विशेष : सांस्कतिक लोककलाओं की अभिव्यक्ति है जात्रा

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नयी दिल्ली, 02 जुलाई, पश्चिम बंगाल का लोकनाट्य ‘जात्रा’ रंगमंच का एक ऐसा माध्यम है जो चमक दमक से परिपूर्ण नाटकों से परे अपनी विशिष्ट शैली में लोक संस्कृति की अभिव्यक्ति के साथ ही लोगों को एक दूसरे से जुड़ने की सीख देता है। हिन्दी नाटकों की तरह ही पश्चिम बंगाल में जात्रा के मंचन की पुरानी पंरपरा रही है और आज भी करीब हर छोटे बड़े शहरों में पारंपरिक रूप से इसका आयोजन किया जाता है। संगीत, अभिनय, गायन और नाटकीय वादविवाद जात्रा का प्रमुख हिस्सा होता है। बदलते परिवेश में जात्रा की नाट्य शैली में काफी बदलाव आया है। इसमें धार्मिक, ऐतिहासिक एवं काल्पनिक विषयों में विस्तार देते हुये आधुनिक अभिरूचि के अनुरूप सामाजिक एवं सांस्कृतिक विषयवस्तु का भी समावेश किया गया है। इसके बावजूद आधुनिकता के माहौल में जात्रा की पारंपरिक लोककला के प्रति जनमानस का रूझान घटा है। अब जात्रा के कार्यक्रम में जनसमूह नहीं उमड़ता। कला एवं संस्कृति से जुड़ाव रखने वाले लोग ही दर्शक दीर्घा में नजर आते हैं। उदारीकरण के दौर में पली बढ़ी नयी पीढ़ी के विचारों एवं जीवनशैली में पश्चिमी मूल्यों के असर से ऐसा बदलाव आया है कि वे अपनी पुरानी परंपराओं को गुण दोषों की विवेचन किये बिना अप्रांसगिक मानने लगे हैं। राज्य सरकार पारंपरिक और सांस्कृतिक लोकनाट्य जात्रा को वैश्विक मंच प्रदान करने और इसके पुराने वैभव को बरकरार रखने के प्रयास में जुटी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मंशा के अनुरुप सरकार ने कई योजनाएं बनायी है। राज्य सरकार के सूचना,संस्कृति और पर्यटन विभाग के तहत आने वाली पश्चिम बंग जात्रा अकादमी जात्रा के आयोजन को लेकर अग्रणी भूमिका निभायेगी। राज्य के खेल एवं युवा मामलों के मंत्री अरुप विश्वास इस अकादमी के अध्यक्ष हैं। श्री विश्वास कहते हैं कि जात्रा अपना वैभव खो चुकी है लेकिन सुश्री बनर्जी ने सत्ता में आने के बाद इस के पुनरोत्थान के लिये कई कदम उठाये हैं।


राज्य के सांस्कृतिक विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि जात्रा के उन्न्यन के लिये अधिक से अधिक लोगों को सांस्कृतिक केंद्रो से जोड़ने के साथ ही प्रसिद्ध एवं स्थानीय लोक कलाकारों को राज्य के विभिन्न पर्यटन केंद्रो पर अपनी कला के प्रदर्शन के लिए मंच उपलब्ध कराया जायेगा। राज्य के प्रसिद्ध थियेटर कलाकार चपाल भादुड़ी को इस वर्ष का बंग विभूषण पुरस्कार प्रदान किया गया है। इसके अलावा राज्य सरकार ने पहली बार जात्रा समूहों के लिए बुकिंग केंद्र स्थापित किये हैं। विभिन्न जात्रा समूहों के विस्तृत विवरणों सहित एक वार्षिक पत्रिका ‘ जात्रा दर्पण ’ भी प्रकाशित की गयी है। अधिकारियों के मुताबिक राज्य सरकार बहुत से जात्रा कलाकारों को नौ हजार रूपये वार्षिक अनुदान देती है। वर्तमान में करीब 10 लाख लोग जात्रा इंडस्ट्री से परोक्ष-अपरोक्ष रूप से जुड़े हुये हैं। दिल्ली में चित्तरंजन पार्क स्थित नोवापल्ली बांग्ला सांस्कृतिक केंद्र से जुड़ी श्रीमती अनिता बनर्जी कहती है कि बंगली समाज की अपनी पुरातन कला संस्कृति एवं परंपराएं हैं। जात्रा की परंपरा को जीवंत बनाये रखने के लिये उसके मौलिक कथा एवं नाट्य रूपों के साथ ऐसी नाट्य शैली के समावेश की जरूरत है जिसके जरिये नयी पीढ़ी को मनोरंजन के साथ ही सांस्कृतिक मूल्यों की झलक मिल सके। बंगली समुदाय से ताल्लुक रखने वाली एवं सामाजिक कार्यकर्ता शिउली भट्टाचार्य का कहना है कि बदलते आधुनिक परिदृश्य में जात्रा में काफी बदलाव आया है। पुराने समय में जात्रा में सिर्फ पुरूष कलाकार ही शामिल होते थे और वे ही महिला पात्रों की भूमिका करते थे लेकिन जनमानस की सोच में बदलाव के बाद महिलाएं भी कलाकार के रूप में इसमें हिस्सा लेने लगी हैं। जात्रा की महत्ता के संबंध में उन्होंने बताया कि बंगला सिनेमा के प्रारंभिक दौर में फिल्म बनाने वाले जात्रा के कलाकारों को उनके अनुभव के आधार पर प्राथमिकता देते थे।

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