बेगूसराय : मज़ाक बन कर रह गया यह क़ानून

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प्रद्योत कुमार,बेगूसराय। जनता के हक़ और बेहतरी के लिए वर्ष 2005 में सरकार ने 'सूचना का अधिकार क़ानून" पारित किया जिसके अंदर आप सूचना मांग सकते हैं अपने हक़ और अधिकार को जानने के लिए लेकिन जब भी आप कोई सूचना मांगते हैं तो सरकारी अधिकारियों के द्वारा आपको आधे अधूरे सूचना देकर सिर्फ़ खानापूर्ति कर दी जाती है जो सर्वथा ग़लत है।क्षेत्रीय प्रबंधक सह केंद्रीय लोक सूचना पदाधिकारी भारतीय स्टेट बैंक,क्षेत्रीय व्यवसाय कार्यालय, बेगूसराय से सूचना मांगा गया।प्रधानमंत्री मुद्रा ऋण आवेदन को स्वीकार यह कहकर नहीं किया गया कि आप मेरे कार्यक्षेत्र में नहीं हैं,मुख्य शाखा बेगुसराय और पन्हाना शाखा ने भी मना कर दिया गया विगत दिनों उक्त सन्दर्भ में मौखिक रूप से गोपाल दास चीफ मैंनेजर क्षेत्रीय कार्यालय बेगूसराय से पूछे जाने पर उन्होंने कहा था कि दोनों शाखाओं ने ग़लत कहा है,दूसरी सूचना भी उसी ऋण के सन्दर्भ में माँगा गया जिसका दावेदार कोई और थीं,उक्त दोनों के संदर्भ में दिव्यांशु रंजन,क्षेत्रीय प्रबंधक से विधिवत सूचना मांगे जाने पर उनके द्वारा दिए गये जवाब का कोई मतलब नहीं है,उनका जवाब बस एक खानापूर्ती मात्र है।आपको बताते चलें कि हाल ही में ज़िलाधिकरी बेगूसराय मो0 नौशाद युसूफ ने सारे बैंक कर्मियों के साथ एक बैठक में भारतीय स्टेट बैंक पर ही सबसे ज़्यादा सवाल खड़े करते हुए सख़्त निर्देश भी दिये थे फिर भी स्थिति "ढ़ाक के तीन पात"जैसी है।उक्त क़ानून का जिस तरह से मज़ाक उड़ाया जा रहा है सरकारी कर्मियों के द्वरा ये एक गंभीर चिंता का विषय ज़रूर है।अगर इस इस क़ानून को बचाने के लिए उचित कार्रवाई नहीं की गई तो जनता का भरोसा  इस क़ानून से पूर्णतः उठ जाएगा जो फिर से सरकारी व्यवस्था पर एक सवाल खड़ा करेगा।सरकार,सरकारी तंत्र या क़ानून जनता की भलाई के लिए बनाया जाता है जो जनता के हित में कार्य करे ना कि जनता को परेशान करने के लिए लेकिन यहां होता उल्टा है।सभी सरकारी मशीनरी ख़ुद को जनता का सेवक कहती है और सच भी यही है लेकिन ये जनता का सेवक नहीं,शोषक के रूप में कार्य करती है या कर रही है।ऐसे सरकारी कर्मियों पर सख़्त से सख़्त कार्रवाई करनी चाहिए जो सरकार द्वारा बनाये क़ानून की अवहेलना करते हैं ताकि जनता का भरोसा क़ानून से ना उठ सके।

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