सम्पादकीय : "आम आदमी" से आम आदमी की टूटती उम्मीदें

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आपको सन 2011 याद होगा.जी हाँ,अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन.देश विदेश में तमाम सुर्खियां बटोरी इस आंदोलन ने.और इसी आंदोलन ने अन्ना हज़ारे के साथ साथ एक और व्यक्ति को राष्ट्रीय मानचित्र पर प्रमुखता दी,वो थे आज के दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविन्द केजरीवाल. अन्ना के साथ जिस तरह से अरविन्द केजरीवाल की सक्रियता देखी गयी, उससे आम जनता ही नहीं शायद अन्ना ने भी केजरीवाल में उम्मीद की एक किरण देखी होगी.प्रसिद्धि मिली ,लोगों का साथ मिला.हौसला इतना मिला कि 26 नवंबर 2012 को केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी नामक नई राजनीतिक पार्टी का गठन कर डाला.लोगों में उम्मीद की ऐसी किरण जगी कि महज एक साल बाद दिसंबर 2013 में दिल्ली विधान सभा चुनाव में दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी के "आम लोगों" को दिल्ली की सत्ता की चाभी सौंप दी.अरविन्द केजरीवाल मुख्यमंत्री बने. 49  दिन बाद फरवरी 2014 में केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.फिर भी लोगों ने साथ नहीं छोड़ा.फरवरी 2015  में पुनः अरविन्द केजरीवाल को दिल्ली की जनता ने पूरी बहुमत से मुख्यमंत्री की कुर्सी और उनकी आम आदमी पार्टी को दिल्ली की सत्ता पर काबिज कराया. यानि भरोसा तब भी कायम था क्योंकि लोगों को लगा था कि यह एक ऐसी पार्टी होगी जो भाई-भतीजावाद ,जातिवाद,भ्रष्टाचार आदि से दूर होगी, जनकल्याणकारी होगी.



लेकिन समय बीतते आम आदमी पार्टी में भी वही गुटबाजी,वही भ्रष्टाचार की सुगबुकाहटें ,परिवारवाद,यौन शोषण ,षड्यंत्र जैसे विशेषणों को वरीयता मिलती देख आम आदमी की उम्मीदें धाराशायी होने लगीं.धक्का तब और लगा जब पार्टी के संस्थापक सदस्यों को उपेक्षित कर धक्का दिया जाने लगा.पार्टी की प्राथमिक पहचान रहे वरीय सदस्य भी बाहर कर दिए गए. लेकिन सबसे ज्यादा चोट आम आदमी के दिल में अब लगी जब पार्टी के एक और प्रारंभिक दिनों से सदस्य और दिल्ली सरकार के मंत्री रहे कपिल मिश्रा ने पार्टी और सरकार के मुखिया अरविन्द केजरीवाल पर ही दो करोड़ रुपये घूस लेने का आरोप लगा दिया. रिश्तेदारों को सरकारी ठेका देने,गलत ढंग से चंदे का पैसा छुपाने ,विदेश यात्राओं सहित कई आरोप मढ़ डाला.हालाँकि ये आरोप अभी तक जांच के दायरे में ही हैं,लेकिन अरविन्द केजरीवाल की चुप्पी और घटता आत्मविश्वास इस बात को बल देता जान पड़ता है कि कहीं न कहीं दाल में काला तो जरूर है. 

सवाल सिर्फ इतना है कि अगर केजरीवाल पर लगे आरोप सच साबित होते हैं और भ्र्ष्टाचार के मामले पर जेल हो जाती है जैसा कि कपिल मिश्रा दावा कर रहे हैं तो क्या होगा? आम और राजनीतिक मठाधीशों के लिए तो यह सामान्य बात हो सकती है लेकिन भ्रष्टाचार विरोधी,लोकतान्त्रिक समाजवाद और लोकवाद के सैद्धांतिक आदर्शों पर स्थापित आम आदमी पार्टी से आम आदमी की उम्मीदों ,आम आदमी के सपनों का क्या होगा ?






* विजय सिंह*
वरिष्ट सम्पादक 
आर्यावर्त 
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