विशेष आलेख : सावन में धर्म, कर्म, विरह श्रृंगार सबकुछ

सावन का रंग अनोखा होता है। काली घटाओं के बीच फैली हरियाली जहां मन मोह लेती है वहीं आसमान से बरसती बूंदे तन को भी भिगो जाती है। सावन की बदरी और लोगों के बीच गूंज रही कजरी का अलग ही नजारा है। सावन में धर्म कर्म, विरह श्रृंगार सबकुछ है
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सावन मास पर ही भक्ति की रसधारा सबसे अधिक बहती है। चाहे वे सावन सोमवार हों या फिर रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, कजली तीज आदि व्रत-त्योहारों का यही मौसम है। यही वजह है कि हर किसी को सावन की रिमझिम फुहारों का बेसब्री से इन्तजार है। इसके साथ ही चारों तरफ उल्लास छा जाता है। जहां प्रकृति नित नये रंग बदलती है वहीं पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, धरा सभी की रंगत देखते ही बनती है। सावन के सुहाने मौसम में मन मयूर नाच उठता है। काले बादल जब धरती से मिलते हैं तो दिलों में प्रेम की चरम की अनुभूति होती है। अठखेलियां कर रही प्रकृति के साथ झूले के बिना तो सावन की कल्पना नहीं की जा सकती। इनसे ना जाने कितनी लोक-मान्यताएं और लोक-संस्कृति के रंग जुड़े हुए हैं। उन्हीं में से एक है- कजरी। कजरी वह विधा है, जिसे आज की आधुनिकता या यूं कहें फिल्मी गाने भी लेना तो दूर उसे छू तक नहीं सकी है। ग्रामीण अंचलों में अभी भी सावन की अनुपम छटा के बीच लोक रंगत की धारायें समवेत फूट पड़ती हैं। इसके बोल पर हर कोई झूम उठता है और गुनगुना उठता है- 


रिमझिम बरसेले बदरिया, 
गुईयां गावेले कजरिया 
मोर सवरिया भीजै न
वो ही धानियां की कियरिया
मोर सविरया भीजै न। 
बीरन भइया अइले अनवइया
सवनवा में ना जइबे ननदी।
पिया सड़िया लिया दा मिर्जापुरी पिया
रंग रहे कपूरी पिया ना
जबसे साड़ी ना लिअईबा
तबसे जेवना ना बनईबे
तोरे जेवना पे लगिहैं मजूरी पिया
रंग रहे कपूरी पिया ना। 

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जी हां, ‘लोकगीतों की रानी’ यानी शास्त्रीय व उपशास्त्रीय बंदिशों से रची कजरी सिर्फ गायन भर नहीं है, बल्कि यह सावन मौसम की सुन्दरता और उल्लास का उत्सवधर्मी पर्व है। जिसे उत्तर भारत ही नहीं सात समुन्दर पार विदेशों में भी बसे भारतीयों को अभी भी कजरी के बोल सुहाने लगते हैं। तभी तो कजरी अमेरिका, ब्रिटेन इत्यादि देशों में भी अपनी अनुगूंज छोड़ चुकी है। या यूं कहें लोग भले ही गांवों से नगरों की ओर प्रस्थान कर गये हों पर गांव के बगीचे में पेंग मारकर झूला झूलती महिलाएं, छेड़छाड़ के बीच रिश्तों की मधुर खनक अब भी लोगों के जेहन में है। कजरी के मूलतः तीन रूप हैं- बनारसी, मिर्जापुरी और गोरखपुरी कजरी। बनारसी कजरी अपने अक्खड़पन और बिन्दास बोलों की वजह से अलग पहचानी जाती है। इसके बोलों में अइले, गइले जैसे शब्दों का बखूबी उपयोग होता है, इसकी सबसे बड़ी पहचान ‘न’ की टेक होती है। विंध्य क्षेत्र में गायी जाने वाली मिर्जापुरी कजरी की अपनी अलग पहचान है। अपनी अनूठी सांस्कृतिक परम्पराओं के कारण मशहूर मिर्जापुरी कजरी को ही ज्यादातर मंचीय गायक गाना पसन्द करते हैं। इसमें सखी-सहेलियों, भाभी-ननद के आपसी रिश्तों की मिठास और छेड़छाड़ के साथ सावन की मस्ती का रंग घुला होता है। सावन में तो नयी ब्याही बेटियां अपने पीहर वापस आती हैं। बगीचों में भाभी और बचपन की सहेलियों संग कजरी धुनों में झूला झूलती है और रात में गांव की चैपालों में इसे उत्सव के रुप में मनाती हैं। इस कजरी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलती हैं और इसकी धुनों व पद्धति को नहीं बदला जाता। कजरी गीतों की ही तरह विंध्य क्षेत्र में कजरी अखाड़ों की भी अनूठी परम्परा रही है- 

