युवा केवल भविष्य निर्माण के सपने नहीं देखते, उसे पूरा करना भी जानते हैं : कोविंद

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पटना 12 जून, बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद ने युवाओं को देश की ताकत बताया और कहा कि आज की युवा पीढ़ी केवल भविष्य निर्माण के सपने ही नहीं देखती बल्कि उन सपनों को साकार करना भी जानती है। श्री कोविंद ने आज यहां ‘पाटलिपुत्र राष्ट्रीय युवा संसद’ के समापन-समारोह को संबोधित करते हुये कहा, “जिस राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत वहां के युवा हों, वह राष्ट्र अपने समग्र और सर्वतोन्मुखी विकास के प्रति आश्वस्त रह सकता है। उन्होंने कहा कि युवाओं की प्रतिभा और परिश्रम पर हमें गर्व है। आज की युवा पीढ़ी केवल अपने भविष्य निर्माण के सपने ही नहीं देखती बल्कि उन सपनों को साकार करना भी जानती है।” राज्यपाल ने कहा कि भारत एक पूर्ण युवा राष्ट्र है। युवा राष्ट्र इस अर्थ में कि यहां की 65 प्रतिशत से अधिक आबादी युवाओं की है। उन्होंने कहा कि वह अत्यंत गौरवान्वित हैं और आत्मबल से पूरी तरह सम्पन्न भी, जिसका सबसे बड़ा कारण यह है कि आज देश के युवाओं ने अपने मजबूत कंधों पर राष्ट्र निर्माण का दायित्व उठा लिया है। उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि भारतीय राजनीति की गतिविधियों में युवाओं को न सिर्फ गहरी दिलचस्पी रखनी चाहिए बल्कि इसमें उन्हें सक्रिय भूमिका भी निभानी चाहिए ताकि उनकी आवाज विधानमंडलाें और संसद तक संजीदगी से पहुंच सके। श्री कोविंद ने कहा कि पूंजीवाद और बाजारवाद ने भौतिकतावाद को इस तरह फैला रखा है कि मनुष्य की अस्मिता ही संकटग्रस्त दिखने लगी है। मानवता ही नहीं बचेगी, मनुष्य के सपने ही नहीं बचेंगे, तो दुनिया के संवरने की उम्मीद कैसे की जाये। उन्होंने पंजाबी कवि पाश को उद्धृत करते हुए कहा कि ‘सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना।’ उन्होंने स्वामी विवेकानन्द के संदेशों की ओर युवाओं का ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि चरित्रवान, बुद्धिमान, त्यागी और परोपकारी युवाओं की देश और समाज को बेहद जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज ऐसे धर्म की आवश्यकता है जो हमें संवेदनशील मनुष्य बना सके।


इसके बाद राज्यपाल ने खुदाबख्श ओरिएन्टल लाईब्रेरी के नवनिर्मित भवन का उद्घाटन किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि खुदाबख्श साहब ने जब पुस्तक और इंसान के बीच रिश्ते को गहराई से समझा था तभी इस पुस्तकालय की स्थापना की थी। यह लाईब्रेरी कुछ खास धरोहरों की तरह आज बिहार की पहचान बन चुकी है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि अपनी इस धरोहर को सजाने-संवारने के लिए और अधिक संजीदगी से विचार किया जाये। श्री कोविंद ने कहा, “हम पुस्तकालय में पहुंचकर किताबों से जो रिश्ता बनाते हैं, वह कई मायनों में विशिष्ट होता है। पुस्तकों के साथ इंटरनेटी रिश्ता भावनात्मक नहीं बन पाता। कठिनाईपूर्वक, थोड़ी मेहनत-मशक्कत के बाद किसी के साथ कायम किया गया रिश्ता अधिक संवेदनशील होता है, गहराई वाला होता है।” राज्यपाल ने कहा कि स्थापना के समय इस पुस्तकालय में 4000 पांडुलिपियां थीं, जिनकी संख्या में निरंतर वृद्धि होती गई है और अभी 21,000 से अधिक पांडुलिपियां यहां सुरक्षित हैं, जिनमें अरबी और फारसी के साथ उर्दू, उजबेक, हिन्दी और संस्कृत भाषाओं की दुर्लभ पांडुलिपियां शामिल हैं। उन्होंने कहा कि पुस्तकालय के आधुनिकीकरण के लिए पिछले दो दशकों में कई महत्वपूर्ण प्रयास हुये हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण पांडुलिपियों के डिजिटाइज्ड करने की प्रक्रिया है, जिसका पहला चरण अब सम्पन्न हो चुका है और अब कई पुस्तकों की छायाप्रतियां इन्टरनेट द्वारा पाठकों और शोधार्थियों को उपलब्ध कराने की व्यवस्था हो रही है। इस पुस्तकालय में विभिन्न भाषाओं और विषयों की लगभग तीन लाख पुस्तकें उपलब्ध हैं, जो शोधार्थियों और पाठकों के लिए बेहद उपयोगी हैं।

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