बिहार : चंपारण सत्याग्रह के तहत 21-22 अप्रील को बेतिया में दो दिवसीय अनशन

  • माले महासचिव काॅ. दीपंकर सहित भाग लेंगे वरिष्ठ नेता. मोतिहारी में आयोजित दो दिवसीय अनशन आज समाप्त, भाजपा और नीतीश सरकार सत्याग्रह का ढकोसला करे बंद.

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पटना 19 अप्रैल, भाकपा-माले राज्य सचिव कुणाल ने कहा है कि चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के अवसर पर हमारी पार्टी द्वारा चल रहे भूमि अधिकार सत्याग्रह के तहत आज मोतिहारी में दो दिवसीय अनशन समाप्त हो गया. पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य काॅ. धीरेन्द्र झा व केंद्रीय कमिटी सदस्य सरोच चैबे ने अनशनकारियों को जूस पिलाकर अनशन समाप्त करवाया. अनशन पर पार्टी के जिला सचिव काॅ. प्रभुदेव यादव, विष्णुदेव, भैरो दयाल सिंह आदि नेता बैठे हुए थे. दो दिवसीय अनशन के तहत माले नेताओं ने चास-वास की जमीन के अलावा, बटाईदार किसानों के पंजीकरण और मोतिहारी चीनी मिल के समक्ष अपने बकाये राशि के भुगतान के लिए प्रदर्शन कर रहे मजदूर-किसानों पर बर्बर लाठीचार्ज का मामला उठाया. उन्होंने आगे कहा कि भूमि अधिकार सत्याग्रह के कार्यक्रम की अगली कड़ी में आगामी 21-22 अप्रैल को पश्चिम चंपारण के बेतिया में दो दिवसीय अनशन किया जाएगा. इसमें पार्टी के महासचिव काॅ. दीपंकर भट्टाचार्य, पूर्व सांसद रामेश्वर प्रसाद, पार्टी विधायक सुदामा प्रसाद सहित वरिष्ठ पार्टी नेता भाग लेंगे.  उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा और नीतीश सरकार आज दोनों गांधी के सत्याग्रह की मूल आत्मा को खत्म करने में लगी है. यह बेहद हास्यास्पद है कि जिस समय नीतीश सरकार चंपारण सत्याग्रह का जश्न मना रही है, ठीक उसी समय मोतिहारी चीनी मिल के समक्ष अपने बकाये के भुगतान की मांग कर रहे मजदूर-किसानों पर बर्बर लाठीचार्ज किया जा रहा है, किसान आत्महत्यायें कर रहे हैं, लेकिन सरकार इन गंभीर प्रश्नों पर एक शब्द तक नहीं बोल रही.  उन्होंने कहा कि ठीक यही चुप्पी केंद्र सरकार की है. अपनी जायज मांगों को लेकर तमिलनाडु के किसान पिछले कई दिनों से जंतर मंतर पर आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन मोदी सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है. केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद जैसे लोग भी सत्याग्रह में शामिल होने का दावा कर रहे हैं, लेकिन इनके राज्यसभा फंड से भोजपुर जिले के अगिआंव में बड़े लोगों के घरों तक जानेे के लिए दलित-गरीबों के घरों को जबरदस्ती उजाड़ दिया गया. ऐसे लोग किस तरह का सत्याग्रह मना रहे हैं? माले राज्य सचिव ने कहा है कि दलित-गरीबों के चास-वास की जमीन, बटाईदारों के पंजीकरण आदि सवालों को चर्चा से बाहर रखकर सत्याग्रह का केवल ढकोसला और गांधी को अपमानित ही किया जा सकता है.

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