विशेष आलेख : केवल आकाओं को सन्मति दे भगवान

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भारतीय लोकतंत्र एक बार फिर शर्मसार हुआ, सांसदों के अमर्यादित व्यवहार ने  संसद की गरिमा को धुंधलाया है। कांग्रेस के छह सांसदों ने लोकसभा में जैसी अराजकता एवं अभद्रता का परिचय दिया और जिसके चलते उन्हें पांच दिनों के लिए निलंबित किया गया, यह भारतीय लोकतंत्र की एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। लोकसभा में हंगामा होना आम बात हो गयी है। पुरे देश का प्रतिनिधित्व करने वाले लोकसभा के सांसदों के हंगामे और सदन में की जा रही अभद्रता एवं अशालीनता से क्या सन्देश जाता है ये तो हम सब जानते ही है लेकिन इसे शायद हमारे माननीय गण समझ नहीं पाते हंै। इस अशोभनीय घटना के ठीक एक दिन पहले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने नसीहत दी कि हंगामे के कारण सत्तापक्ष से ज्यादा नुकसान विपक्ष का होता है। शायद कांग्रेसी सांसदों ने इस पर गौर नहीं किया। कांग्रेसी सदस्यों के लिए इस तरह के बेवजह हंगामें का कहीं कोई औचित्य नहीं बनता था कि वे लोकसभा अधिकारियों की फाइलों के कागज फाड़कर अध्यक्ष पर फेंकते, क्योंकि वे जिस मसले पर सदन में चर्चा चाह रहे थे उस पर सरकार भी सहमत थी और खुद अध्यक्ष भी। आखिर जब सरकार गौ-रक्षकों की हिंसक भीड़ का निशाना बन रहे दलितों और अल्पसंख्यकों के मसले पर बहस को तैयार थी तब फिर कांग्रेसी सांसदों को अमर्यादित एवं अनुशासनहीन व्यवहार करने और फाइलें फाड़ने की क्या जरूरत थी? कांग्रेसी सांसद जिस तरह बेवजह तैश में आए और अशोभनीय आचरण की हद पार कर गए उससे तो यही लगता है कि वे पहले से तय करके आए थे कि सदन में हंगामा ही करना है। इस तरह के पूर्वाग्रह लोकतंत्र को कमजोर ही नहीं, बल्कि शर्मिन्दा भी करते हैं।


ऐसा लगता है कि आज देश की आजादी मिले सत्तर वर्ष हो चुके हैं, पर उम्र की दृष्टि से आज भी हमारे अनुभव, हमारा लोकतांत्रिक चरित्र बचकाना है। जबकि लोकतांत्रिक आदर्श हमारे शब्दों में ही नहीं उतरना चाहिए, बल्कि राजनीति का अनिवार्य हिस्सा बनना चाहिए था, उन आदर्शों एवं संसदीय मर्यादाओं को सिर्फ कपड़ों की तरह न ओढ़ा जाये अन्यथा फट जाने पर आदर्श भी चिथड़े कहलायेंगे। लोकतांत्रिक जीवन की सार्थकता को जीवंत करना होगा। तभी हम अच्छे-बुरे, उपयोगी-अनुपयोगी का फर्क कर पाएंगे। जनप्रतिनिधि मार्गदर्शक होता है यानि नेता शब्द कितना पवित्र व अर्थपूर्ण है पर नेता अभिनेता बन गया। नेतृत्व स्वार्थी एवं सत्तालोलुप बन गया। आज नेता शब्द एक गाली है। जबकि नेता तो पिता का पर्याय था। उसे पिता का किरदार निभाना चाहिए था। पिता केवल वही नहीं होता जो जन्म का हेतु बनता है अपितु वह भी होता है, जो अनुशासन सिखाता है, विकास की राह दिखाता है, आगे बढ़ने का मार्गदर्शक बनता है और संस्कारों को पोषित करता है। संसद के पिछले सत्रों पर नजर डाली जाए तो जाहिर है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष में समन्वय कहीं नजर ही नहीं आ रहा है। इस टकराव ने संसदीय परम्पराओं की तमाम मर्यादाओं को ध्वस्त कर दिया है। एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ ने संसद की गरिमा को तार-तार कर दिया है। ऐसा नहीं कि हंगामा पहले नहीं होता था। होता था लेकिन एक सीमा के भीतर। आसन का सम्मान किया जाता था। स्पीकर सुमित्रा महाजन ने इस अभद्रता पर कहा “मैं देखना चाहती हूं कि सांसद कितनी अनुशासनहीनता कर सकते हैं, देश भी इनके बर्ताव को देख रहा है।” समूचे देश ने इस कृत्य को देखा। 

