विशेष आलेख : ‘सिस्टम’ की रोग मुक्ति सफलता का आधार

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उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का सौ दिनों का कार्य अंधेरों में रोशनी का प्रतीक बना है। सरकार ने इन दिनों में विकास के प्रतिमानों को ऊंचा रखते हुए लोगों के दिल को जीतने का काम किया है। इस अल्पावधि में सरकार ने अपनी नीतियों, योजनाओं एवं कार्यों से जन-जन में लोकप्रियता प्राप्त की है। प्रदेश की जनता ने बदलाव भी देखा और महसूस भी किया, भय, भ्रष्टाचार एवं अफसरशाही पर लगाम कसी है, बिजली की कटौती से राहत मिली है, विकास की नयी संभावनाओं ने पांव पसारना शुरु कर दिया है। लेकिन इन प्रशंसनीय स्थितियों के बीच कानून व्यवस्था अभी भी चरमराई हुई है। पिछले चैदह सालों से भ्रष्टाचार और गुंडाराज से जूझ रहे प्रदेश में एक नई तरह की कार्य संस्कृति और बदलाव देखने को मिल रहा है लेकिन कानून-व्यवस्था की दृष्टि से सकारात्मक नतीजे सामने आने जरूरी हैं।

उत्तर प्रदेश में विकास से भी ज्यादा आवश्यक कानून व्यवस्था सशक्त होना है, जिसमें अभी कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा है, अपराधियों के हौसले आज भी बुलन्द है, जो योगी सरकार के लिये एक चुनौती है। विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने कानून-व्यवस्था को एक बड़ा मुद््दा बनाया था। भाजपा ने मायावती और अखिलेश यादव की सरकारों पर जंगल राज का आरोप मढ़ते हुए यह वादा किया था कि अगर वह सत्ता में आई तो फौरन कानून व्यवस्था को ही सर्वोच्च प्राथमिकता देगी। लेकिन तीन महीने से ऊपर हो गए, आज हकीकत क्या है? भले ही योगी ने पिछले दिनों अपनी सरकार के सौ दिनों का रिपोर्ट कार्ड जारी किया, तो उसमें कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भारी कामयाबी का दावा था। पर यह आत्म-प्रशंसा खोखली जान पड़ती है। 
अपराधियों का हौसला किस कदर बढ़ा हुआ है, इसका ताजा संकेत बिजनौर की एक घटना से मिल जाता है, जिसमें बीते शुक्रवार की रात अज्ञात अपराधियों ने एक सब इंस्पेक्टर की गला रेत कर हत्या कर दी, उनका शव गन्ने के एक खेत में फेंक दिया और उनकी सर्विस रिवाल्वर लेकर भाग गए। इससे पहले एक पेट्रोल पंप के मालिक को लूटा जाना, एक व्यापारी की हत्या, दो लड़कियों समेत एक परिवार के चार सदस्यों की धारदार हथियार से हत्या, गहने की दुकान में डकैती, एक राजनीतिक की हत्या, एक पुलिस सब इंस्पेक्टर को खुलेआम पीटा जाना। सहारनपुर में जातिगत टकराव व हिंसा। गोरक्षा के नाम पर उत्पात व हिंसा। इस सिलसिले पर विराम कब लगेगा? इन्हीं आपराधिक घटनाओं पर नियंत्रण ही प्रदेश वास्तविक बदलाव हो सकता है, ऐसा न होना योगी की विफलता को ही दर्शाता है। जनता बहुत विश्वास से योगी पर अपराधमुक्त प्रदेश का सपना संजोये हैं। क्योंकि अपराधियों एवं पुलिस के आपसी सहयोग से प्रदेश की जनता डरावनी, दिल दहला देने वाली, खौफनाक आपराधिक घटनाओं हर दिन रू-ब-रू होने को विवश रही है। प्रदेश अपराध का गढ़ बना हुआ है, पुलिस का भ्रष्टाचार सहज है, उनकी लापरवाही एवं गैर-जिम्मेदाराना हरकते आम बात है। अपराधी बेखौफ है और निर्दोष पिसता रहा है। कब उत्तर प्रदेश भयमुक्त हो सकेगा? इन कानून-व्यवस्था की अंधेरी गलियों से प्रदेश की जनता को रोशनी में लाना जरूरी है, पुलिस महकमें को दुरुस्त और जिम्मेदार बनाना, अपराधों पर नियंत्रण यही योगी की सबसे बड़ी सफलता हो सकती है। इसके लिये योगी को सख्त कदम उठाने होंगे।
मुख्यमंत्री ने पदभार संभालते ही कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता प्रदान की, उन्होंने हर पुलिस अधीक्षक को सुबह नौ बजे तक दफ्तर पहुंच जाने, रोज कम-से-कम एक थाने का निरीक्षण करने जैसे कई निर्देश जारी किए थे। यही नहीं, खुद थाने का औचक निरीक्षण करके उन्होंने यह संदेश भी देना चाहा कि पुलिस महकमे के कामकाज पर उनकी सीधी नजर है। फिर क्या वजह है कि एक तरफ आपराधिक घटनाओं में बढ़ोतरी और दूसरी तरफ पुलिस के आत्मविश्वास में कमी आई दिखती है? पुलिस के कामकाज में राजनीतिक हस्तक्षेप की उत्तर प्रदेश की ही नहीं समूचे देश की पुरानी  शिकायत है, समस्या है। सर्वोच्च न्यायालय ने  पुलिस महकमे से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिये कई बार हिदायत दी, सोराबजी कमिटी के द्वारा दिये गये सुझाव जैसे वरिष्ठ पुलिस अफसरों का कम से कम दो साल तक तबादला न करने और उनकी पदोन्नति, निलंबन आदि के लिए एक स्वायत्त बोर्ड बनाने को राज्य सरकारों ने लागू नहीं होने दिये हैं, जबकि सर्वोच्च न्यायालय इसके लिये बार-बार निर्देश-आदेश जारी करता रहा है। उत्तर प्रदेश के मामले में सबसे खटकने वाली बात यह है कि पुलिस अफसरों के काम में राजनीतिक दखलंदाजी के अलावा पुलिसकर्मियों पर हमले की भी कई घटनाएं हुई हैं, और कई मामलों में आरोप राजनीतिकों पर हैं। योगी को इन गंभीर स्थितियों को बदलना होगा। अपनी पार्टी के लोगों को सतर्क एवं सावधान करना होगा कि वे पुलिस महकमें में अनुचित तरीके से दबाव बनाकर अपराध का साथ नहीं देंगे। आज प्रशासनिक ढांचे में परिवर्तन लाने की शुरूआत हो गई है। क्यों न अब राजनीतिक ढांचे एवं सोच को सुधारने की प्रक्रिया शुरू होें।

