बिहार : मीडिया में महिला संघर्षों की जगह लगातार रही है घट, यह बेहद चिंताजनक.

  • आधी जमीन पत्रिका के रजत विशेषांक लोकार्पण पर ‘समकालीन मीडिया और महिलायें’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन.
  • सेमिनार में पटना विश्वविद्यालय के शिक्षिकाओं, महिला वकीलों और प्रबुद्ध नागरिकों ने लिया भाग.

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पटना 14 मई, महिलाओं की वैचारिक व आंदोलनात्मक पत्रिका आधी जमीन के 25 वर्ष पूरा होने पर पत्रिका के रजत विशेषांक का आज लोकार्पण आर ब्लाॅक स्थित इंस्ट्टियूशन आॅफ इंजीनियर्स हाॅल, पटना में संपन्न हुई. लोकर्पण पत्रिका की प्रधान संपादक मीना तिवारी, सह संपादक व पटना विश्वविद्यालय इतिहास विभाग की पूर्व शिक्षिका प्रो. भारती एस कुमार, मगध महिला काॅलेज की प्राचार्य धर्मशीला देवी, न्यायाधीश अंजना भगत, जानी मानी वकील अलका वर्मा, तलाश पत्रिका की संपादक मीरा दत्त, पत्रकार निवेदिता झा व सीटू तिवारी, ऐपवा की राज्य अध्यक्ष सरोज चैबे, राज्य सचिव शशि यादव, प्रो. रश्मि जायसवाल, प्रो. दीप्ति कुमारी आदि ने संयुक्त रूप से किया. इस मौके पर ऐपवा की पटना जिला सचिव अनीता सिन्हा, प्रबंध संपादक मधु, व आधी जमीन टीम की सहयोगी मंजू , विभा गुप्ता, समता राय, रचना, प्राची, प्रीति कुमारी, मनस्विनी, मंजू शर्मा आदि बड़ी संख्या में महिलायें उपस्थित थीं. लोकार्पण के अवसर पर सेमिनार हाॅल में उपस्थित महिलाओं को संबोधित करते हुए प्रो. भारती एस कुमार ने कहा कि आज से जब 25 वर्ष पहले लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में देश में दक्षिणपंथ का उभार हो रहा था और वैश्वीकरण की आड़ में आम लोगों, खासकर महिलाओं पर नए किस्म के हमले शुरू हुए, उस दौर में आधी जमीन पत्रिका का आरंभ हुआ. तब से लेकर आज तक आधी जमीन ने महिलाओं और प्रबुद्ध नागरिकों के बीच एक वैचारिक व आंदोलनात्मक पत्रिका के रूप में अपनी पहचान बनायी है. यह ऐसी पत्रिका है जो औरतों की आवाज बन गयी है. आज जब एक बार फिर महिलाओं पर नए प्रकार के हमले हो रहे हैं, इसकी भूमिका और भी प्रासंगिक हो जाती है. आज केवल कट्टरपंथ की ताकतों ने न केवल महिलाओं पर नैतिक पहरेदारी बैठा रखी है और अभिव्यक्ति की आजादी को कुचल देने पर आमदा है, बल्कि औरतें आज घर से बाहर तक तरह-तरह के उत्पीड़न की शिकार हो रही हैं. आधी जमीन घर हो या बाहर, औरतों के हर सवाल को अपना विषय बना रही है.



प्रधान संपादक मीना तिवारी ने कहा कि हमारी कोशिश रही है कि आधी जमीन पत्रिका महिलाओं के विभिन्न हिस्सों का प्रतिनिधि स्वर बने, चाहे खेत-खलिहान में काम करने वाली महिलायें हो या फिर घर-परिवार में जड़ जमायी पितृसत्तात्मक-मर्दवादी चिंतन से उबाल खा रही लड़कियों का प्रश्न हो, हम उस आक्रोश को अभिव्यक्त करना चाहते हैं और इस दिशा में हमने सफलता पाई है. आज हम आर्थिक आजादी के साथ-साथ जीवन के हर क्षेत्र में बराबरी के आंदोलन को देख रहे हैं, इसी स्वर को आधी जमीन ने जगह दी है. आज जहां मेन स्ट्रीम मीडिया में महिलाओं के संघर्ष व उनके आंदोलनों के लिए काफी कम जगह बची है, वैसी स्थिति में आधी जमीन जैसी पत्रिका सामाजिक बदलाव की दिशा में एक सार्थक हस्तक्षेप है. पत्रकार निवेदिता ने कहा कि आज बाजार की ताकतें मीडिया के भीतर गहरे रूप से प्रवेश कर गयी है और सारी नीतियां चंद कारपोरेट घराने के लोग तय कर रहे हैं. आज जब पढ़ने, लिखने, बोलने सब पर पाबंदी है, लोकतंत्रपसंद आवाम पर हमले हो रहे हैं, वैसे समय में समानान्तर मीडिया के जरिए ही हम अपनी बात कह सकते हैं. सोशल मीडिया के कारण आज कुछ हद तक लड़कियां अपने हक-अधिकार की बात खुलकर लिख रही हैं. वे न केवल अपने हक-अधिकार की चर्चा कर रही हैं, बल्कि पीरियड्स जैसी समस्याओं पर भी लिख रही हैं. आज भाजपा वाले तीन तलाक को जिस प्रकार से पेश कर रहे हैं, उसमें सांप्रदायिकता के पुट हैं, लेकिन हम देखते हैं कि मुस्लिम महिलाओं ने आज से 150 साल पहले भी इसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है. सीटू तिवारी ने कहा कि मीडिया महिलाओं का इस्तेमाल करना तो जानता है, लेकिन उन्हें मीडिया के भीतर नीति निर्माण इकाइयों में नहीं रखता. यह भेदभाव लगातार जारी है.
मगध महिला काॅलेज की प्राचार्य धर्मशीला देवी ने कहा कि पितृसत्ता का जो स्वर उपर दिखलाई देता है, उससे ज्यादा व कई गुणा वह अंदर तक जड़ जमाए हुए है. पितृसत्ता एक सोच है, जिसे बदलने के लिए हमें लगातार व अनवरत लड़ाई लड़नी होगी. हमें हर घर में इस लड़ाई को लड़ना है. मीरा दत्त ने कहा कि हम बेहद संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं, जब फासीवाद की ताकतें अपना सर उठा रही हैं. फासीवादी व लोकतंत्र विरोधी ताकतों का पहला हमला महिलायें बनती हैं. इसके प्रति हमें और सचेत होना होगा और अपनी आवाज बुलंद करनी होगी. गोष्ठी को अलका वर्मा, दीप्ति कुमार व मंजू शर्मा ने भी संबोधित किया.

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