पुस्तक समीक्षा : शरद यादव संघर्ष के सेनानी: परत-दर-परत खंगालने का प्रयास

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40 साल से अधिक समय से भारतीय राजनीतिक की समाजवादी धारा की अगुआई कर रहे शरद यादव के संघर्ष का अंत नहीं। आज भी अपने सरोकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनका सरोकार समाज के वंचित, कमजोर और उपेक्षित वर्गों व जाति के सम्‍मान का सरोकार है, उनके हक का सरोकार है और सबसे बड़ा सरोकार लोकतंत्र को लोकतांत्रिक बनाये रखने का सरोकार है। शरद इन्‍हीं सरोकारों के लिए संघर्ष करते रहे हैं। 1974 में वे पहली बार जबलपुर से उपचुनाव में लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। उसके बाद उनकी संसदीय यात्रा अनवरत जारी रही। वे मध्‍यप्रदेश के बाद उत्‍तर प्रदेश और फिर बिहार की राजनीति में सक्रिय रहे है। और 1991 से वे बिहारी राजनीति के अभिन्‍न हिस्‍सा हो गये। शरद यादव से जुड़ी ये सभी जानकारी सार्वजनिक हैं। इन जानकारियों को सहेजने और संग्रहित करने का सार्थक और महत्‍वपूर्ण प्रयास मनोज कृष्‍णन ने किया है। मनोज ने वी. माधवन और राज नारायण समेत अन्‍य सहयोगियों के साथ शरद यादव से जुड़ी जानकारी, तस्‍वीरों और घटनाओं को एक पुस्‍तक का रूप देने का प्रयास किया है। यह प्रयास भारतीय राजनीति के अध्‍ययनरत लोगों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकता है। पुस्‍तक तथ्‍य और सूचनाओं से ज्‍यादा तस्‍वीरों से उपयोगी बन पड़ी है। शरद यादव की बचपन से लेकर अब तब की बेहतर और घटनाप्रद तस्‍वीरों को सहेजने का प्रयास किया गया है। दरअसल तस्‍वीरें ही इस पुस्‍तक की पहचान हैं। उनके व्‍यक्तिगत, पारिवारिक, आयोजनगत और विदेशी मेहमानों के साथ की तस्‍वीरें पाठक का ध्‍यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं। तथ्‍य और सूचनाएं भी महत्‍वपूर्ण हैं। उनकी भी उपयोगिता है, लेकिन तथ्‍यों पर तस्‍वीरें भारी पड़ रही हैं।


पुस्‍तक में विशिष्‍ट व्‍यक्तियों के संदेश भी शरद यादव के राज‍नीतिक जीवन संघर्ष को समझने में काफी मददगार साबित हो रहे हैं। राष्‍ट्रपति प्रणव मुखर्जी, उपराष्‍ट्र‍पति हामिद अंसारी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह, पीए संगमा समेत विभिन्‍न राज्‍यों के मुख्‍यमंत्री, विभिन्‍न पार्टियों के वरिष्‍ठ नेताओं और पत्रकारों के संदेशों को संग्रहित किया गया है। पुस्‍तक में कुछ तथ्‍यगत गलतियां भी हैं। पुस्‍तक के पेज 29 पर ‘किंगमेकर की भूमिका में’ उपशीर्षक में 1989 में वीपी सिंह के प्रधानमंत्री चुने जाने की प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी दी गयी है। इसमें कर्पूरी ठाकुर का जिक्र भी है, जबकि कर्पूरी ठाकुर का देहांत 1988 में हो गया था। ‘कॉफी टेबुल बुक’ के रूप में प्रकाशित यह पुस्‍तक शरद यादव को समझने का सार्थक प्रयास है। इसका प्रकाशन मानक प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड ने किया है। इसकी कीमत 750 रुपये है। संपादक मंडल, सलाहकार मंडल समेत पूरी टीम ने इस पुस्‍तक के प्रकाशन में अपना सहयोग दिया है। इस पुस्‍तक में शरद यादव ने अपनी ओर से कुछ नहीं लिखा है। लेकिन अपने संस्‍मरणों के सहारे उन्‍होंने बहुत कुछ बताने का प्रयास किया है और वही संस्‍मरण पुस्‍तक के प्राण तत्व बन गये हैं। 




साभार  : बिरेन्द्र यादव 

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