विशेष आलेख : आप तो सबसे बड़े हैं..फिर गरिमा का ख्याल क्यों नहीं?

karnan-and-judiciary
पिछले कुछ दिनों से कोलकाता उच्च न्यायालय के जज  सी.एस.कर्णन और देश के सर्वोच्च न्यायालय के बीच विवाद चर्चा में है. विवाद के कारण और तह में न जाते हुए इतना जरूर कहना चाहूंगा कि यह शुभ संकेत नहीं है.पिछले ढाई दशक की पत्रकारिता में मैंने पहली बार सुना ,पढ़ा कि किसी पदासीन जज को सर्वोच्च न्यायालय ने जेल भेजने की सजा सुनाई हो.यह भी पहली बार ही सुना कि किसी उच्च न्यायालय के पीठासीन न्यायाधीश ने सर्वोच्च न्यायालय के आठ न्यायाधीशों  समेत देश के मुख्य न्यायाधीश को ही पांच -पांच  वर्ष की सजा सुनाई हो,वह भी घर बैठ कर, तब जबकि उनके पास किसी भी तरह के आदेश देने का न्यायिक अधिकार ही नहीं था. ताजा घटनाक्रम में जहाँ सर्वोच्च अदालत की सात सदस्यीय पीठ ने कोलकाता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश कर्णन को अवमानना का दोषी मानते हुए छह महीने की जेल की सजा सुनाई है, वहीँ कुछ दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय से अधिकार रहित किये जाने के बावजूद जज कर्णन ने देश के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस जे.एस.खेहर सहित आठ जजों को ५-५ वर्षों की सजा सुनाई थी. यहाँ किसी अहम् का सवाल नहीं है,न ही किसी व्यक्ति विशेष का.सवाल देश की सबसे बड़ी अदालत का है,जिसकी गरिमा देश के सवा सौ करोड़ जनता के लिए सबसे जरुरी है.आज भी लोगों का विश्वास सुप्रीम कोर्ट के प्रति काफी ज्यादा है.आम धारणा हैं कि सर्वोच्च अदालत का फैसला भले देरी से हो पर न्यायपूर्ण और मान्य है.फिर उसकी गरिमा से कोई व्यक्ति खिलवाड़ कैसे कर सकता है वो भी न्यायपालिका के शिखर पर बैठ कर ? 


 किसी विषय या मुद्दे पर वैचारिक मतभेद हो सकता है .लेकिन कानून हाथ में लेकर या कानून का मजाक बना कर देश के कानून पालन करवाने की जिम्मेदार सबसे बड़ी संस्था की गरिमा को ही कठघरे में खड़ा कर अपना अहम् संतुष्ट करना संविधान संवत नहीं हो सकता. सुप्रीम कोर्ट ने शायद इसी गरिमा को ध्यान में रख कर जस्टिस कर्णन को छह माह के कैद की सजा सुनाई हो. सवा सौ करोड़ जनता की आशाओं को सिंचित करने वाले सुप्रीम कोर्ट को शायद अपनी रक्षा के लिए इससे उचित कदम नहीं सूझा होगा. हालाँकि यह देखना भी दुखद ही होगा कि एक पीठासीन न्यायाधीश को जेल जाना पड़े क्योंकि आज़ाद भारत के इतिहास में मेरी जानकारी में शायद यह पहली घटना होगी. देश के न्यायालयों में जजों को काफी सम्मान मिला है और किसी फैसले पर वो जो मुहर लगा दे वही सच मान लिया जाता है,भले ही कानूनी प्रावधानों के तहत आप आगे अपील पर जा सकते हों. जब इतना बड़ा सम्मान हो तो आपको भी बड़ा बनना होगा,प्रतिष्ठा समझनी होगी,गरिमा का ख्याल रखना होगा. इन सबके बीच सुप्रीम कोर्ट द्वारा जस्टिस कर्णन के बयानों को मीडिया में  प्रकाशन पर रोक भी अनुचित है.अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोक को भी सही कदम नहीं कहा जा सकता.न्यायपालिका किसी मामले में दोनों पक्षों को सुनती है ,मीडिया को भी दोनों पक्षों की बातों को जनता के समक्ष लाने का अधिकार है.




bijay singh

--विजय सिंह--
वरिष्ट सम्पादक 
आर्यावर्त 
Share on Google Plus

About आर्यावर्त डेस्क

एक टिप्पणी भेजें
loading...