नीतीश ने एक बार फिर की बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग

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पटना 28 मई, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विभाजन के बाद राज्य को हुये वित्तीय नुकसान, विकास की दौड़ में पिछड़ जाने और चौदहवें वित्त आयोग की अनुशंसाओं में विकास की अनदेखी किये जाने का हवाला देते हुये एक बार फिर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की है। श्री कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र की प्रति आज मीडिया में जारी की जिसमें कहा कि 14वें वित्त आयोग द्वारा राज्याें को अंतरित किये जाने वाले हिस्से को 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत किये जाने की अनुशंसा को आधार बनाते हुये केंद्रीय बजट में केंद्र प्रायोजित योजनाओं में राज्य को दी जाने वाली राशि में काफी कमी की गई, जिसका प्रतिकूल प्रभाव बिहार पर अधिक पड़ा है। उन्होंने कहा कि आयोग की सिफारशों के विरुद्ध बिहार को मिलने वाली अंतरित कर की राशि में कमी आई है। वर्ष 2015-16 में 7400 करोड़ रुपये और वर्ष 2016-17 में लगभग 6000 करोड़ रुपये की कमी आई है। इस प्रकार दो वर्ष में कुल 13400 करोड़ रुपये की कमी आई है। मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ने कर-अंतरण के फॉर्मूले में बढ़ोतरी का हवाला देतेे हुये अनुदान मद में राशि की कटौती कर रही है, जिससे बिहार जैैसे पिछड़े राज्य में विकास योजनाओं के क्रियान्वयन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2015-16 में केंद्र प्रायोजित योजनाओं में केंद्रांश की अनुमोदित राशि 23988 करोड़ रुपये थी जबकि वास्तविक रूप से राज्य को 15932 रुपये ही आवंटित हुये। इसी प्रकार वर्ष 2016-17 में अनुमोदित राशि 28777 करोड़ रुपये थी जबकि 17143 करोड़ रुपये ही प्राप्त हुये। इस तरह दो वित्त वर्ष में 19690 करोड़ रुपये कम प्राप्त हुये। श्री कुमार ने कहा कि बिहार जैसे पिछड़े राज्य के लिए यह चिंता की बात है कि राज्यों के बीच निधि के बंटवारे में 14वें वित्त आयोग ने जो फॉर्मूला दिया है उसके आधार पर कुल राशि में बिहार का हिस्सा 10.9 प्रतिशत से घटकर 9.665 प्रतिशत रह गया है। आयोग ने क्षेत्रफल तथा प्राकृतिक वनों की अधिकता को मान्यता दी है जबकि बिहार जैसे अधिक जनसंख्या घनत्व एवं स्थलरुद्ध राज्य की विशिष्ट समस्याओं की अनदेखी की है। उन्होंने कहा, “इस पृष्ठभूमि में हमारी मांग है कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलना आवश्यक है।” 


मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय विकास एजेंडा से संबंधित सभी 21 योजनाओं का वित्तीय पैटर्न 60:40 (केंद्रांश : राज्यांश) कर दिया गया है। पैटर्न में बदलाव के कारण राज्य सरकार को अपने स्रोतों से वित्त वर्ष 2015-16 में 4500 करोड़ रुपये केंद्र प्रायोजित योजनाओं में लगाने पड़े वहीं वित्त वर्ष 2016-17 में यह भार 4900 करोड़ रुपये रहा है। इससे स्पष्ट है कि राज्य को अपने संसाधन में से एक बड़ा भाग राज्यांश के रूप में प्रतिबद्ध करना पड़ रहा है जिससे राज्य की अपनी योजनाओं के लिए नगण्य राशि उपलब्ध हो पाती है। इसके चलते राज्य आदेयता आधारित नागरिक सुविधाओं और आवश्यकताओं की पूर्ति राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप नहीं कर पायेगा एवं क्षेत्रीय विषमता को दूर करने तथा राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल होने में असमर्थ होगा।  श्री कुमार ने कहा कि जिन राज्यों की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय आय के औसत से कम होे उनके केंद्र प्रायोजित योजनाओं में 90 प्रतिशत केंद्रांश दिया जाना चाहिए ताकि इन योजनाओं का समुचित क्रियान्वयन संभव हो सके एवं एक निर्धारित समय-सीमा के अंतर्गत इनके उद्देश्यों की पूर्ति हो सके।  मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछले अनेक वर्षों में दोहरे अंक का विकास दर हासिल करने के बावजूद भी बिहार विकास के प्रमुुख मापदंडों जैसे गरीबी रेखा, प्रति व्यक्ति आय, औद्योगिकीकरण और समाजिक एवं भौतिक आधारभूत संरचना में राष्ट्रीय औसत से पीछे है। बिहार को एक समय-सीमा में पिछड़ेपन से उबारने और राष्ट्रीय औसत के समकक्ष लाने के लिए नवाचारी सोच के तहत आवश्यक नीतिगित ढांचा तैयार करने की तत्काल आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2015-16 के आंकड़ों के अनुसार, बिहार की प्रतिव्यक्ति आय स्थिर मूल्यों (2011-12) पर 26801 रुपये है जबकि राष्ट्रीय औसत 77435 रुपये है। इस प्रकार राज्य की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का केवल 34.6 प्रतिशत है। 

श्री कुमार ने कहा कि राज्य के विभाजन के समय बिहार पुनर्गठन अधिनियम 2000 में यह प्रावधान किया गया था कि विभाजन के फलस्वरूप बिहार को होनेवाली वित्तीय कठिनाइयों के संदर्भ में योजना आयोग के उपाध्यक्ष के सीधे नियंत्रण में एक विशेष कोषांग गठित हाेगा और वह बिहार की आवश्यकताओं के अनुरूप विशेष अनुशंसायें करेगा। इस प्रावधान के आंशिक अनुपालन में बीआरजीएफ के तहत इस राज्य को सहायता दी जा रही थी लेकिन पिछले वर्षों में मांग के अनुरूप राशि नहीं दी जा रही है जिससे योजनाओं के क्रियान्वयन में भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और राज्य को अपने संसाधनों से राशि उपलब्ध करानी पड़ रही है। मुख्यमंत्री ने इस संदर्भ में रघुराम राजन समिति की अनुशंसाओं की ओर ध्यान आकृष्ट कराते हुये कहा कि समिति ने राज्यों के लिए समग्र विकास सूचकांक पेश किया था जिसके अनुसार देश के 10 सर्वाधिक पिछड़े राज्यों को चिन्हित किया गया था जिनमें बिहार भी शामिल था। उन्होंने कहा कि प्रतिवेदन में उल्लेख किया गया था कि सर्वाधिक पिछड़े राज्यों की विकास की गति बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार अन्य रूप में सहायता उपलब्ध करा सकती है लेकिन केंद्र सरकार की ओर से इन अनुशंसाओं पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। श्री कुमार ने कहा, “इस पृष्ठभूमि में हमारी मांग है कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिला अावश्यक है। विशेष राज्य का दर्जा मिलने से केंद्र प्रायोजित योजना में केंद्रांश के प्रतिशत में वृद्धि होगी। इससे राज्य को अपने संसाधनों का उपयोग अन्य विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं में करने का अवसर मिलेगा वहीं दूसरी ओर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों में छूट से निजी निवेश के प्रवाह को गति मिलती, जिससे युवाओं के लिए रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे। बिहार अपना पिछड़ापन दूर कर देश की प्रगति में योगदान करना चाहता है। हमारी विशेष राज्य के दर्जे की मांग इसी सोच पर आधारित है।” 

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