सौ दिन का वक्त इन जड़ और जटिल हो चुकी समस्याओं एवं परिस्थितियों को बदलने के लिये पर्याप्त नहीं है। लेकिन इन सौ दिनों में ही योगी सरकार ने बेहतरीन काम करके और अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करके साबित कर दिया है कि वो ईमानदार नीति और नीयत के साथ काम कर रही है, इसका तो स्वागत होना ही चाहिए। स्वागत तो इस बात का भी होना चाहिए कि पहली ही कैबिनेट की मिटिंग में किसानों की कर्ज माफी का ऐलान किया गया, इतना ही नहीं गेहूं खरीद में भी सरकार ने रिकार्ड खरीद कर और गन्ना खरीद का तुरंत भुगतान कर चुनावी संकल्प पत्र के वायदों को पूरा करने का काम किया। एंटी रोमिया स्क्वायड का गठन, एंटी भूमाफिया स्क्वायड का गठन भी सराहनीय कदम हंै। यही नहीं योगी की सरकार बिना भेदभाव के हर जिले में पर्याप्त पानी-बिजली देने का प्रयास कर रही है, जिससे जनता को बहुत राहत का अनुभव हुआ है। भर्तियों के काम को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए ही सरकार ने नौकरियों से इंटरव्यू खत्म करने का भी फैसला ले लिया है। पिछली सरकारों के दौरान प्रदेश की जेलों को अपनी ऐशगाह बनाने वाले माफियाओं का जेल ट्रांसफर करके योगी की सरकार ने माफियाओं की नकेल कस दी है। भ्रष्टाचार के तमाम मामलों में सीबीआई जांच की सिफारिश कर सरकार ने ये साबित किया है कि वो जनता की गाढी कमाई लूटने वाले बेईमानों को कड़ी सजा दिलाने जा रही है। अफसर वक्त से दफ्तरों में पहुंचने लगे हैं जबकि अध्यापक और चिकित्सक अस्पतालों में। अफसरों को बिना किसी दबाव और राजनीतिक हस्तक्षेप के काम करने का अवसर मिल रहा है। इसी का नतीजा है कि जनता की सुनवाई होने लगी है। खुद मुख्यमंत्री एक ईमानदार जनसेवक की तरह हर रोज जनसुनवाई कर रहे हैं। साथ ही वो उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी कर रहे हैं जो जनसुनवाई के काम में ढीले पाए गए। योगी को एक सशक्त एवं ईमानदार प्रशासनिक ढांचा खड़ा करने के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा। हर स्तर पर दायित्व के साथ आचार संहिता अवश्य हो। दायित्व बंधन अवश्य लायें। निरंकुशता नहीं। आलोचना भी हो। स्वस्थ आलोचना, पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों को जागरूक रखती है। पर जब आलोचक मौन हो जाते हैं और चापलूस मुखर हो जाते हैं, तब फलित समाज को भुगतना पड़ता है।
आज हम अगर दायित्व स्वीकारने वाले समूह के लिए या सामूहिक तौर पर एक संहिता का निर्माण कर सकें, तो निश्चय ही प्रजातांत्रिक ढांचे को कायम रखते हुए एक मजबूत, शुद्ध व्यवस्था संचालन की प्रक्रिया बना सकते हैं। हां, तब प्रतिक्रिया व्यक्त करने वालों को मुखर करना पड़ेगा और चापलूसों को हताश, ताकि सबसे ऊपर अनुशासन और आचार संहिता स्थापित हो सके अन्यथा अगर आदर्श ऊपर से नहीं आया तो क्रांति नीचे से होगी। जो व्यवस्था अनुशासन आधारित संहिता से नहीं बंधती, वह विघटन की सीढ़ियों से नीचे उतर जाती है। काम कम हो, माफ किया जा सकता है, पर आचारहीनता तो सोची समझी गलती है- उसे माफ नहीं किया जा सकता। ‘सिस्टम’ की रोग मुक्ति प्रगतिशील प्रदेश एवं स्वस्थ समाज का आधार होगा और वही वास्तविक सफलता का आधार भी हो सकता है।




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(ललित गर्ग)
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