‌दे की उपेक्षा कर नहीं सकते। वैसे भी जनता भी मंदिर निर्माण के पक्ष में है। 


अगर भाजपा नेता आपराधिक साजिश के दोषी हुए तो जेल जाने तक की सजा संभव है। और यह फैसला उसी साल आ सकता है जिस साल लोकसभा चुनाव होने हैं, यानी 2019। कहा जा सकता है 2019 में एकबार फिर चुनावी केन्द्र बिन्दु श्रीराम मंदिर निर्माण होगा। यहां गौर करने वाली बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ‘अयोध्या में राम मंदिर बनेगा या नहीं, अयोध्या में राम मंदिर था या नहीं‘ से कोई लेना-देना नहीं है। गौरतलब है कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को हिंदू कारसेवकों ने तोड़ दी थी। इसको लेकर दो एफआईआर दर्ज हैं, जिसमें एक में उमा भारती और बीजेपी और वीएचपी के 21 बड़े नेता शामिल हैं। आज उनमें से कई की मौत हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की पिटीशन पर यह फैसला सुनाया। कोर्ट के इस फैसले का सर्वाधिक मजबूत कड़ी यह है कि इससे मुस्लिमों में कोर्ट के प्रति आदर बढ़ेगा, साथ ही यह भ्रम भी टूटेगा कि सीबीआई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दबाव में हैं। खासकर इसका सर्वाधिक फायदा उस वक्त मिलेगा जब मंदिर निर्माण के मसले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आयेगा। क्योंकि फैसला जिस किसी के भी हक में जाएं, माना जायेगा कि कोर्ट ने सही निर्णय दिया है। हालांकि अभी सीबीआइ द्वारा कोर्ट में साबित करना है कि भाजपा और विहिप आरोपी नेता विवादित ढांचा गिराने के षड़यंत्र के दोषी हैं या नहीं? 

बता दें, 6 दिसंबर, 1992 को देश भर से हजारों कार सेवक अयोध्या पहुंचे थे। विहिप, बजरंग दल सहित बीजेपी के तमाम बड़े नेता अयोध्या में मौजूद थे। सुबह करीब साढ़े दस बजे का वक्त था जब हजारों कार सेवक हजारों पुलिस वालों की मौजूदी में विवादित ढांचे तक पहुंच गये। हर किसी की जुबां पर उस वक्त जय श्री राम का ही नारा था। विवादित ढांचे तक पहुंचने के साथ ही भीड़ उन्मादी हो चुकी थी। इस वक्त तक ढांचे की सुरक्षा को खतरा पैदा हो चुका था। ढांचे के आसपास करीब एक लाख कार सेवक पहुंच चुके थे। अयोध्या में स्थिति भयानक हो चुकी थी। पुलिस के आला अधिकारी मामले की गंभीरता को समझ रहे थे लेकिन गुंबद के आसपास मौजूद कार सेवकों को किसी को रोकने की हिम्मत किसी में नहीं थी। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का साफ आदेश था कि कार सेवकों पर गोली नहीं चलेगी। तत्कालीन एसएसपी अखिलेश मेहरोत्रा बताते हैं कि हर किसी को अनहोनी की आशंका हो चुकी थी। अयोध्या पहुंचने वाले तमाम रास्ते बंद कर दिये गये। बाकी जो कार सेवक रास्ते में थे उन्हें वहीं रोक दिया गया। इसके बाद जैसे जैसे दिन चढ रहा था भीड़ उन्मादी होकर विवादित ढांचे को तोड़ने की तैयारी कर रही थी। वहां मौजूद हजारों पुलिस वालों में से किसी को रोकने की हिम्मत नहीं थी। अयोध्या में सुरक्षा के लिहाज से उस दिन दस हजार से ज्यादा पुलिस वाले लगाए गए थे। अयोध्या के तत्कालीन एसएचओ पीएन शुक्ला ने बताया कि भीड़ में हर कोई गुंबद को तोड़ने में नहीं जुटा था लेकिन माहौल ही ऐसा हो गया था कि उन्मादियों को वहां मौजद हर शख्स का मानो समर्थन मिल रहा था। दोपहर के तीन बजकर चालीस मिनट पर पहला गुंबद भीड़ ने तोड़ दिया और फिर 5 बजने में जब पांच मिनट का वक्त बाकी था तब तक पूरा का पूरा विवादित ढांचा जमींदोज हो चुका था। भीड़ ने उसी जगह पूजा अर्चना की और राम शिला की स्थापना कर दी। हजारों पुलिस वालों की मौजूदगी में करीब डेढ लाख लोगों की भीड़ इस घटना की गवाह बनी। बाद में तत्कालीन सीएम कल्याण सिंह ने इस घटना को अपने लिए खुशी का दिन बताया। इस घटना ने देश की राजनीति उसी दिन से बदलकर रख दी। 6 दिसंबर को विवादित ढांचा गिरा और इसके बाद केंद्र सरकार ने कल्याण सिंह की सरकार बर्खास्त कर दी थी। 




(सुरेश गांधी)
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