मधुबनी : सौराठ सभा में 3 दशक बाद लौटी पुरानी रौनक

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मधुबनी, 4 जुलाई, मिथिला संस्कृति की पहचान ‘सौराठ सभा’ में इस साल तीन दशक के बाद पुरानी रौनक देखने को मिली। 700 साल के इतिहास और यहां की संस्कृति को समेटे इस सभा में इस वर्ष न केवल देश के, बल्कि प्रवासी मिथिलावासी भी पहुंचे। इस वर्ष नौ दिनों तक चलने वाले इस सभा में 365 शादियां तय हुईं तथा दो विवाह सभागाछी स्थल में ही संपन्न हुए। परंपरा के मुताबिक, यहां पहले गुरुकुल से सीधे योग्य युवकों को सौराठ सभागाछी में लाया जाता था और उन योग्य शिक्षित युवकों के प्रतिभा को देखकर अपने स्वजनों के लायक उचित वर समझकर गुरुजनों से आज्ञा लेते थे और विवाह तय होते थे। इस दौरान यह भी देखा जाता था कि लड़कों के पैतृक परिवार के सात पुश्तों में और मातृक परिवार के पांच पुश्तों में पहले कभी सीधा रक्त संबंध नहीं बने हों। इसके बाद गुरुजन ‘अधिकार निर्णय’ करवाते थे, ऐसे अधिकार निर्णय को एक ताड़ के पत्ते पर लाल स्याही से लिखवाया जाता था, जिसे ‘सिद्धांत’ कहा जाता था। इसके बाद शादी तय होती थी। कालांतर में इस सभागाछी का महत्व समाप्त होता चला गया। इस वर्ष मिथिलालोक फाउंडेशन सहित कई संगठनों ने इस सभा को पुनर्जीवित करने की ठानी, जिसका परिणाम है कि इस सभा में प्रतिदिन हजारों की भीड़ जुटी। 


दरभंगा के कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति सर्वनारायण झा इस वर्ष सौराठ सभा की सफलता पर प्रसन्नता जाहिर करते हुए कहते हैं, “इस वर्ष प्रबुद्धजनों की मेहनत रंग लाई और उसका परिणाम है कि मिथिला की सभ्यता और संस्कृति पुनर्जीवित होती दिखी।” उन्होंने इस मेले को डिजिलाइटेशन पर जोर देते हुए कहा कि इस संस्कृति को बचाए रखना सभी मिथिलावासियों का दायित्व है। मिथिलालोक फाउंडेशन के चेयरमैन और शिक्षाविद् डॉ़ बीरबल झा इसकी सफलता पर कहते हैं, “यह केवल मिथिलालोक फाउंडेशन की ही मेहनत का परिणाम नहीं है, बल्कि इसमें सभी का सहयोग रहा।” उन्होंने इस वर्ष 25 जून से तीन जुलाई तक चली सभा की सफलता की चर्चा करते हुए कहा कि इस सभा को पुनर्जीवित करने के लिए न केवल जनजागरण अभियान चलाया गया, बल्कि ‘चलू सौराठ सभा’ के माध्यम से लोगों को सभा में आने का निमंत्रण दिया गया। डॉ़ झा ने कहा, “सौराठ सभा वैवाहिक संस्था है, इसको मजबूत किया जाना चाहिए। मिथिला विश्व के लिए एक आदर्श बन सकता है। यहां दस लाख की जनसंख्या में एक भी विवाह विच्छेद की बात सुनने को नहीं मिलेगी।” मधुबनी के जिलाधिकारी शीर्षत कपिल अशोक भी इस सभा में पहुंचे और इस अभियान की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि किसी भी परंपरा को जीवित रखना आने वाली पीढ़ी के लिए आवश्यक है। आने वाली पीढ़ी अपनी परंपरा से ही अपने संस्कार और परंपराएं सीखती है।

सौराठ सभा में पारंपरिक पंजीकारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यहां जो रिश्ता तय होता है, उसे मान्यता पंजीकार ही देते हैं। पंजीकार के पास वर और कन्या पक्ष की वंशावली रहती है। वे दोनों तरफ की उतेढ़ (विवाह का रिकर्ड) का मिलान करते हैं। दोनों पक्षों के उतेढ़ देखने पर जब पुष्टि हो जाती है कि दोनों परिवारों के बीच सात पीढ़ियों में इससे पहले कोई वैवाहिक संबंध नहीं हुआ है, तब पंजीकार कहते हैं, ‘अधिकार होइए! यानी पहले से रक्त संबंध नहीं है, इसलिए रिश्ता पक्का करने में कोई हर्ज नहीं। सौराठ में शादियां तय करवाने वाले पंजीकार विश्वमोहन चंद्र मिश्र बताते हैं, “मैथिल ब्राह्मणों ने 700 साल पहले करीब सन् 1310 में यह प्रथा शुरू की थी, ताकि विवाह संबंध अच्छे कुलों के बीच तय हो सके। सन् 1971 में यहां करीब डेढ़ लाख लोग आए थे, उसके बाद आगंतुकों की संख्या काफी घट गई। इस वर्ष आगंतुकों की संख्या एक बार फिर बढ़ी है।” उन्होंने कहा कि पूरे विश्व में मैथिलों का यह वैवाहिक परंपरा सवरेत्तम माना जाता है, क्योंकि अधिकार निर्णय की अनूठी रीति को बाद में रक्त समूह भी देखे जाते हैं। उनका दावा है कि विभिन्न वैज्ञानिकों ने अपने-अपने ढंगों से भी इस पद्धति को सबसे सही करार दिया है। इस वर्ष ‘सौराठ सभा’ में मिथिला की प्राचीन शास्त्रार्थ परंपरा को पुनर्जीवित करते हुए मिथिलालोक फाउंडेशन द्वारा एक संगोष्ठी का आयोजन किया, जिसमें शास्त्रार्थ के तहत बौद्धिक विमर्श की शुरुआत की गई। इस विमर्श में मिथिला क्षेत्र के अनेक विद्वानों ने विभिन्न समसामयिक विषयों पर न केवल विचार-विमर्श किया, बल्कि इस परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प भी लिया। डॉ़ झा ने दावा किया कि अगले वर्ष इस सभा की सफलता के और कार्य किए जाएंगे। सौराठ सभा मिथिलांचल क्षेत्र के सौराठ गांव में प्रतिवर्ष लगने वाला एक विशाल सभा है, जिसमें योग्य वर का चयन वहां आए कन्याओं के पिता करते हैं। इस सभा में मैथिल समुदाय के लोग योग्य वर, वधुओं की तलाश में इकट्ठे होते हैं।

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