दुमका : मम्मा मातेश्वरी जगत अंबा सरस्वती की 52 वीं पुण्यतिथि मनाई गई

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दुमका (अमरेन्द्र सुमन) प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के नगर पालिका चैक दुमका स्थित ओम शांति भवन में दिन शनिवार (24 जून 2017) को प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी मम्मा जगतअंबा सरस्वती की 52 वीं पुण्यतिथि स्मृति दिवस के रूप में मनाई गई। बतौर मुख्य अतिथि रामकृष्ण आश्रम के स्वामी विश्वरूप महाराज, दुमका स्थित संस्था की प्रमुख बी0 के0 जयमाला, बी0 के0 रेखा, बी0 के0 जूही व इस अवसर पर मौजूद अतिथियों ने मम्मा मातेश्वरी को भावभीनी श्रद्धांजली अर्पित किया। मातेश्वरी जगतअंबा सरस्वती प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में अपने गुणों व कार्याें के कारण मीठी मम्मा के रूप में भी जानी जाती है। मुख्य अतिथि स्वामी विश्वरूप महाराज ने संस्था के उद्येश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्था अपने उद्येश्यों के अनुरूप लोगों को अज्ञानता रूपी अंधकार से निकालकर ज्ञान रूपी प्रकाश से प्रकाशमान कर रही है और जिसमें ये अपना शत प्रतिशत देने में सफल भी है। ब्रह्माकुमारी संस्था की बहनों का त्याग व सेवा कार्य देखकर स्वामी जी ने कहा कि आज के इस युग में भी अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदारी पूर्वक अडिग रह कर समस्त विश्व के जन कल्याण के लिए ये बहनें कार्य कर रही है जो काफी प्रशंसनीय व सराहनीय है। अध्यात्म को जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग बताते हुए कहा कि अध्यात्म के जरिए ही हम परात्मा से सीधा संपर्क स्थापित कर हर दृष्टिकोण से अपने जीवन स्तर को बेहतर बना सकते हैं। चाहे किसी भी धर्म, जाति, समुदाय का हों, सबों को परमाात्मा से जुड़कर ही कार्य करना चाहिए। इस व्यस्तता भरी जीवन शैली के बीच से लोगों को निश्चय ही समय निकालकर आश्रम में आना चाहिए जहाँ राजयोग के जरिए सरलतापूर्वक परमपिता परमात्मा से संपर्क स्थापित करने की कला को सहजता पूर्वक सिखाया जाता है। जिससे उर्जा व शांति की प्राप्ति होती है। भोजन के बारे में स्वामी जी ने कहा कि भोजन को बहुत ही शुद्धता के साथ पकाया जाना चाहिए और भोजन का अनादार नहीं करना चाहिए, क्योंकि जैसा भोजन हम करते हैं वैसा ही हमारे विचार होते हैं, जिससे घर-परिवार में सुख शांति का माहौल बना रहता है।  इस संबंध में कहा भी गया है कि जैसा अन्न ! वैसा मन!!  इन्होंने कहा कि सभी धर्मों का हमें आदर करना चाहिए क्यांेकि सभी धर्माे में एक ही समान नैतिक बातें बताई जाती है, बस जरूरत है इसे आत्मसात करने की। संस्था की संचालिका बी0 के0 जयमाला ने कहा कि मम्मा जगतअंबा सरस्वती ने आज के ही दिन 24 जून 1965 को नश्वर देह का त्याग कर संपूर्ण अवस्था को प्राप्त किया। मम्मा जगतअंबा सरस्वती 14 वर्ष की आयु में इस संस्था में आई। इनका बचपन का नाम राधे था।  बचपन से ही ये विलक्षण प्रतिभा की धनी थी, पढ़ाई के साथ-साथ ये गीत-संगीत एवं नृत्य में भी अव्वल रहती थी।  पहली बार जब ये ब्रह्मा बाबा से मिली तो इन्हें एहसास हुआ कि इन्हें अलौकिक पिता मिल चुके हैं।  मम्मा जगतअंबा सरस्वती सिंध समुदाय के बहुत ही साधारण परिवार से थी।  उनके जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह थी कि वो किसी भी एक गलती को दुबारा आज तक नहीं की।  मम्मा अपने कर्तव्य की पक्की थी।  मम्मा का व्यवहार, कार्यकुशलता, सेवाभाव, कर्तव्यपरायणता, सत्यनिष्ठा, लोगों के प्रति असीम प्यार, स्नेह और त्याग के कारण ही बहुत ही कम उम्र में उन्हें मातेश्वरी जगतअंबा सरस्वती की उपाधि मिली।   इनकी विलक्षण प्रतिभा और त्याग से अभिभूत होकर स्वयं ब्रह्मा बाबा ने जगत कल्याण के लिए इन्हें संस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी प्रदान की। अध्यात्मिक ज्ञान और शक्तियों की चैतन्य दिव्य मूर्ति मातेश्वरी श्री जगदम्बा, कर्मयोग की ज्ञान-गंगा बहाकर आध्यात्मिक क्षेत्र में पुरूष प्रधान वर्चस्व के मिथक को तोड़कर सारे संसार को यह संदेश देने सफल रही कि आध्यात्किम पुरूषार्थ और साधना के लिए त्याग, तपस्या और आत्म-अनुभूति ही यथार्थ सत्य है, इसमें लिंग-भेद और बाह्य पहचान का कोई महत्व नहीं है।  मम्मा ने जिस समय सन् 1936 में आध्यात्मिक साधना द्वारा अज्ञानता में भटकते समस्त मानव के हृदय को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करने के पथ को चुना था, का वह कालखण्ड एक नारी के लिए महान साहस भरा फैसला था।  क्योंकि उस समय का पुरूष प्रधान समाज धर्म की सुरक्षा के नाम पर नारियों को घर के पर्दे के अंदर कैद करना ही अपना छद्म धर्म समझते थे।  उस वक्त इन्होंने नारियों के पूर्णतः निषेध कर दिए गए धर्म के प्रवेश-द्वार को नारियों के लिए खोल दिया।  मम्मा आज भी नारी-सत्ता द्वारा संचालित प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के रूप में समस्त संसार को आलोकित कर रही है। साथ ही संस्था प्रमुख बी0 के0 जयमाला ने बताया कि मम्मा करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणादायक बनीं और ब्रह्माकुमारी बहनों और माताओं के लिए वे एक आदर्श बनकर हमसबों के बीच प्रेरणा के रूप में आज भी विद्यमान है।

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