मस्तान मांझी व पेंटर मांझी की रिहाई और शराब बन्दी के लिए माले चलाएगा आंदोलन: कुणाल

  • 24-30 जुलाई तक राज्यव्यापी अभियान, प्रखंड मुख्यालयों पर धरना-प्रदर्शन, आयोजित की जाएंगी ग्राम बैठकें.
  • शराबबंदी के काले प्रावधान दलित-गरीबों के दमन-उत्पीड़न का नया जरिया. 

cpi-ml-protest-kunalपटना 22 जुलाई, भाकपा-माले राज्य सचिव कुणाल ने कहा है कि शराबबंदी कानून के काले प्रावधानों ने गरीबों पर कहर बरपाना शुरू कर दिया है. जहानाबाद शहर के ऊंटा मुशहर टोली के दो गरीब सहोदर भाई मस्तान मांझी व पेंटर मांझी को जहानाबाद फास्ट ट्रैक कोर्ट ने ताड़ी पिए होने के आरोप में आनन - फानन में महज 40 दिनों के भीतर 5 साल के सश्रम कारावास व 1 लाख रुपए का जुर्माना ठोक दिया है. जुर्माना नहीं देने पर उन्हें 6 साल जेल में रहना होगा. ठेला चलाकर जीवन-यापन करने वाले सहोदर भाइयों के परिवार के ऊपर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा है. उपार्जन करनेवाले इकलौते सदस्य के जेल जाते ही छोटे - छोटे बच्चों सहित पूरा परिवार भुखमरी का शिकार है और कर्ज में डूबता जा रहा है. पुलिस जब छापेमारी में आई, घर के सभी लोगों ने कहा कि उन्होंने ताड़ी पी है, लेकिन उन्होंने नहीं माना और जेल में डाल दिया. वर्तमान कानून के अनुसार ताड़ी प्रतिबंधित नहीं है. बहरहाल, हाई कोर्ट की लड़ाई उनके लिए काफी मुश्किल भरा है. बिहार में शराब बन्दी के काले कानून के तहत यह पहली सजा है. इसके खिलाफ आगामी 24 से 30 जुलाई तक भाकपा-माले व खेग्रामस द्वारा पूरे राज्य में राज्यव्यापी विरोध अभियान चलाया जाएगा. इसके तहत प्रखंड मुख्यालयों पर विरोध-प्रदर्शन आयोजित किए जाएंगे और ग्राम बैठकों का आयोजन करके शराबबंदी के काले प्रावधानों को वापस करने की मांग उठायी जाएगी. उन्होंने आगे कहा कि यह वही जहानाबाद है, जहां बाथे जनसंहार पीड़ितों को वर्षों न्याय के लिए टकटकी लगाए रहना पड़ा लेकिन अंत में तमाम अपराधियों को बाइज्जत बरी कर दिया गया. यहीं के निर्दोष टाडा बन्दी आज भी जेल की सीखचों में बंद हैं. सामाजिक न्याय के ढोंग का यह अभूतपूर्व नमूना है. 


उन्होंने आगे कहा कि शराब बन्दी के वर्तमान काले कानून के तहत जेल में करीब 45 हजार लोग बंद हैं. संभव है, उसमें मुट्ठी भर अपराधी व शराब माफिया भी हों. लेकिन अमूमन करीब - करीब सभी गरीब - गुरबे व आम नागरिक हैं.  बिहार के 45 हजार बन्दियों के ऊपर अब जहानाबाद जैसी ही सजा की तलवार लटक रही है. पूरे राज्य में शराब माफियाओं की चांदी है. दुगुनी - तिगुनी कीमत पर शराब की होम डिलीवरी धड़ल्ले से जारी है. क्या यह राजनीतिक - प्रशासनिक संरक्षण के बिना संभव है? लेकिन न तो शराब माफिया और न ही इस नापाक गठजोड़ पर कार्रवाई हो रही है. उल्टे शराब की आदत के पीड़ितों को ही निशाना बनाया जा रहा है.  उन्होंने यह भी कहा कि पूरे राज्य को शराब में डूबोनवाले का काम माननीय नीतीश कुमार ने किया. लेकिन अपने इस आपराधिक कृत्य के लिए बिहार की जनता से उन्होंने माफी तक नहीं मांगी. उल्टे ‘सामाजिक सुधार’ के नाम पर गरीबों पर ही हमला बोल दिया गया है. शराब की आपराधिक अर्थव्यवस्था भी है और अपराध के साथ इसके रिश्ते भी हैं. लेकिन शराब की बुरी आदत के शिकार लोग बेशक अपराधी नहीं हैं. उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार कहां तक उचित  है? उन्हें सुधार गृह की जरूरत है न कि जेल की. सरकार को उनके पुनर्वास का पुख्ता इंतजाम करना चाहिए और सुधार गृह की पूरी अवधि में उनके परिवार को गुजारा भत्ता देना चाहिए. लेकिन गरीबों का वोट लेकर सत्ता में आई सरकार उनपर ही जुल्म ढा रही है. यह जनादेश का अपमान है.

Share on Google Plus

About आर्यावर्त डेस्क

एक टिप्पणी भेजें
loading...