विशेष : जीएसटी हस्तशिल्प इंडस्ट्री के लिए काला कानून

उत्पाद शुल्क, सेवाकर तथा व्यापार कर से मुक्त हस्तशिल्प इंडस्ट्री को भी जीएसटी के दायरे में रखा गया है। इससे हस्त निर्मित कालीन उद्योग, बनारसी साड़ी उद्योग, कास्ठकला उद्योग समेत अन्य कुटीर उद्योगों पर भी गत एक जुलाई से जीएसटी लागू है। जीएसटी के बाबत सरकार की सभी दलीलों को समझने परखने के बाद इससे जुडे कारोबारी, बुनकर हतप्रभ है। पूरे इंडस्ट्री में हड़कंप की स्थिति है। उद्योग से जुड़े उत्पादों की बिक्री पर 12 फीसदी व निर्माण पर 18 फीसदी के साथ बुनकर या यूं कहें कामगारों पर 18 फीसदी जीएसटी लगाना किसी को रास नहीं आ रहा है। तर्क है कि शीघ्र ही हस्तशिल्प उद्योग को जीएसटी के दायरे से मुक्त नहीं किया गया तो देश की आन बान शान ये कुटीर उद्योग तबाह हो जायेंगे 



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बेशक, इन्हीं उहापोहों व नफान्नुकसान के बीच चाहे वह कारपेट इंडस्ट्री हो या साड़ी, जुट, कास्ठकला, जरदोजी समेत अन्य छोट छोटे कुटीर उद्योगों के कारोबारियों में जीएसटी को लेकर हायतौबा मचा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से लेकर भदोही, मिर्जापुर, जौनपुर, गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़, आगरा, मेरठ, दिल्ली, जम्मू कश्मीर, पानीपत, जयपुर समेत पूरे देश के हस्तशिल्प कारोबारीजीएसटी के विरोध में सड़कों पर उतर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। कारोबारी जीएसटी को काला कानून बताते हुए सरकार से दुहाई दे रहे है हस्तशिल्प उद्योग तबाह हो जायेगा। उद्योग से जुड़े लाखों लोग के समक्ष रोजी रोटी का संकट खड़ा हो जायेगा। विशेषकर कालीन उत्पादन से लेकर पैंकिंग तक दर्जनों हाथों से होकर एक कालीन गुजरता है। ऐसे में कामगारों पर 18 फीसद जीएसटी लगाना न्याय संगत नहीं है। जबकि कालीन उद्योग में अधिकांशतः सूक्ष्म, लधु व मध्यम श्रेणी की इकाइंयां स्थापित हैं, जो इस टैक्स का भार सहन करने में अक्षम हैं। जीएसटी के चलते उत्पादों की लागत में भी वृद्धि होगी जो अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के दौर में कहीं से भी न्याय संगत नहीं हैं। क्योंकि जब लागत बढ़ेगी तो अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में कीमत बढ़ेगी, जो अन्य प्रतिद्वंदी देशों के मुकाबले अधिक होगी। ऐसे में उनके उत्पाद धरे के धरे रह जायेंगे। 

गौर करने वाली बात यह है कि जीएसटी से कृषि के बाद सर्वाधिक रोजगार कपड़ा उद्योग, कालीन उद्योग, साड़ी उद्योग, वूल उद्योग आदि हस्तशिल्प उद्योग है। इन उद्योगों को जीएसटी के दायरे में रखने से ये गहरे संकट की चपेट में है। यही वजह है कि इससे जुड़े कारोबारियों का धरना-प्रदर्शन का अंतःहीन शिलशिला जारी है। हस्तनिर्मित धागे पर 18 प्रतिशत कर लगाया है जिसका कुल मांग में 60 प्रतिशत योगदान है। इससे छोटे निर्माताओं का व्यापार लगभग समाप्त हो जाएगा और बड़े औद्योगिक घरानों को फायदा पहुंचेगा। कहा जा सकता है तमाम जटिलताओं भरा जीएसटी कानून एक तरह से इंस्पेक्टर राज की स्थापना करने जैसा है। 5, 12, 18 और 28 प्रतिशत की जीएसटी दरों के साथ यह बेहद उलझाऊ भी है। करीब 30 प्रतिशत वस्तुओं पर अधिकतम 28 फीसद की दर घोर अन्याय है। दुनिया की किसी भी अर्थव्यवस्था में इतने भारी भरकम करों वाला जीएसटी कानून नहीं है। बांग्लादेश में यह 15 प्रतिशत, मलेशिया में छह प्रतिशत, सिंगापुर और थाईलैंड में सात प्रतिशत, जापान में आठ प्रतिशत, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया में 10 प्रतिशत, दक्षिण अफ्रीका में 14 प्रतिशत, ब्राजील, चीन आदि में 17 प्रतिशत है। खास यह है कि जीएसटी कानून के तहत करदाताओं को 37 रिटर्न प्रतिवर्ष भरने होंगे और सभी 36 राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में व्यापार करने वालों को 1,332 रिटर्न भरने होंगे। छोटे और मध्यम कारोबारियों के लिए इतनी जटिल प्रक्रिया वाला यह कानून उनकी रोजी-रोटी पर कड़ा प्रहार करेगा। जहां तक सरकार की तैयारियों का सवाल है, वह उंट के मुंह में जीरे के समान है। जीएसटी नेटवर्क के तहत लगभग 350 करोड़ इनवॉइस हर महीने भेजे जाएंगे, उसके लिए निविदा प्रक्रिया 15 जून को शुरू की गई। इसकी फाइनेंशियल बिड सात जुलाई को खुली। उसके परीक्षण के लिए अगस्त, 2017 से जुलाई, 2018 की अवधि निर्धारित की गई है। 


