बिहार : जनकन्वेंशन में वाम, 74 आंदोलन और समाजवादी धारा के नेताओं को किया जाएगा आमंत्रित.

  • 1-6 अगस्त: नीतीश-मोदी द्वारा जनादेsh से गद्दारी और लोकतंत्र की हत्या के खिलाफ विरोध अभियान
  • 8 अगस्त को पटना में जनकन्वेंशन गेट पब्लिक लाइब्रेरी में.
  • 9-15 अगस्त: ‘जनादेश से गद्दारी नहीं सहेंगे, भूमि अधिकार लेकर रहेंगे’ अभियान

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पटना 31 जुलाई, बिहार में महागठबंधन की जगह एक बार फिर से जद(यू)-भाजपा की सरकार चोर दरवाजे से थोप दी गयी है. बिहार विधानसभा 2015 के जनोदश को उलटते हुए नीतीश कुमार ने अपने पुराने सहयोगी को बिहार में सत्ता हड़पने का मौका दिया है. जिस आनन-फानन में उन्होंने भाजपा की गोद में लौटकर एनडीए सरकार का गठन किया, उसेे  तख्तापलट और चरम राजनीतिक अवसरवाद के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता है.  नीतीश कुमार भ्रष्टाचार विरोध के नाम पर इसे सही ठहराने और ‘जीरो टाॅलरेंस’ का दावा कर रहे हैं. लेकिन अपने पहले कार्यकाल में खजाना घोटाला से लेकर मौजूदा कार्यकाल में डिग्री घोटाले के लंबे सिलसिले के लिए नीतीश कुमार सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं. भाजपा भी बिहार सहित अन्य राज्यों में तथा केंद्र में कई बड़े भ्रष्टाचार के मामलों में दागी है. जनादेश के साथ गद्दारी तो अपने आप में ही बहुत बड़ा घोटाला है. कार्यकाल के बीचों-बीच नीतीश कुमार ने 2015 के जनादेश के अर्थ और उसकी दिशा को मनमाने रूप से बदल दिया है. यह चरम राजनीतिक भ्रष्टाचार नहीं तो क्या है? 


एनडीए की गोद में लौटने का मतलब है कि बिहार में भी भाजपा के प्रभुत्व वाली सरकार कायम हो गयी है. नीतीश कुमार अब उसकी दया पर निर्भर रहेंगे. विधानसभा में सरकार ने विश्वासमत भले हासिल कर लिया हो, लेकिन बिहार की व्यापक जनता की नजरों में इस सरकार की कोई वैधता नहीं है. 2005 से 2013 तक जद (यू)-भाजपा शासन से परिस्थितियां आज कई मामलों में भिन्न हैं. उस वक्त न तो केंद्र में एनडीए सरकार थी और न ही संघ परिवार की आज वाली चौतरफा आक्रामकता थी. लेकिन उस समय भी नीतीश सरकार ने संघ और भाजपा के एजेंडे को पूरी वफादारी से लागू करने का ही काम किया था. अमीरदास आयोग को भंग किया जाना और भूमि सुधार आयोग की रपट को रद्दी की टोकरी में डाल देना - इन दोनों कारनामों ने काफी पहले ही नीतीश कुमार के रवैये का साफ संकेत दे दिया था. शपथ ग्रहण समारोह के दौरान ही ‘जय श्री राम’ के जोर-जोर से लगाए गए नारे इस बात को साफ कर देता है कि इस बार नीतीश सरकार संघ-भाजपा के हाथ में कठपुतली भर रहेगी.

भाजपा आज देश में निर्लज्जतापूर्वक सत्ता के अपहरण में लगी हुई है. मणिपुर, गोवा का उदाहरण हमारे सामने है. अब तो संघ-भाजपा विचारक ‘आॅपरेशन बिहार’ की तुलना खुलेआम हिटलर के विजय अभियानों से कर रहे हैं. वे कह रहे हैं कि बिहार में तख्तापलट करना हिटलर के द्वितीय विश्वयु़द्ध के अभियानों और 1967 में इस्राएल द्वारा फिलीस्तीन के कई इलाकों पर जबरन कब्जा करने के समान है. यह भी कह रहे हैं कि मोदी सरकार की ‘मारक क्षमता’ अब उच्च स्तर पर पहुंच गयी है. संघ-भाजपा आज खुद हिटलर और इस्राएल के फासीवादी अभियानों से अपनी तुलना करके अपने फासीवादी चरित्र को उजागर कर रहे हैं. नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर बिहार जनादेश 2015 से गद्दारी की है, तो केंद्र की मोदी सरकार जनादेश 2014 का लगातार अपमान ही कर रही है. इस तरह दो गद्दारों में एकता हो गयी है. विकास के नाम पर देश में काॅरपोरेट लूट धड़ल्ले से जारी है. अंबानी-अडानी के बाद बाबा रामदेव भी पूंजीपतियों की नई कतार में शामिल हो गये हैं. एक तरफ, अमीरों की संपत्ति में दिन-प्रतिदिन इजाफा हो रहा है, तो दूसरी ओर आम जनता का जीवन लगातार संकटग्रस्त होता जा रहा है. साथ ही, भाजपा का ‘स्वच्छ भारत’ और नीतीश कुमार के शराबबंदी कानून के काले प्रावधान आज दलित-गरीबों के दमन-उत्पीड़न के नए औजार बन गये हैं.


ऐसे में हमें चौतरफा प्रतिरोध तेज करना ही होगा. बिहार 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से ही आजादी, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सौहार्द्र के संघर्ष का अगुवा केंद्र रहा है. आज जब काॅरपोरेट लूट, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, सामाजिक उत्पीड़न, चरम राजनीतिक अवसरवाद के एजेंडे के जरिये लोकतंत्र को खत्म कर देने की कोशिशें की जा रही हैं, तो निश्चित रूप से बिहार की जनता फासीवाद विरोधी संघर्ष की अगली कतार में खड़ी रहेगी. जनता ने भाजपा के खिलाफ जद (यू) को वोट किया था, लेकिन भाजपा से गलबहियां करके नीतीश कुमार ने जनता का अपमान किया है. इसलिए जद (यू) के विधायकों से जवाब मांगने का समय आ गया है. 74 आंदोलन व आपातकाल विरोध की राजनीति से निकले नीतीश कुमार आज मोदी के अघोषित आपातकाल व बढ़ती निरंकुशता के सबसे बड़े पार्टनर बन गये हैं. बिहार की लोकतांत्रिक विरासत के साथ यह बहुत बड़ा विश्वासघात है. समाजवादी धारा के कुछ लोगों ने बिहार में तख्तापलट का विरोध किया है, उनका यह कदम स्वागतयोग्य है. वक्त आ गया है कि समाजवादी धारा के लोग खुलकर इस राजनीतिक भ्रष्टाचार व तानाशाही के खिलाफ जनता के पक्ष में खड़े हों. भाकपा (माले) अपने जन्मकाल से ही लोकतंत्र की रक्षा व विस्तार के लिए हमेशा से संघर्ष की अगली कतार में रही है.

कार्यक्रम की रूपरेखा
1-6 अगस्त: नीतीष-मोदी द्वारा जनादेष से गद्दारी और लोकतंत्र की हत्या के खिलाफ विरोध अभियान
8 अगस्त को पटना में जनकन्वेंषन गेट पब्लिक लाइब्रेरी में.
9-15 अगस्त: ‘जनादेष से गद्दारी नहीं सहेंगे, भूमि अधिकार लेकर रहेंगे’ अभियान
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