चंपारण में चीनी मिलों के कब्जे में है हजारो एकड़ सीलिंग की जमीन: माले

  • हरिनगर चीनी मिल की जमीन के वितरण के सवाल पर 31 मई को भूमि अधिकार सत्याग्रह सभा.
  • माले की केंद्रीय कमिटी सदस्य मीना तिवारी व विधायक दल के नेता चंपारण रवाना.
  • चीनी मिल प्रशासन गरीबों के बीच भय पैदा करने की कर रहा है कोशिश, प्रशासन बना बैठा है मूकदर्शक.


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पटना 30 मई, भाकपा-माले राज्य सचिव कुणाल ने कहा है कि भूमि अधिकार सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में चंपारण में इस्टेट, जमींदार और चीनी मिल के मालिक वास-चास की जमीन की मांग कर रहे गरीबों के बीच भय का माहौल पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं. जबकि पश्चिम चंपारण में हरिनगर चीनी मिल समेत कई चीनी मिलों के पास हजारों एकड़ जमीन है, जिस पर सीलिंगवाद या तो चलाया ही नहीं गया है या औपचारिकता पूरी की गयी है. हरिनगर चीनी मिल के गवन्द्रा फार्म के पास 5200 एकड़ सीलिंग से फाजिल जमीन है. इसी तरह इस्टेटों और बड़े भूपतियों की जमीन पर भी सीलिंगवाद की महज खानापूरी की गयी है. हरिनगर चीनी मिल के पास अतिरिक्त जमीन की शिनाख्त वहां के जिलाधिकारी द्वारा भी की जा चुकी है. कोर्ट का फैसला भी सीलिंग की जमीन का वितरण करवाने के संबंध में है, लेकिन अब तक गरीबों को जमीन नहीं मिल पाई है. हरिनगर चीनी मिल के पास पड़ी अतिरिक्त जमीन के वितरण के सिलसिले में कल 31 मई को रामनगर अंचल कार्यालय पर   भूमि अधिकार सत्याग्रह व सभा का आयोजन किया गया है. जिसमें भाग लेने के लिए पार्टी की केंद्रीय कमिटी सदस्य मीना तिवारी व विधायक दल के नेता महबूब आलम आज ही चंपारण रवाना हो चुके हैं. लेकिन चीनी मिल मालिक जनता के बीच अफवाह व भय फैलाकर इस सभा को स्थगित करा देने की कोशिश कर रहे हैं. प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है. सरकार व जिला प्रशासन का यह रवैया बेहद निंदनीय है. 


उन्होंने कहा कि भूमि का संकेन्द्रण देखते हुए चंपारण में विशेष भूमि न्यायाधिकरण किया जाना चाहिए. सभा में  भूमि आयोग की सिपफारिशों को लागू कर सके, चंपारण लैंड ट्रिब्यूनल का गठन करने, सभी गरीबों को वास भूमि देने, परचेधरियों को उनकी जमीन पर अधिकार दिलाने, चंपारण में मीलहों का शोषण बंद कम करने, पलायन व दरिद्रता-गरीबी खत्म करने आदि की भी मांग की गयी है. उन्होंने यह भी कहा कि चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष पर मोदी व नीतीश सरकार महज दिखावा कर रही है, उसे जनता व आम किसानों से कोई मतलब नहीं है. यहां तक कि आज वह एक तरफ गांधी का नाम ले रही है और दूसरी ओर सामंतों, इस्टेटों और बड़े चीनी मिल मालिकों का ही पक्ष ले रही है.
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