विशेष आलेख : किसान आक्रोश के निहितार्थ और हिंसा

मध्यप्रदेश के मंदसौर में किसानों के हिंसक आंदोलन के बाद एक बार फिर से देश में किसानों की दुर्दशा उजागर हुई है। यह बात सही है कि भारत कृषि प्रधान देश है, लेकिन वर्तमान में ऐसा दिखाई देता है कि यह बात केवल बोलने तक ही सीमित रह गई है। सरकारों की दृष्टि में कृषि की प्रधानता को कितना महत्व दिया जाता है, यह किसी से छुपा नहीं है। अगर महत्व दिया गया होता तो संभवत: देश का किसान आज भयावह स्थिति की ओर नहीं जाता। सवाल यह आता है कि कृषि प्रधान देश का किसान आज बदहाली के मार्ग पर क्यों जा रहा है? स्वतंत्रता मिलने के बाद देश में कृषि को प्रधानता दी जाती तो संभवत: किसानों के सामने आज जीने मरने के हालात पैदा नहीं होते। यह एक कड़वी सच्चाई है कि सरकार कितने ही दावे करे, लेकिन कृषि पर आश्रित किसान का परिवार आज ऐसे दोराहे पर खड़ा हुआ दिखाई दे रहा है, जहां से कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। कौन नहीं जानता कि आज गांव खाली होते जा रहे हैं, ग्रामीण जीवन अभिशप्त होता जा रहा है। मंदसौर किसान आंदोलन के बाद उपजे हालातों में सरकार भले ही इसका आरोप कांगे्रस पर लगाने की कवायद करे, लेकिन यह सत्य है कि किसान लगातार बदहाली के मार्ग पर जा रहा है। जो प्रयास हो रहे हैं वे निरर्थक प्रमाणित हो रहे हैं। यह बात भी सही है कि आज से बीस वर्ष पूर्व प्रदेश में जब कांगे्रस की सरकार थी, उस समय किसानों की स्थिति आज के मुकाबले ज्यादा खराब रही, लेकिन आज अच्छे हैं, ऐसा दावा भी नहीं किया जा सकता। मंदसौर में जो कुछ हुआ वह चिन्ता का विषय है। कांगे्रस की उसमें भूमिकी रही होगी, यह भी स्वाभाविक है। क्योंकि मध्यप्रदेश में कांगे्रस विपक्षी दल की भूमिका में है। विपक्षी दल होने के नाते उससे सरकार के समर्थन की अपेक्षा करना संभव ही नहीं है। सरकार की ओर से भी कहा गया है कि इस आंदोलन के पीछे कांगे्रस का हाथ है। यह सही भी हो सकता है, लेकिन संभावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि आंदोलन में असामाजिक तत्व भी शामिल हो गए थे, ऐसे में सवाल आता है कि अगर असामाजिक तत्व शामिल थे तब सरकार का गुप्तचर विभाग क्या कर रहा था। क्या यह सरकार की असफलता नहीं कही जाएगी। यह बात सही है कि वर्तमान में हमारे देश में कई प्रदेशों में खेती की स्थिति इतनी विकराल हो गई है कि किसान जीवन को समाप्त करने जैसा कदम उठाने लगा है। महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की बात की जाए तो दोनों ही प्रदेश इस मामले में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ करते दिखाई देते हैं। सबसे बढ़ा सवाल यह है कि पूरे देश का पेट भरने वाले किसान आज खुद क्यों मरने की हालात में पहुंचा है। इसके लिए हमारी सबकी सोच भी जिम्मेदार है। वर्तमान में भारत में जिस प्रकार से अर्थ आधारित जीवन की कल्पना का प्रादुर्भाव हुआ है, तब से हमारे देश के युवा नौकरी की तलाश में गांव से पलायन करने लगे हैं। इसके विपरीत आज मध्यप्रदेश ने कृषि के क्षेत्र में व्यापक सुधार किया है। तब सवाल यह है कि किसान आंदोलन करने के लिए बाध्य क्यों हुआ? इसके पीछे किसका ‘हाथ’ है। मध्यप्रदेश के मंदसौर में किसानों के हिंसक आंदोलन और कथित गोली चालन की घटना के बाद उपजे हालातों ने कई प्रकार के संदेहों को जन्म दिया है। मध्यप्रदेश की राजनीति में इसके निहितार्थ भी तलाशे जाने लगे हैं। किसान अपनी मांगों के लिए आंदोलन कर रहे हैं, और करना भी चाहिए, लोकतंत्र में सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए आंदोलन एक उचित माध्यम है। लेकिन यह आंदोलन हिंसक कैसे हुआ। क्या यह सब एक सोची समझी राजनीति का हिस्सा है? इसका उत्तर फिलहाल दे पाना संभव नहीं हैं। लेकिन ऐसे आंदोलन जनता के लिए अत्यंत कष्टकारी होते हैं। हमारे देश का दुर्भाग्य है कि ऐसे आंदोलनों को राजनीतिक समर्थन भी मिल जाता है। भारत की राजनीति में यह सर्वथा सत्य है कि सत्ताधारी दल कभी आंदोलन नहीं करता, इसके विपरीत विपक्षी राजनीतिक दल छोटे से मुद्दे पर भी विरोध करने की राजनीति करते हैं। यही विपक्षी दल किसी अन्य संस्था द्वारा सत्ता के विरोध में किए जाने वाले आंदोलन को आंख बंद करके समर्थन देते हैं। जिसके कारण ऐसे आंदोलन में समझौता होने की गुंजाइश समाप्त हो जाती है। चार दिन पूर्व समझौते की ओर जाने वाला यह आंदोलन किसके ‘हाथ’ के कारण जारी रहा। क्या इसके पीछे विपक्षी दल हैं या प्रदेश को अराजकता के मार्ग पर ले जाने की राजनीतिक साजिश है? मध्यप्रदेश सरकार ने साफ शब्दों में कहा है कि गोली चलाने में पुलिस का कोई हाथ नहीं है। फिर प्रश्न यह आता है कि वह ‘हाथ’ किसका है। मध्यप्रदेश में हुए किसान आंदोलन के पीछे कौन सी राजनीति काम कर रही है। यह बात सही है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस लम्बे समय से सत्ता से दूर है। वह हर हालत में सत्ता में वापसी करने के लिए अवसर पैदा करना चाहती है। कोई आंदोलन होता है तो कांगे्रस बिना सोचे समझे उस आंदोलन को हवा देने का काम करती हुई कई बार दिखाई दी। इस किसान आंदोलन में किसकी क्या भूमिका है, यह तो हम नहीं कह सकते, लेकिन इतना जरुर है कि आंदोलन को हिंसक बनाने में किसी न किसी का ‘हाथ’ तो है। इस ‘हाथ’ के पीछे राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का उद्देश्य भी हो सकता है। अगर ऐसा है तो यह प्रदेश की भलाई के लिए कम, स्वार्थी कदम ज्यादा माना जाएगा। सवाल यह भी आ रहा है कि राजनीतिक उत्थान के लिए किए जा रहे इस आंदोलन से किसानों का कितना भला हो सकेगा? यह जरुर हो सकता है कि इससे विपक्षी दलों को लाभ मिल जाए, लेकिन जनता की भलाई नहीं हो सकती। मध्यप्रदेश में लम्बे समय से राजनीतिक वनवास भोग रही कांगे्रस के नेता अपने बयानों से यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि वे ही जनता के सच्चे हितैषी हैं। उनके बयानों में सत्ता पाने की छटपटाहट साफ देखी जा रही है। परंतु सवाल यह आता है सत्ता पाने के लिए ऐसे आंदोलन करना कहां तक उचित है।

