लालू परिवार से ही चल रहा मीडिया का रोजगार : तेजस्वी

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पटना 15 जून, बिहार के उप मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी यादव ने मीडिया को अपने पिता के खिलाफ दुष्प्रचार से बाज आने की नसीहत देते हुए आज कहा कि लालू परिवार के कारण ही मीडिया के वर्ग का रोजगार चल रहा है। श्री यादव ने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर ‘मेरी दिल की बात’ श्रृंखला के तहत ‘लालू परिवार और मीडिया का रोजगार’ शीर्षक से लिखे पोस्ट में कहा, “लालूजी और उनके परिवार से मीडिया घरानों एवं उनके ‘कॉरपोरेट’ कर्मियों का विशेष लगाव किसी से छुपा नहीं है। यह उसी प्रकार का लगाव है जिस तरह का भाजपा का लालू जी से। दुःखती नब्ज़ वाला अहसास! ना पसन्द किया जाए और ना नज़रअंदाज़ किया जाए! सौतेला व्यवहार बताना, इसे कमतर करने के बराबर माना जाएगा।” उप मुख्यमंत्री ने मीडिया पर तंज कसते हुए कहा, “बिहार में ना जाने कितने पत्रकारों की नौकरी लालू जी के नाम पर चल रही है। लगभग चार दशक से लालू जी राष्ट्रीय राजनीति के मज़बूत स्तम्भों में से एक रहे हैं और यह बात किसी को पसन्द हो या ना हो लेकिन देश की राजनीति में वह निर्विवाद रूप से शीर्षतम नेता बने हुए हैं। चाहे केंद्र या राज्य में सत्ता से दूर रहे या हिस्सा बने रहे लेकिन प्रासंगिकता और प्रसिद्धि में कभी कोई कमी नहीं आई। कभी उन्हें ग्वाला तो कभी चुटीले और मज़ाक़िया अंदाज़ के लिए मसखरा बताया गया। इसपर भी जब दिल ना भरा तो हर छोटी-मोटी असफलता पर राजनैतिक अंत की गाथा सुना दी गई। पर हर बार पूर्वाग्रह पीड़ितों को खून का घूंट पीना पड़ा। कभी रेल मंत्री के कार्यकाल से आलोचकों को पानी भरने पर मजबूर किया तो बार-बार दर्ज की गई अपनी वापसी से विरोधियो को सकते में डाल दिया। बड़े-बड़े भाजपाई तुर्रम खान उनके समर्थन और जनाधार पर सेंध मारने का सपना संजोते रह गए लेकिन हर बार मुंह की खाई।

श्री यादव ने आगे लिखा, “सामाजिक न्याय के अपने संघर्ष से जिस ऐतिहासिक सामाजिक बदलाव की उन्होंने नींव रखी, वह क्रांतिकारी थी। समाज के बड़े लेकिन दबे वर्ग का शांतिपूर्ण ढंग से जागरण अपने आप में एक उपलब्धि है। लेकिन, हर उल्लेखनीय उपलब्धि और कार्यों को छुपा पर नकारात्मक पहलू कहीं से भी सामने कर देने की कवायद भाजपा समर्थित मीडिया खूब पहचानता है। लालू जी सच्चे गौ पालक हैं, गौ सेवक हैं। लेकिन, दूसरों को इसी बात पर महिमामंडित करने वाली मीडिया ने कभी लालू जी की इस बात पर प्रकाश नहीं डाला। शायद गौ पालक वर्ग से आने वाले इस नेता की संभ्रांत वर्ग के राजनीतिक गढ़ में बहुसंख्यक समर्थन से उथल पुथल मचा देना आज भी लोग पचा नहीं पाए हैं।” उप मुख्यमंत्री ने कहा कि भाजपा के बड़े नेता लाल कृष्ण आडवाणी के रथ को रोककर देश को साम्प्रदायिक आग से बचाने वाले इस नायक को कभी अपेक्षित श्रेय नहीं मिला। लालू जी सच्चे उपासक हैं और अत्यंत धार्मिक भी। हर पर्व, त्योहार को पूरी श्रद्धा से मनाते हैं। कभी उन्हें एक सच्चे धार्मिक हिन्दू की छवि से नहीं नवाज़ा गया। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि क्या दूसरे धर्मों के धर्मावलम्बियों पर आग उगलना ही आपको सच्चा हिन्दू कहलवा सकता है। छठ पूजा पूरा परिवार पूरे समर्पण भाव से मनाता है, जिसपर पूरे सूबे की नज़र होती है। लेकिन, जैसे वह किसी और धर्म का पर्व हो, धर्म के प्रति समर्पण और श्रद्धा को उजागर ही नहीं किया जाता है। श्री यादव ने कहा, “लालू जी से जुड़े हर सकारात्मक पहलू को छुपा देने या नज़रअंदाज़ करने की कोशिश होती है। कुरेद-कुरेद कर छोटी छोटी बातों को बड़ा करके सनसनी पैदा की जाती है, नकारात्मक बनाया जाता है। पूर्वाग्रह से विवश, विरोधियों के अनर्गल आरोपों को ही अपनी भाषा बनाया जाता है, जांच से पहले ही घोटाला शब्द जोड़ दिया जाता है और जांच में कुछ नहीं मिलने पर माफ़ी मांगने का शिष्टाचार भी नहीं दिखाया जाता है। उल्टे जांच की विश्वसनीयता पर ही दबी ज़बान से संशय पैदा किया जाता है।”

श्री यादव ने राजद सुप्रीमो के इलाज पर आई मीडिया रिपोर्ट पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि यदि लालू परिवार से कोई प्राइवेट अस्पताल में इलाज करवाएगा तो कहा जाएगा कि जनता को लचर स्वास्थ्य व्यवस्था पर आश्रित छोड़ खुद निजी अस्पताल में इलाज करवाते हैं। वहीं, सरकारी अस्पताल में इलाज करवाते हैं तो कहते हैं सरकारी तंत्र का दुरुपयोग हो रहा है, ढोंग हो रहा है। उप मुख्यमंत्री ने कहा कि जनप्रतिनिधियों को उपलब्ध प्रोटोकॉल के मुताबिक सरकारी चिकित्सकों की सलाह ली जाती है तो हो हंगामा मचाया जाता है। यानि, लालू परिवार कहीं इलाज ना करवाए। चित भी मेरी, पट भी मेरा! मार खा लिए तो सहनशीलता का ढोंग, पलटवार किया तो हिंसक रवैया। श्री यादव ने सवालिया लहजे में कहा, “भाजपा समर्थित मीडिया के लोगों, कितनी घृणा और पूर्वाग्रह पालिएगा? यदि वंचित और बहुसंख्यक समुदाय का उत्थान इतना कचोटता है तो सीधे मुद्दे पर आघात कीजिए, खुले में आइये, अपने पारम्परिक वैमनस्य और श्रेष्ठता की भावना को स्वीकारिए और बदल दीजिए अगर बदलने की ताकत हो तो! यह दुष्प्रचार का छद्म युद्ध बन्द कीजिए और अपने पूर्वाग्रह पीड़ित दोहरे रवैये पर गोल-गोल बातें छोड़ सीना ठोककर बहुजन समुदाय को ललकारिये। पर कम से कम भाजपा के हाथों बिकने के बाद अपने आपको लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मत कहिए। ” 
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