कागज उछालने वाले कांग्रेस के छह सांसदों में गौरव गोगोई, अधीर रंजन चैधरी, रंजीत रंजन, एमके राघवन, सुष्मिता देब और के सुरेश ने जब अभद्रता की, उस दौरान कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और सोनिया गांधी भी मौजूद थे। सोनिया गाँधी ने अपने कार्यालय में इसी मुद्दे को लेकर अन्य विपक्षी नेताओं से मुलाकात की और निलंबन के विरोध में संसद भवन में महात्मा गांधी की मूर्ति के सामने धरना घोषित किया। यह हंगामा करने की आदत का ही नतीजा कहा जाएगा कि अपने छह सदस्यों के लज्जास्पद व्यवहार पर खेद जताने के बजाय कांग्रेसी सांसद लोकसभा अध्यक्ष के फैसले के खिलाफ संसद परिसर में गांधीजी की प्रतिमा के समक्ष प्रदर्शन के लिये तत्पर हुए हैं। यह तो संसद के साथ-साथ गांधीजी के आदर्शों एवं सिद्धान्तों का भी निरादर है। खुद चोर ऊपर से कोतवाल को डांटे वाली हैरत में डालने वाली स्थिति दर्शाती है कि यह उग्र और शर्मनाक आचरण कांग्रेस की उसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत संसद में हर दिन किसी-न-किसी मसले को उठाकर सदन की कार्यवाही बाधित करना है। इस तरह की सोच एवं व्यवहार राष्ट्रीयता को कमजोर करता है। यह पहली बार नहीं जब विपक्ष की ओर से ऐसे किसी मसले पर संसद में हंगामा किया गया हो, जिस पर सत्तापक्ष चर्चा के लिए सहमत हो। ऐसा अब आए दिन होता है और कई बार तो चर्चा का नोटिस दिए बिना संबंधित मसले पर बहस की जिद पकड़ ली जाती है। आखिर विपक्ष ने यह क्यों मान लिया है कि उस पर किसी तरह के नियम-कानून लागू नहीं होते? या वे किसी भी हद तक अनुशासनहीनता करने के लिये स्वतंत्र है? यदि ऐसा कुछ नहीं है तो फिर निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बगैर चर्चा करने या सरकार से जवाब मांगने के बहाने संसद और देश का वक्त जाया करने वाली हरकतें क्यों की जाती हैं? 


नैतिक जिम्मेदारियों को समझते हुए इस कुकृत्य के लिए क्षमा प्रार्थी होने के बजाय धरना देना इस कहावत की ओर इशारा करता है-एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी  गलती भी आपकी और धरना भी आपका। आज जब इसकी आवश्यकता कहीं अधिक है कि कालेघन, नोटबंदी, जीएसटी, किसानों की समस्याओं, भीड़ की हिंसा समेत अन्य अनेक जो भी गंभीर मसले हैं उन सब पर संसद में सार्थक चर्चा हो तब यह साफ दिख रहा है कि विपक्ष की रुचि सरकार को घेरने के नाम पर हो-हल्ला करते रहने में अधिक है। यह संसद की गरिमा से खिलवाड़ करने और साथ ही अपनी जिम्मेदारी से भागने वाला रवैया है। राजनीतिक दल संसद में हंगामा कर केवल अपनी छवि से ही नहीं खेलते, बल्कि वे आम जनता को भी निराश करते हैं। राजनीति और लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत नहीं कि संसद और विधानसभाएं धीरे-धीरे हंगामा करने का मंच अधिक बनती जा रही हैं। स्वार्थ के घनघोर बादल छाये हैं, सब अपना बना रहे हैं, सबका कुछ नहीं। और उन्माद की इस प्रक्रिया में आदर्श बनने की पात्रता किसी में नहीं है, इसलिये आदर्श को ही बदल रहे हैं, नये मूल्य गढ़ रहे हैं। नये बनते मूल्य और नये स्वरूप का तथाकथित राजनीतिक चरित्र क्रूर, भ्रष्ट, अमानवीय और जहरीले मार्गों पर पहुंच गया है। पर असलियत से परे हम व्यक्तिगत एवं दलगत स्वार्थों के लिए अभी भी प्रतिदिन ‘मिथ’ निर्माण करते रहते हैं। 

अगर हमें देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बदलाव लाना है, ईमानदारी को प्रतिष्ठित करना है, राजनीति को आदर्श सांचे में ढालना है और चरित्र की प्रतिष्ठा करनी है तो जड़ों को सींचना होगा, केवल पत्तों को सींचने से बदलाव नहीं आ सकता। उसके लिये साफ नीतियां और नियत चाहिए और चाहिए इन नीतियों के निर्माताओं एवं उनको क्रियान्वित करने वाले उन्नत चरित्र वाले राजनेताओं की। आवश्यकता है देश में ऊंचे कद वाले नेता हों। केवल व्यक्ति ही न उभरे, नीति उभरे, जीवनशैली उभरे। चरित्र की उज्ज्वलता उभरे। हरित क्रांति, श्वेत क्रांति के बाद अब चरित्र क्रांति का दौर हो। वरना लोकतांत्रिक मूल्य और देश की अस्मिता बौने होते रहेंगे। महात्मा गांधी के प्रिय भजन की वह पंक्ति- ‘सबको सन्मति दे भगवान’ में फिलहाल थोड़ा परिवर्तन हो- ‘केवल आकाओं को सन्मति दे भगवान।’




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(ललित गर्ग)
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