किसानों के सामने फसल की सिंचाई करने का अभाव है, सरकार केवल दावे ही करती है, लेकिन धरातल पर इसकी परिणति नहीं हो रही है। आसमानी बारिश से सिंचाई के समुचित साधन उपलब्ध नहीं होने के कारण अब मजबूरन छोटे किसानों को रास्ते बदलने पड़ रहे हैं। बाजार में कीमतें आसमान छू रही हैं और छोटे के किसानों के पास नकदी की कमी है। ऐसा इसलिए भी हो रहा है कि किसान के अन्य किसी प्रकार का आय का स्रोत नहीं है। जो फसल किसान उगाता है, उसे तुरंत बेच देता है, क्योंकि उसे अपना कर्जा उतारना होता है। इसके बाद सारी फसल का लाभ वे व्यापारी ही उठाते हैं, जो फसल के खरीदार होते हैं। किसान को इसका सीधा लाभ कभी नहीं मिल पाता। सोचने वाली बात यह भी है कि किसान अपने उत्पाद को लेकर बाजार में जाता है, तो उसे बाजार भाव के अनुकूल दाम नहीं मिलते। यह विडंबना ही है कि पर्यावरण प्रदूषण के कारण अब समय पर मॉनसून नहीं आता और न किसानों को समय पर सिंचाई से साधन मिल पाते हैं। इसके लिए किसान सहित सारा समाज भी दोषी है। हम जाने अनजाने में अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति का विनाश करते जा रहे हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से मानव जीवन के साथ एक खिलवाड़ भी है। पेड़ पौधों को काटने के कारण हम मानसून की गति को तो प्रभावित कर ही रहे हैं, साथ ही कई प्रकार की बीमारियों को भी आमंत्रित कर रहे हैं। अगर हम पर्यावरण के लिए अभी से सचेत नहीं हुए तो आने वाला समय और भी ज्यादा खतरनाक ही होगा। हालांकि, सरकार ने किसानों के नाम पर अनेक परियोजनाओं की शुरूआत की है, लेकिन वह भी मॉनसून की बारिश की तरह सिर्फ पानी का छिड़काव के समान है। सरकार को किसानों की दशा सुधारने के लिए कुछ न कुछ पहल जरूर करनी होगी। जल प्रवाहित करने वाली नदियों के संरक्षण और संवर्धन पर जोर देना होगा। जिस दिन भारत में फसल सिंचाई के साधन फलीभूत होंगे, उस दिन सही मायने में भारत कृषि प्रधान देश की परिभाषा को सार्थकता प्रधान करेगा।




 सुरेश हिन्दुस्थानी
झांसी, उत्तरप्रदेश पिन- 284001
मोबाइल-09455099388
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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