विशेष आलेख : देश और किसान – कौन, किसका कर्ज़दार ?

हमारा देश कृषि प्रधान  है। करीब 70% लोग यहां खेती किसानी करते हैं। एक तरह से देखा जाए तो  किसान देश के रीढ़ की हड्डी के समान है। जिससे हमारा देश प्रगति की ओर बढ़ रहा है।  लेकिन आज कल यही रीढ़ की हड्डी कमजोर होती हुई दिख रही है। देश के अन्नदाता कहे जाने वाले किसान परेशान हैं। कभी कर्ज को लेकर , तो कभी फसलों के मूल्यों को लेकर। किसानों के कर्ज को लेकर केंद्रीय मंत्री वैंकेया नायड़ू ने कहा कि ये तो फैशन बनता चला जा रहा है।  हाल ही में मध्य प्रदेश में  20 दिन में 15 किसानों ने आत्महत्या कर ली है और सरकार को कर्जमाफी फैशन लगता है। साहब ये कोई रैंप नए डिजाइन के कपड़े पहनकर चलने वाला काम नहीं है। किसान जब खेत में मेहनत करते है तो तनपर कपड़े भी ठीक से नहीं होते हैं। उन्हें किसी को दिखाना नहीं होता कि उन्होंने क्या पहन रखा है ?  किसान अपना फर्ज और कर्तव्य अच्छे से जानते हैं। आज देश की जनता अपने घर में बैठकर सुकून की रोटी जो खा रही है ये किसानों की देन है।


 धूप में जब घर से बाहर निकलने में कतराते हैं  तब किसान खेतों में फावड़ा चलाता है। गर्मी, ठण्डी, बरसात तीनों मौसम उसके लिए बराबर होता है। बहुत से ऐसे किसान हैं, जो अपनी फसल तैयार करने के लिए नमक रोटी खाकर गुजारा करते हैं। उनकी तैयार की गई फसल से एसी में बैठकर बड़े चाव से ना ना प्रकार के व्यंजन खाते हैं। तब भी हम किसी के कर्ज़दार होते हैं। प्रत्यक्ष रूप से न सही तो अप्रत्यक्ष रूप से जरूर होते हैं। अगर किसान खेतों में मेहनत करना छोड़ दे तो देश भी भुखमरी को कगार पर पहुंच जाएगा। आज किसान देश को खिलाने और भुखमरी से बचाने के लिए कर्जदार है तो उसकी क्या ग़लती है ? मौसम की मार से अगर उनकी फसल बर्बाद होती है, तो उसके जिम्मेदार वो तो नहीं होते। अच्छी फसल पैदा करके जब देश को वो भोजन खिलाते हैं तो ये फैशन कहा चला जाता है। किसान कर्ज में डूबकर आत्महत्या कर रहा है। यह चिंता का विषय होना चाहिए। देश का पालन पोषण करने वाला इस तरह दर-दर की ठोकरे खा रहा है। इसमें बेचारा किसान क्या करें?  खेती करने के लिए भी तो रूपयों की जरूरत होती है। दिन-रात मेहनत कर खून पसीने से अपनी फसल की सींचता है। 

आज किसानों की वहज से देश के भण्डार गृह भरे पड़े हैं। अपनी मांगों को लेकर जब किसान आंदोलन करता है तो उसे गोलियां मिलती है। जैसा कि मध्यप्रदेश में देखने को मिला है । ये तो वही बात हुई कि पुलिस की गोलियां और कर्जदारी की दोहरी मार में किसान पिस रहा है। जहां पर किसान अधिक कर्ज में डूबे हैं वहां किसानों की अकाल मौत का आँकड़ा निरंतर बढ़ता जा रहा है। देशभर के किसानों के कर्ज को लेकर 30 सितंबर 2016 को अंतिम आंकड़ा जारी किया गया था, जिसमें देश के 10 बड़े कर्जदार राज्यों में उत्तर प्रदेश का पहला स्थान था। प्रदेश के करीब 79,08,100 किसान परिवार कर्ज में डूबे हुए हैं। किसान कर्जदार परिवारों में महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर तो  वहीं राजस्थान तीसरे स्थान है। जिसका एक सीधा सा कारण है कि पिछले दो दशकों में सरकारों  ने फसल की उगाई के लिए खेती की अनदेखी की है, उसका नतीजा है किसान आज कर्जदार है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार देश में साल 2014 से 2016 के अंत तक करीब 2.50 लाख किसानों ने विभिन्न कारणों से आत्महत्या की हैं। जिसमें उत्तर प्रदेश के करीब 1 लाख किसान हैं। देश में नोटबंदी हुई थी, जिसकी सर्वाधिक मार किसान झेल रहा था। लेकिन फिर भी प्रधानमंत्री के इस फैसले को सराह रहा था। 


खुद केंद्र सरकार की रिपोर्ट बताती है कि यूपी में प्रति एक हजार ग्रामीण परिवारों में 296 परिवार कर्ज में हैं, तो वहीं मध्य प्रदेश में ये आंकड़ा 247 है। वित्त मंत्री अरूण जेटली ने साफ कह दिया कि किसानों का कर्ज केंद्र सरकार माफ नहीं करेगी। सही भी है लेकिन कुछ तो रास्ता निकलना पड़ेगा। कोई तो नीति बनानी पड़ेगी।  देश के कई हिस्सों में किसानों कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा हैं। जिसका एक कारण यह है कि घरेलू और वैश्रि्वक बाजार में कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट आना है। यही वजह है कि देश के अलग-अलग भागों में किसान कर्ज माफी की मांग कर रहे हैं। अब इस पर तो सरकार को कदम उठाना ही चाहिए जिससे देश का किसान भी खुशहाल रह सके।  अभी तक किसानों के कर्ज माफी के लिए जो राज्य सरकारें आगे आई हैं उसमें उत्‍तर प्रदेश, महाराष्‍ट्र और पंजाब के बाद कर्नाटक कृषि कर्ज माफ करने वाला चौथा राज्‍य बन गया है। आज देश का किसान कर्ज के दबाव में मजबूर है , लेकिन फिर भी खेती करने का काम करता है। फसल उगता है। देश के भण्डार को भरने की कोशिश करता है।  एक तरीके से देखा जाए तो किसान भले ही आज कर्ज़दार है, लेकिन देश हमेशा किसानों का कर्ज़दार रहेगा।




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रवि श्रीवास्तव (स्वतंत्र पत्रकार)
ई मेल : ravi21dec1987@gmail.com
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