पहली बार नहीं, सभी दलों के शासन में अयोध्या में आते रहें हैं पत्थर

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अयोध्या 09 जुलाई, अयोध्या में हाल ही में आये तीन ट्रक पत्थरों को लेकर मचे हंगामें से इतर राम मंदिर निर्माण के लिए विश्व हिन्दू परिषद(विहिप) की कार्यशाला में तराशने के लिए हर राजनीतिक दलों के शासनकाल में पत्थर आते रहे हैं। विहिप के बैनर तले काम करने वाले श्री रामजन्म भूमि न्यास ने पत्थरों को तराशने वाली कार्यशाला सितम्बर 1990 में स्थापित की थी। इसके लिए दिगम्बर अखाडे के महन्थ और न्यास के तत्कालीन अध्यक्ष दिवंगत रामचन्द्र परमहंस ने अखाडे की ही जमीन पर कार्यशाला शुरु करवायी थी। कार्यशाला शुरु होने के समय केन्द्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह और राज्य में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार वामपंथियों की मदद से चल रही थी। उनकी सरकार में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महासचिव इन्द्रजीत गुप्त गृहमंत्री थे। दोनों ही सरकारें राम मंदिर निर्माण के समर्थक भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिन्दू परिषद के क्रियाकलापों से पूरी तरह खिन्न थीं। इसके बावजूद कार्यशाला को स्थापित करने और न ही उसमें पत्थरों को लाने पर रोक लगायी गयी। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिरने के बाद पी वी नरसिंहराव देश के प्रधानमंत्री बने। वह कांग्रेसी थे। उन्होंने भी कार्यशाला में तराशे जा रहे पत्थरों से कोई छेडछाड नहीं की। उनकी सरकार के कार्यकाल के दौरान पत्थरों के आने और तराशने का कार्य बदस्तूर जारी रहा। केन्द्र में तीसरे मोर्चे की सरकार एच डी देवगौडा और इन्द्र कुमार गुजराल के नेतृत्व में चली। उस दौरान भी कार्यशाला अपनी गति से चलती रही। उत्तर प्रदेश में तीन बार मुलायम सिंह यादव और चार बार मायावती मुख्यमंत्री रहीं लेकिन कार्यशाला के काम में कोई बाधा नहीं डाली गयी। कार्यशाला में पत्थरों के तराशने का काम बदस्तूर चलता रहा। केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी और राज्य में कल्याण सिंह, रामप्रकाश गुप्त तथा राजनाथ सिंह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार चली। इस दौरान कार्यशाला के काम में बाधा पडने का सवाल ही नहीं उठता था।

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अखिलेश यादव की सरकार में 2015 में चन्द दिनों के लिए काम में ठहराव आया लेकिन जानकारों का कहना है कि इसके लिए सपा सरकार जिम्मेदार नहीं थी बल्कि विहिप ने ही कारीगरों की संख्या कम कर दी थी। एक समय तो ऐसा आया था कि कार्यशाला में केवल चार कारीगर काम कर रहे थे। जानकार कहते हैं कि विहिप चन्द दिनों के लिए कार्यशाला के कामों में आये ठहराव के लिए अखिलेश यादव सरकार को चाहे जितना जिम्मेदार ठहराये लेकिन सच्चाई है कि इसके लिए तत्कालीन राज्य सरकार को जिम्मेदार नहीं कहा जा सकता। काम कुछ दिनों के लिए रुका इसके पीछे विहिप का अपना कारण था। उधर, विहिप का कहना है कि अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में व्यापार कर विभाग से फार्म नहीं मिल पा रहे थे इसलिए पत्थरों को लाने में दुश्वारियां हुयीं। विहिप के मीडिया प्रभारी शरद शर्मा का कहना है कि सपा सरकार में फार्म नहीं दिये जाने के कारण 2015 में कुछ दिन तक पत्थर नहीं आ सके इसलिए कार्यशाला का काम प्रभावित हुआ था। विहिप के प्रस्तावित माडल के अनुसार मंदिर की उंचाई 128 फिट, लम्बाई 268़ 5 फिट और चौडाई 140 फिट होगी। दक्षिण भारतीय शैली में पत्थरों को तराशा जा रहा है। दो मंजिला मंदिर की इमारत प्रस्तावित है। इसमें 212 खम्भे होंगे। दोनों मंजिलों पर 106 -106 खम्भे बनेंगे। पत्थरों को बडी बारीकी से तराशा जा रहा है,लेकिन सूक्ष्म डिजाइनों को तराशने से परहेज किया जा रहा है। उन्हें पत्थरों को एसेम्बल करने के बाद तराशा जायेगा क्योंकि तराशे पत्थरों को ले जाते समय सूक्ष्म डिजाइनों के टूटने का डर रहता है। प्रस्तावित माडल के अनुसार मंदिर निर्माण होने पर करीब एक लाख 75 हजार घन फिट पत्थर लगेंगे जिसमें से एक लाख दस हजार घन फिट पत्थर तराशे जा चुके हैं। फर्श और प्रथम तल पर लगने वाले पत्थरों के तराशने का काम करीब -करीब पूरा हो चुका है। दूसरी ओर, केन्द्र और राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद मंदिर निर्माण समर्थकों का उत्साह बढा है। श्रीरामजन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष नृत्य गोपाल दास कहते हैं कि केन्द्र में मोदी और राज्य में योगी की सरकार होने की वजह से अब मंदिर निर्माण की बाधाएं हटेंगी क्योंकि दोनों ही राम के उपासक हैं। दोनों चाहते हैं कि मंदिर निर्माण हो।

मंदिर निर्माण के लिए गतिविधियां बढने मात्र से ही दूसरे पक्ष के लोग चिंतित हो उठते हैं। बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमेटी के संयोजक और अधिवक्ता जफरयाब जिलानी का कहना है कि मामला उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है। न्यायालय का निर्णय ही मान्य होगा। न्यायालय ने भी सुलह समझौते से मामले के निपटारे का सुझाव दिया था, लेकिन यह मुद्दा अब काफी आगे बढ गया है इसलिए बातचीत से मसले के हल की गुंजाइश कम है। संविधान से ऊपर कोई नहीं है। संविधान से देश चलता है। मामले का निपटारा भी संवैधानिक दायरे में होना चाहिए। मंदिर मस्जिद विवाद के मुद्दई और विवादित धर्मस्थल के पास ही रहने वाले हाजी महबूब कहते हैं कि पत्थरों के आने जैसे मसलों पर लोग शोर मचाने लगते हैं। उनका दावा है कि शोर मचाने का कारण एकमात्र वोट की राजनीति है। देश का यह अहम मसला है, इसलिए इसको राजनीति से अलग रखना चाहिए। न्यायालय के आदेश का इंतजार करना चाहिए। न्यायालय से जो भी आदेश आयेगा उसका पालन किया जायेगा।

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