आलेख : अंततः अमीन बाबा को मौत ने मात दे ही दी!

जी हां, हर रोज मौत को मात देने वाले अमीन बाबा को मौत ने मात दे ही ही दी। अमीन बाबा अब नहीं रहे। वह भदोही के पचभइया मुहल्ले के रहने वाले थे। ट्रेन के सामने खड़े होकर मौत की चुनौती देना उनका शगल बन गया था  




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बेशक, दुनियाभर में खूब ऐसे मामले सामने आते हैं, जिनमें मौत के करीब जाकर भी लोग जिंदा बच जाते हैं। लेकिन भदोही के अमीन खां उर्फ अमीन बाबा ऐसे शख्स थे, जो हर रोज मौत को चुनौती देते थे और उनके अदम्य साहस के आगे मौत हार मानकर लौट जाया करती थी। लेकिन 7 जून 2017 को हर रोज हार जाने वाली मौत ने इस बार छल से उन्हें मात दे ही दी। जी हां, सत्तर वर्षीय अमीन बाबा भदोही के पचभइया मुहल्ले में रहते थे। पिछले तीन दशक से भी अधिक समय से वह भदोही के गजिया रेलवे क्रासिंग के पास से गुजर रही हर उस ट्रेन के सामने खड़े हो जाते थे, जिसकी गति 50 से 100 किमी प्रति घंटा होती थी। लेकिन उन्हें मौत तो दूर खरोच तक नहीं लगती थी। ऐसा वह एक - दो नहीं, बल्कि दर्जनों बार करते थे, पर उनके चेहरे पर घबडाहट तो दूर सिकन तक नहीं होती थी। अब इसे चमत्कार कहें या सनकी या कुछ और, लेकिन यह सच है कि वह हर रोज मौत को चुनौती देते रहे। 


हालांकि यह कारनामा ‘गुलाम‘ पिक्चर में सीने स्टार शाहरुख खां ने भी की है, लेकिन वह फिल्मी स्टंट से ज्यादा कुछ नहीं था पर अमीन बाबा यह हरकत वास्तविकता में रोज करते थे। हर रोज सुबह वह घर से निकलकर गजिया रेलवे क्रासिंग पहुंच जाते थे। भदोही स्टेशन की तरफ से जो भी ट्रेन आती थी, उसकी गति चाहे 50 हो 100 किमी प्रति घंटा, वह सधे अंदाज में उसके सामने खड़े हो जाते थे। जब उनके व ट्रेन के बीच फासला महज चार-छह इंच ही होता था तब अमीन बाबा अपनी भुजाओं की 180 डिग्री का फेरा लगाते हुए पैरों को इस कदर चंद सेकेंड में आगे बढ़ाते कि ट्रेन गुजर जाती और मात्र दो फीट की दूरी पर खड़े होकर मुस्कराते थे। उनकी इस हरकत पर एक दिन मेरी नजर पड़ी और मैं तो क्या वहां खड़ा हर शख्स के मुंह से बस एक ही बात निकली, बाबा तो गए! यह संयोग ही था कि इस वाकये के तीन पहले ही मेरी देश के नंबर वन टीवी न्यूज चैनल ‘आजतक‘ में नियुक्ति हुई थी। मैने एसाइनमेंट के परमीशन बगैर अमीन बाबा के इस हरकत को अपने वीडियों कैमरे में कैद कर लिया। इस वीडियों को लेकर मैं लखनउ आजतक के ब्यूरोचीफ अनूप श्रीवास्तव को दिखाया। इस वीडियों को देखकर वह एकबारगी चैक गए, कहा, वाह कमाल का है बाबा। धडाधड़ वीडियों की आडिटिंग हुई और 25 जुलाई 2008 को सायंकाल ठीक पौने 6 बजे टीवी स्क्रीन पर बाबा के कारनामा वाला वीडियों दौड़ने लगी। पूरे नौ मिनट के इस खबर में पांच मिनट तक मैने फोनो देता रहा। ‘मरोगे क्या बाबा‘ - ‘सनकी बाबा‘ के हेडलाइन स ेचल रही इस खबर को आज तक के स्टूडियों में मौजूद नवजोत मुझसे प्रश्न पर प्रश्न पूछे जा रही थी, बाबा के कारनामों के लगायत। 

