रमज़ान : अल्लाहु अकबर, बेमिसाल अनुशासन

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मधुबनी (किशोर कुमार) ज़मीन और आसमान, चांद-सितारे और सूरज सभी अनुशासित ढंग से अपने-अपने काम में लगे हुए हैं. सूरज और चांद का निकलना तथा डूबना, दिन और रात का होना, मौसमों का बदलना, ज़मीन का घूमना सब अपने तय समय पर और अनुशासन के साथ हो रहा है. नदियां और समंदर भी किसी न किसी क़ायदे और क़ानून के अनुसार बह रहे हैं, यहां तक कि हमारे शरीर के अंग भी अनुशासन के साथ अपना-अपना काम कर रहे हैं चाहे वो दिमाग हो, दिल हो, फेफड़ा हो, आँख हो, कान हो या कोई दूसरा अंग. यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि अगर इन में से कोई भी अनुशासन से डिगेगा तो उसका परिणाम भयावह ही होगा. इस से ये बात तो साफ़ हो जाती है कि अनुशासित ढंग से आप जब तक काम करेंगे सफलता के साथ आगे बढ़ते रहेंगे. ऐसा है तो फिर क्यों न हम अपने जीवन में अनुशासन को महत्त्व दें. लेकिन अनुशासन अचानक पैदा नहीं हो जाता बल्कि इसके लिए मेहनत करनी होती है. जो व्यक्ति अनुशासित जीवन न गुज़ार रहा हो उसके लिए ये संभव ही नहीं कि वो खुशहाल ज़िन्दगी बसर कर सके. यही कारण है कि इस्लाम ने अनुशासन और सलीक़ा के साथ ज़िन्दगी गुज़ारने को कहा है. अल्लाह के रसूल मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का कहना है कि “अल्लाह तुम्हारे किसी भी काम में ये पसंद करता है कि उसे ठीक ढंग और सलीक़ा से किया जाये.” (शोबुल ईमान, पृष्ठ 232)


हालांकि इस्लाम ने अनुशासित जीवन की एक बेहतरीन रूपरेखा अपने अनुयायियों के सामने राखी है लेकिन इस ओर बहुत ही कम लोग ध्यान देते हैं. उदाहरण के रूप में मुसलामानों पर फ़र्ज़ किये गए इबादत ‘नमाज़’ को ही ले लीजिये. दिन भर में पांच नमाज़ है और सभी के लिए एक समय तय है. फज्र का समय सूर्योदय से ठीक पहले है, ज़ुहर का समय मध्याहन होता है, अस्र सूरज ढलने से पहले, मग़रिब सूर्यास्त के ठीक बाद और इशा रात के समय में पढ़ने का निर्देश दिया गया है. लेकिन कितने लोग हैं जो इन फ़र्ज़ नमाज़ों को सही समय पर अदा करते हैं. सच तो ये है कि अधिकतर लोग नमाज़ पढ़ते ही नहीं हैं. यानि इस्लाम ने पूरे दिन को संतुलित ढंग से गुज़ारने के लिए नमाज़ के रूप में जो ‘अनुशासन’ की दवा हमें दी है, हम उसका प्रयोग ही नहीं करते, फिर हम ये कैसे सोच सकते हैं कि हमारा जीवन सुखमयी और संतुलित हो. इस दृष्टि से देखा जाए तो रमज़ान का महीना अल्लाह के बन्दों के लिए हमेशा से ही लाभकारी साबित हुआ है. ये ऐसा महीना है जब लोग न केवल अपनी इच्छाओं को दबा कर तक़वा का सबूत पेश करते हैं बल्कि अनुशासन की भी बेहतरीन मिसाल पेश करते हैं. इस महीने में आप किसी भी मस्जिद में चले जायें, नमाज़ियों की संख्या हैरान करने वाली होती है. अभी रमजान का महीना शुरू हुए कुछ ही दिन हुए हैं और सभी मस्जिदों में रौनक़ सी फैली हुई है. ये देखकर मुझे आश्चर्य भी हो रहा है और ख़ुशी भी कि कुछ मस्जिदों में नमाज़ियों की संख्या इतनी ज्यादा है कि दो जमाअतें हो रही हैं.

फ़ज्र की नमाज़ हो या मग़रिब की, ऐसा लगता है जैसे लोग जुमा की नमाज़ के लिए जमा हो रहे हैं. सभी का एक लाईन में खड़े होना, ‘अल्लाहु अकबर’ की आवाज़ पर एक साथ रुकू में जाना और सजदे करना अनुशासन का बेमिसाल दृश्य पेश करता है. ये ऐसा दृश्य होता है जो किसी को भी मंत्रमुग्ध कर दे. इबादत में अल्लाह ऐसी ही अनुशासन चाहता है. क़ुरान में एक सूरह है ‘साफात’ जिस में फरिश्तों का अनुशासित ढंग से खड़े होने की अदा को अल्लाह ने बहुत पसंद किया है. इस सूरह के सम्बन्ध में प्रतिष्ठित धर्मगुरु मुफ़्ती मोहम्मद शफी उस्मानी लिखते हैं “इस आयत से मालूम होता है कि हर काम में अनुशासन और सलीक़ा का ध्यान रखना इस्लाम में आवश्यक है और अल्लाह तआला को पसंद है. निश्चय रूप से अल्लाह तआला की इबादत हो या उस के निर्देशों का पालन, ये दोनों उद्देश्य इस प्रकार भी पूरे हो सकते थे कि फ़रिश्ते एक लाईन में खड़े होने की जगह एक बिखरी हुई भीड़ की शक्ल में जमा हो जाया करें, लेकिन इस अनुशासनहीनता की जगह उन्हें अनुशासित ढंग से लाईन में खड़ा किया गया. और इस आयत में उन के गुणों में सब से पहले इसी गुण का उल्लेख कर के बताया गया कि अल्लाह को उनकी ये अदा बहुत पसंद है.” (मआरीफ-अल-क़ुरान, जिल्द 7, पृष्ठ 417)


बहरहाल, रमज़ान के महीने में केवल नमाज़ ही नहीं बल्कि मुसलामानों की इबादत का हर अमल ही बहुत अनुशासित होता है. उदाहरण के रूप में अफ्तारी और सेहरी को लिया जा सकता है जिस में अनुशासन और समय की पाबंदी का ख़ास ध्यान रखा जाता है. लेकिन अफ़सोस की बात है कि रमज़ान ख़त्म होते ही लोगों की अच्छी आदतें जो उन्हें अनुशासित जीवन के लिए प्रेरित करती हैं, उसे छोड़ देते हैं.
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