विशेष : राष्ट्रपति चुनाव और विपक्ष की पराजित मानसिकता

भारत के नए राष्ट्रपति के रुप में महामहिम रामनाथ कोविन्द का पदारोहण हो गया। चुनाव से पूर्व ही इस बात के संकेत मिल गए थे कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के उम्मीदवार ही विजयी होंगे और उनकी विजय हुई भी। इस चुनाव के दौरान जितनी सक्रियता भाजपा की ओर से दिखाई दी, वैसी सक्रियता कांगे्रस सहित विपक्षी दलों की ओर से नहीं देखी गई। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि विपक्षी दलों की ओर से उम्मीदवार बनाई गर्इं मीरा कुमार का पूरा चुनाव ही पराजित मानसिकता के साथ लड़ा गया। विपक्ष ने यह बात पहले से ही तय मान ली थी कि हमारा उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सकता। विपक्ष जब ऐसी मानसकिता के चलते चुनाव लड़ रहा था, तब यह कल्पना की जा सकती है कि आने समय भी विपक्ष के लिए कमजोर ही होगा। क्योंकि वर्तमान में राजनीतिक गणित का हिसाब लगाया जाए तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बहुत शक्तिशाली होता दिखाई दे रहा है। भविष्य में भी राजग के और शक्तिशाली होने के संकेत दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्ष की एकता के जिस प्रकार के दावे किए जा रहे हैं, उन दावों में खोखलापन अभी से दिखाई देने लगा है।


वर्तमान राजनीतिक स्थितियों को देखते हुए यह सहज ही अनुमान लगाया जाने लगा है कि उपराष्ट्रपति के चुनाव में भी राजग का उम्मीदवार विजयी होगा। यह अनुमान केवल आकलन मात्र नहीं, बल्कि संख्यात्मक हिसाब से भी विजय के संकेत देता हुआ दिखाई दे रहा है। भारतीय जनता पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद पर बिठाए गए रामनाथ कोविन्द विशुद्ध ग्रामीण परिवेश से हैं। इससे निश्चित रुप से समाज में यही संदेश गया है कि एक गरीब घर का व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री बन सकता है और एक विशुद्ध ग्रामीण जीवन से सरोकार रखने वाला व्यक्ति देश का राष्ट्रपति बन सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के परिवार की स्थिति को आज पूरा देश जान चुका है। वास्तव में हमारे देश में पहले जो कुछ दिखाई दिया, उसमें यही संदेश जाता था कि एक मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनने वाला व्यक्ति केवल अपने परिवार को ही राजनीतिक सुविधाएं और सुरक्षा देता आया है। वर्तमान में मोदी के परिवार को ही नहीं, बल्कि उनकी पत्नी को भी विशेष सुरक्षा नहीं दी गई, इसके विपरीत अन्य राजनेता प्रधानमंत्री स्तर की सुरक्षा अपने पूरे परिवार को देने में संकोच भी नहीं करते।

देश को आजादी मिलने के बाद जिस प्रकार की राजनीतिक संकल्पना को देश की जनता ने देखा है, उससे यही संदेश गया कि राजनीतिक दलों का नेतृत्व केवल उन्ही व्यक्तियों को मिल सकता है, जिनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि है। कांगे्रस सहित कई दलों की राजनीति इसी पृष्ठभूमि को प्रतिपादित करती हुई दिखाई दे रही है। इस मिथक को भारतीय जनता पार्टी ने तोड़ा है। भारतीय जनता पार्टी ने ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति पद पर आसीन किया है। जिसने ग्रामीण जीवन जिया है। आज समाज में एक अच्छा संदेश यह भी गया है कि ऐसा केवल भारतीय जनता पार्टी ही कर सकती है। हो सकता है कि इस प्रकार के लेखन को कांगे्रस पार्टी नकारने का प्रयास करे, क्योंकि वर्तमान में अपनी स्थिति की वास्तविक समीक्षा करते हुए दिखाई नहीं दे रही। जो उसकी कमी को उजागर करता है, उसे भाजपा से जोड़कर देखना ही कांगे्रस की नियति बन गई है। हमारे देश में कहा जाता है कि निन्दा प्रगति के मार्ग के अवरोधों को दूर करने में सहायक मानी जाती है। लेकिन जिसे केवल अपनी प्रशंसा ही सुनने की आदत हो, उसका सुधार हो पाना बहुत मुश्किल है। कांगे्रस आज कुछ ऐसा ही कर रही है, उसकी नजर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हर काम गलत ही होता है। चाहे वह देश हित का काम हो या भ्रष्टाचार मिटाने की बात हो।

वास्तव में देश में यह किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि भारतीय जनता पार्टी रामनाथ कोविन्द को राष्ट्रपति के रुप में लाएगी। भाजपा के इस राजनीतिक तीर ने विपक्ष को चारों खाने चित करने का काम किया। उत्तरप्रदेश में जिस दलित उत्थान की बात बसपा की मायावती करती आर्इं हैं। वे चार बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने के बाद भी दलितों का उत्थान नहीं कर सकीं। इतना ही नहीं उन्होंने अपने अलावा किसी को भी राजनीतिक नेतृत्व का अधिकार भी नहीं दिया। वह चाहती तो दलित नेतृत्व को उभार सकती थीं, लेकिन उन्होंने नहीं किया। दलित उत्थान का जो काम भाजपा ने किया है, वह अपने आपमें एक उदाहरण है। भाजपा के आदर्श पुरुष पंडित दीनदयाल उपाध्याय की सोच को अंगीकार करते हुए अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को देश का राष्ट्रपति बनाया है। उल्लेखनीय है कि राजग की अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय मुसलमान वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले महान वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति पद प्रदान कर विपक्ष के मुंह पर ताला लगाने का काम किया था। हम जानते हैं कि कई राजनीतिक दल आज भी भारतीय जनता पार्टी को मुसलमान और दलित विरोधी बताने का काम करते हैं, लेकिन उनकी यह बात इन दो नामों के साथ ही झूठे प्रमाणित हो जाते हैं। ऐसे में कहा जा सकता है अब झूठ पर आधारित होने वाली राजनीति के दिन लद गए हैं। लम्बे समय तक झूठ चलता भी नहीं है।


लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव परिणामों पर दृष्टि डाली जाए तो एक बात साफ दिखाई देती है कि कांगे्रस सिमटती जा रही है। पंजाब को छोड़ दिया जाए तो कई राज्यों में कांगे्रस को बुरी तरह से पराजित हुई है। कांगे्रस को इस पराजय के कारणों को तलाशना चाहिए, जबकि कांगे्रस केवल विरोध की ही राजनीति करने को ही अपना प्रमुख लक्ष्य मानकर राजनीति करती हुई दिखाई दे रही है। इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी ने जनता में एक विश्वास पैदा किया है। मोदी की तीन वर्ष के कार्यकाल को देखकर यह आश्वस्ति होने लगी है कि भ्रष्टाचार मुक्त सरकार भी हो सकती है। हालांकि आम जनता को परेशान करने वाला प्रशासनिक भ्रष्टाचार अभी पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ, लेकिन जिस प्रकार जनता में आशा का भाव पैदा हुआ है, उससे यह लगने लगा है कि यह भी एक दिन दूर होगा ही। केन्द्र सरकार की नगद रहित योजना भ्रष्टाचार मिटाने का ही एक कदम है।




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सुरेश हिन्दुस्थानी
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