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अमीन बाबा ने मुझे बताया कि जब वह 15 साल के थे, तो एक दिन रात साढ़े आठ बजे ‘एशा‘ की नमाज पढ़ने मस्जिद में गया। सभी लोग नमाज बाद घर लौट गए, लेकिन मैं मस्जिद में ही कुछ सोचता रहा और नींद आ गयी। जब रात में आंख खुली तो मुझे लौ स्वरुप रुहानी जिस्म दिखाई दी। कुछ देर के लिए मैं बेहोश हो गया, लेकिन होश आने पर मुझे एक अजीब-ओ-गरीब शक्ति महसूस होने लगी। एक दिन में गजिया रेलवे क्रासिंग स्थित मजार पर अपने कुछ साथियों के साथ बैठा रहा और न जाने कब क्रासिंग पर पहुंचकर ट्रेन के सामने कारनामा करने लग या। उनके इस हरकत को देख लोग चैंक गए थे, लोगों की चिंखे निकल गयी। इसकी जानकारी जब मेरे घर वालों को हुई तो मेरी बीबी व बच्चे डांटने लगे, क्रासिंग जाने पर पाबंदी लगा दी। बावजूद इसके मैं वहां पहुंच जाता था और यह सब करने के बाद ही मुझे सुकून मिलता था। एक बार तो मेरे इस हरकत पर एक ट्रेन ड्राइवर ने डंडा मार दिया था, मेरा सिर फट गया था, लेकिन यह स बवह करते रहे। इससे आजिज आकर घर वालों ने मुझे मुंबई भेज दिया। ना जाने कैसे मैं फिर कुछ ही दिन बाद मुंबई से लौटकर फिर से ट्रेन के सामने खड़ा होने लग गया। जब लोगों को यकीन हो गया कि बाबा का कुछ नहीं होगा तो फिर कोई मना भी नहीं करता था। यह अलग बात है कि उनके इस स्टंट को करने के चक्कर में भदोही के जलालपुर मुहल्ले के एक युवक की मौत हो गयी थी। 


फिरहाल, ‘मरोगे क्या बाबा‘ जिस वक्त आज तक के टीवी स्क्रीन पर खबर चल रही थी, उस वक्त मेरे मोबाइल पर दिल्ली, मुंबई, कोलकाता समेत देशभर से सैकड़ों फोन आएं और लोगों ने इस खबर को शूट करने के लिए बहुत बहुत बधाई दी। टीवी न्यूज चैनल पर यह मेरी पहली खबर होने के चलते मैं भी बेहद खुश था। इस खबर को मैने दैनिक समाचार पत्र ‘हिन्दुस्तान‘ में भी भेजी और बाइलाइन के साथ सभी संस्करणों में प्रमुखता से छपी। इस खबर से मुझे काफी ख्याति मिली। आज सुबह मुझे जब अमीन बाबा के इंतकाल की खबर मिली तो जोर का झटका धीरे से लगा, लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। बताया गया  िकवह एक सप्ताह से बीमार थे। उनका इलाज चल रहा था, अचानक दिल का दौरा पड़ा और इस दुनिया से रुख्शत हो गए। जब दिल का दौरा पड़ने की खबर सुनी तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि इतना मजबूत, अदम्य साहसी व्यक्ति को भी दिल का दौरा पड़ सकता है। क्योंकि उनकी उम्र 70 वर्ष थी, लेकिन शरीर का वजन मात्र चालीस किलोग्राम ही था। यह आश्चर्य नही ंतो और क्या है। यह कुदरत का करिश्मा ही था कि जिस 100 किमी की गति से चलने वाली ट्रेन के सामने 40 किग्रा वजन वाला व्यक्ति खड़ा होता था उसे हवा का बेग भी नहीं डिगा पाता था, उसका दिल इतना कमजोर हो कि दौरा पड़ जाए।  





(सुरेश गांधी)
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