खेती में काम आने वाले कीटनाशक, टैक्टर के पुर्जो पर 28 प्रतिशत की दर से कर तय किया गया है। खाद पर 5 प्रतिशत कर लगाया गया है। किसान को इनपुट क्रेडिट का लाभ भी नहीं मिलेगा। वेयरहाउस, कोल्डस्टोरेज और उर्वरकों की ढुलाई इत्यादि पर भी 18 प्रतिशत कर लगाया गया है। सरकार ने उपभोक्ता मूल्य सूचक की वस्तुओं को कम करों के दायरे में रखा है ताकि यह संदेश जाए कि जीएसटी के बाद महंगाई कम हुई है। हकीकत यह है कि रोटी, कपड़ा और मकान पर सरकार ने बड़ा प्रहार किया है। शैंपू, वॉशिंग मशीन, क्रेडिट कार्ड के तहत भुगतान, बैंकिंग सेवाएं, बीमा प्रीमियम, हेलमेट, छोटी कारें, शैक्षणिक संस्थान, हास्पिटल, डायलिसिस और ब्लड टेस्ट के साथ वाहनों की ईएमआई, मिनरल वॉटर, सीमेंट इत्यादि पर 18 से 28 प्रतिशत कर लगाया गया है। सरकार द्वारा यह दावा किया जा रहा है कि 81 प्रतिशत वस्तुओं को 18 प्रतिशत की कर श्रेणी में रखा गया है जबकि सच्चाई यह है कि जो 43 प्रतिशत वस्तुएं 18 प्रतिशत कर दायरे में हैं वे मूलतः फिनिश्ड गुड्स यानी अंतिम तैयार उत्पाद नहीं हैं। अधिकांश वस्तुएं 28 प्रतिशत कर श्रेणी वाली तैयार वस्तुओं के लिए काम आने वाली हैं। 

सरकार दावा कर रही है कि उसे जीएसटी से जीडीपी का 10.9 प्रतिशत सकल राजस्व प्राप्त होगा अर्थात एक लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर हासिल होगा। अगर यह मान भी लिया जाए कि सरकार अधिक से अधिक लोगों को कर के दायरे में लाकर राजस्व बढ़ा रही है तो फिर करों की इतनी अधिक दर क्यों निर्धारित की गई है? डीजल-पेट्रोल को जीएसटी से बाहर क्यों रखा गया। जबकि सबसे अधिक राजस्व इसी क्षेत्र से मिलता है। आंकड़ों के मुताबिक जब पेट्रोलियम उत्पादों पर सब्सिडी का भार एक लाख 43 हजार 778 करोड़ रूपये था तब उन पर करों के माध्यम से एक लाख 52 हजार 900 करोड़ रुपये प्राप्ति होती थी। आज जब पेट्रोलियम उत्पादों पर सब्सिडी का भार मात्र 27,571 करोड़ रुपये रह गया है तब सरकार करों के रूप में 2,58,443 करोड़ रुपये वसूल रही है। क्या यह उचित नहीं था कि पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में लाकर जनता को राहत प्रदान की जाती? जीएसटी की जीवनरेखा कही जाने वाली इनपुट क्रेडिट व्यवस्था की परिस्थितियां क्या होंगी, जब लगभग 350 करोड़ इनवॉइस हर महीने कारोबारियों द्वारा भेजे जाएंगे। इनवॉइस की जांच में अगर पूर्व में काटे गए कर में से एक रुपया भी माल बेचने वाले ने कर के रूप में कम भरा है तो माल खरीदने वाले व्यापारी को इनपुट क्रेडिट का लाभ नहीं मिलेगा। सच तो यह है कि किसी भी देश में इनवॉइस जांच की इतनी जटिल व्यवस्था नहीं है। दक्षिण कोरिया, ब्राजील और चीन जैसे देशों ने इसे लागू करने के तुरंत बाद उससे तौबा कर यह प्रावधान समाप्त कर दिया। 





(सुरेश गांधी)
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