केंद्र की कृषि नीति किसानों के साथ विश्वासघात : जदयू

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पटना 13 जून, जनता दल यूनाईटेड (जदयू) ने केंद्र सरकार पर किसानों को बदहाली की स्थिति में पहुंचाने का आरोप लगाते हुये आज कहा कि अन्न उत्पादक किसान यदि खुद दाने-दाने को मोहताज हो जायें और अपने जीवन की बुनियादी जरूरतों के लिए भी आत्मनिर्भर न रह जायें तो इसका सीधा मतलब यही है की देश की कृषि नीति और कृषि व्यवस्था ने किसानों के साथ विश्वासघात किया है। जदयू के प्रदेश प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद और निखिल मंडल ने यहां संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा कि देश का कृषि क्षेत्र एक भयावह दौर से गुज़र रहा है जिसमें किसान पूर्ण रूप से हाशिये पर चले गए हैं। देश के लिए अन्न उत्पादन करने वाले किसान यदि खुद दाने-दाने को मोहताज हो जायें और अपने जीवन की बुनियादी जरूरतों के लिए भी आत्मनिर्भर न रह जायें तो इसका सीधा मतलब यही है की देश की कृषि नीति और कृषि व्यवस्था ने किसानों के साथ विश्वासघात किया है। श्री प्रसाद ने कहा कि लोकसभा चुनाव के दौरान जब खाद्यान्नों के लागत मूल्य में 50 प्रतिशत मुनाफा जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करने की बात कही गयी तो ये उम्मीद जरूर थी की इस नीतिगत बदलाव से किसानों की स्थिति सुधरेगी लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार की वादाखिलाफी से यह स्पष्ट हो गया है की किसानों के मुद्दे को लेकर उनकी रूचि कभी थी ही नहीं और भाजपा कृषि क्षेत्र के विकास को लेकर गंभीर नहीं है। उन्होंने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम पर किसानों के साथ धोखा हुआ है। जदयू प्रवक्ता ने कहा कि मध्यप्रदेश के मंदसौर में भाजपा सरकार प्रायोजित किसानों की हत्या के बाद भाजपा नेताओं के द्वारा यह दलील दी गई कि सरकार निर्णायक कदम उठाते हुए कर्ज माफ़ी की प्रक्रिया शुरू करेगी ताकि किसानों के ऊपर से आर्थिक बोझ कम हो सके। उन्होंने कहा कि हालांकि कल केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली के इस बयान से कि केंद्र सरकार का ऋण माफ़ी से कोई लेना देना नहीं है और यदि ऋण माफ करना भी हो तो इसके लिए पैसों के इंतज़ाम की जिम्मेवारी राज्य सरकारों की होगी ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि केंद्र सरकार के लिए किसानों के मुद्दे कोई मायने नहीं रखते हैं।


श्री प्रसाद ने कहा कि अफ़सोसजनक बात यह थी की उसी संवाददाता सम्मेलन में वित्तमंत्री बड़ी कंपनियों और कारोबारियों की ओर से नहीं चुकाए गए हज़ारों करोड़ रुपये की ऋणमाफ़ी के लिए बैंकों द्वारा तैयार किये जा रहे मसौदे का विस्तार से जिक्र कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आर्थिक आंकड़ों के परिपेक्ष में देखें तो सिर्फ भाजपा के शासन काल में पूंजीपतियों द्वारा नहीं चुकाए गए ऋण में दो लाख 61 हज़ार 843 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है जिसे सरकार द्वारा माफ़ किये जाने की बात वित्तमंत्री कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसी तरह पिछले दो वित्तीय वर्ष में केंद्र सरकार नें पूंजीपतियों को कर एक लाख 33 हज़ार 777 करोड़ रुपये की छूट दी है। इन तथ्यों के आधार पर एक बात स्पष्ट है कि कृषि क्षेत्र में बदलाव को लेकर भाजपा जो बातें कह रही हैं उसका कोई आधार नहीं है और यदि यही स्थिति रही तो कृषि क्षेत्र पूरी तरह से बर्बाद हो जायेगा। जदयू प्रवक्ता ने कहा कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को किसानों की हितकारी योजना के रूप में प्रस्तुत किया गया है लेकिन इस योजना से सम्बंधित आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद जो तथ्य सामने आ रहे हैं वह हैरान करने वाले हैं। वर्ष 2016 के खरीफ के फसल के दौरान देश में केवल तीन करोड़ 70 लाख किसानों ने कृषि बीमा कराया। इसमें से दो करोड़ 69 लाख ऐसे किसान थे जिनको बैंक ने ऋण दिया था जबकि सिर्फ एक करोड़ एक लाख किसान ही ऐसे थे जिनके ऊपर ऋण न होते हुए भी उनका बीमा करवाया गया। इसका सीधा मतलब है कि जो किसान ऋण ले रहे हैं उन्हीं को बीमा करने में प्राथमिकता दी जा रही है। श्री प्रसाद ने कहा कि वर्ष 2015 के खरीफ फसलों के लिए 2.10 करोड़ ऋणधारक किसानों का बीमा किया गया जबकि इस वर्ष केवल 98.4 लाख ऐसे किसानों का बीमा किया गया जिन्होंने कोई ऋण नहीं लिया था। उन्होंने कहा कि सालाना आधार पर बीमाधारकों की वृद्धि का अनुपात से यह खुलासा होता है कि ऋण लेने वाले किसानों की बीमा होने की वृद्धि दर 28 प्रतिशत थी जबकि गैर ऋणधारक किसानों के लिए यह आंकड़ा महज तीन प्रतिशत था। ऐसे में क्या यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं होगा कि मूलरूप से सिर्फ उन्ही किसानों का बीमा हो रहा है जो बैंक से लोन ले रहे हैं और बैंक किसानों को लोन देते वक़्त अपने पैसों को सुरक्षित करने के लिए किसानों से जबरदस्ती बीमा करवा रहा है जिसका सीधा फायदा बैंक और बीमा कंपनियों को मिल रहा है।

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