आयोग के फैसले से दिल्ली में राजनीति का पारा गरमाया

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नयी दिल्ली, 24 जून, राजधानी में पिछले कुछ दिनों से मौसम सुहावना रहने के बाद अाज अचानक गर्मी बढ़ गयी, और इसी के साथ लाभ के पद से जुड़े मामले में चुनाव आयोग के फैसले के बाद राजनीतिक पारा भी चढ़ गया है, चुनाव आयोग ने कल फैसला दिया कि लाभ के पद मामले में फंसे आम आदमी पार्टी(आप) के 20 विधायकों पर वह सुनवाई जारी रखेगा, इन विधायकों ने दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के आधार पर आयोग से इस मामले को खत्म करने का अनुरोध किया था। आयोग के आदेश के बाद भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) और कांग्रेस ने अनिश्चितता का माहौल खत्म करने के लिये इस मामले से जुड़े विधायकों से नैतिकता के आधार पर तुरंत इस्तीफे की मांग की है। उधर आप पार्टी ने कहा है कि आयोग के फैसले का इन विधायकों की सदस्यता पर कोई असर नहीं पड़ा है। आप के 21 विधायकों को 13 मार्च 2015 को संसदीय सचिव नियुक्त किया गया था। वकील प्रशांत पटेल ने 19 जून 2015 को विधायकों की नियुक्ति को लाभ का पद बताते हुए चुनौती दी थी। राष्ट्रपति को दी गयी श्री पटेल की याचिका में विधायकों की सदस्यता रद्द करने का अनुरोध किया गया था । राष्ट्रपति ने 22 जून को यह याचिका चुनाव आयोग को भेज दी थी। इन विधायकों में से जरनैल सिंह ने पंजाब विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिये इस्तीफा दे दिया था। इस वर्ष मार्च में हुए पंजाब विधानसभा चुनाव में श्री सिंह पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के खिलाफ लंबी से चुनाव लड़े थे और हार गये थे। दिल्ली उच्च न्यायालय ने पिछले साल 08 सितम्बर को संसदीय सचिव के रूप में विधायकों की नियुक्ति रद्द कर दी थी । लाभ के पद मामले में फंसे विधायकों ने इसके बाद चुनाव आयोग में याचिका दी थी कि जब न्यायालय ने संसदीय सचिव की नियुक्ति को ही रद्द कर दिया है तो फिर आयोग में मामला चलने का कोई सवाल नहीं रह जाता । आयोग ने विधायकों की मामला खत्म करने की याचिका को खारिज कर दिया है। आयोग ने याचिका खारिज करने के पीछे तर्क दिया है कि विधायकों के पास 13 मार्च 2015 से 08 सितम्बर 2016 तक संसदीय सचिव का पद था । इसलिये उन पर मामला चलेगा । आयोग ने कहा है कि राजौरी गार्डन के विधायक इस वर्ष जनवरी में इस्तीफा दे चुके है। इसलिये उन पर यह मामला नहीं चलेगा। आयोग के इस निर्णय के बाद अब इस मामले की अंतिम सुनवाई शुरू होगी और विधायकों को यह साबित करना पड़ेगा कि संसदीय सचिव के तौर पर वह लाभ के पद पर नहीं थे। आयोग अब इस मामले में राष्ट्रपति को दी जानी वाली राय पर सुनवाई करेगा । इस सुनवाई के बाद आयोग विधायकों की संसदीय सचिव के रूप में नियुक्ति की वैद्यता को लेकर क्या राय देता है उसी पर इनकी सदस्यता निर्भर करेगी । श्री पटेल की चुनौती के बाद दिल्ली सरकार ने दिल्ली विधानसभा में इन विधायकों के संसदीय सचिव की नियुक्ति को वैध बनाने के लिए एक विधेयक पारित किया था जिससे पिछली तारीख से कानून बनाकर लाभ पद दायरे में आये इन विधायकों बाहर किया जा सके। इस विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिली और लौटा दिया गया । शिकायकर्ता का कहना है कि संसदीय सचिव नियुक्त करने के बाद इन विधायकों काे कई तरह की सुविधाएं दी गयी । उधर विधायकों की यह दलील है कि संसदीय सचिव के रूप में उनकी नियुक्ति से न उन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं मिला है। इन विधायकों में प्रवीण कुमार (जंगपुरा), अनिल कुमार (गांधीनगर), सोमदत्त (सदर बाजार), शरद कुमार (नरेला), अवतार सिंह कालका (कालकाजी), आदर्श शास्त्री (द्वारका) , मदन लाल (कस्तूरबा नगर), शिवचरण गोयल (मोतीनगर), वीरेन्द्र गर्ग विजय (राजेन्द्र नगर), संजीव झा (बुरारी), कैलाश गहलोत (नजफगढ़), सरिता सिंह (रोहतास नगर), अलका लांबा (चाँदनी चौक), नरेश यादव (महरौली), मनोज कुमार (कोन्डली), जरनैल सिंह(तिलक नगर), नितिन त्यागी (लक्ष्मीनगर), राजेश गुप्ता (वजीरपुर), सुखबीर सिंह (मुंडका) और राजेष ऋषि (जनकपुरी) शामिल हैं।

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