कइसे खेलन जइबू
सावन मंे कजरिया
बदरिया घिर आईल ननदी
संग में सखी न सहेली
कईसे जइबू तू अकेली
गुंडा घेर लीहें तोहरी डगरिया।

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आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरू पूजन के बाद इन अखाड़ों से कजरी का विधिवत गायन आरम्भ होता है। स्वस्थ परम्परा के तहत इन कजरी अखाड़ों में प्रतिद्वन्दता भी होती है। कजरी लेखक गुरु अपनी कजरी को एक रजिस्टर पर नोट कर देता है, जिसे किसी भी हालत में न तो सार्वजनिक किया जाता है और न ही किसी को लिखित रूप में दिया जाता है। केवल अखाड़े का गायक ही इसे याद करके या पढ़कर गा सकता है। बनारसी और मिर्जापुरी कजरी से परे गोरखपुरी कजरी की अपनी अलग ही टेक है और यह ‘हरे रामा‘ और ‘ऐ हारी‘ के कारण अन्य कजरी से अलग पहचानी जाती है- 

हरे रामा, कृष्ण बने मनिहारी
पहिर के सारी, ऐ हारी। 

मिथिला में सावनी माह में हिंडोले पर बैठकर नर-नारी मल्हार के गीत गाते हैं। राजस्थान में तीज के अवसर पर गाये जाने वाले हिंडोले के गीत भी कजरी की ही कोटि में आते हैं। मथुरा में राधा-कृष्ण की रासलीला को माध्यम बनाकर नायिका अपनी सहेलियों के साथ ढोलक पर थाप दे-देकर अपने चितचोर को सुनाते हुए गा उठती है - 
कान्हा हंसि-हंसि बोली बोलड़

ऊ तो करइ ठिठोली ना 

सावन की अनुभूति के बीच भला किसका मन प्रिय मिलन हेतु न तड़पेगा, फिर वह चाहे चन्द्रमा ही क्यों न हो-

चन्दा छिपे चाहे बदरी मा
जब से लगा सवनवा ना।

विरह के बाद संयोग की अनुभूति से तड़प और बेकरारी भी बढ़ती जाती है। फिर यही तो समय होता है इतराने का, फरमाइशें पूरी करवाने का-

पिया मेंहदी लिआय दा मोतीझील से
जायके साइकील से ना। 

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इलाहाबाद और अवध अंचल तो कजरी सिर्फ गाई नहीं जाती बल्कि खेली भी जाती है। एक तरफ जहां मंच पर लोक गायक इसकी अद्भुत प्रस्तुति करते हैं वहीं दूसरी ओर इसकी सर्वाधिक विशिष्ट शैली ‘धुनमुनिया’ है, जिसमें महिलायें झुक कर एक दूसरे से जुड़ी हुयी अर्धवृत्त में नृत्य करती हैं। कजरी में सिर्फ संयोग श्रृंगार की ही नहीं, बल्कि वियोग की भी मार्मिक अभिव्यक्ति मिलती है। झमाझम पानी बरस रहा है। सहेलियां उल्लसित, आह्लादित होकर झूला झूलने में मशगूल हैं। इधर ठंडी हवाएं छेड़छाड़ करने पर उतारू हो चली हैं। काले-कलूटे बादलों की गुर्राहट और बिजली की चकाचैंध न जाने क्यों दिल में दहशत पैदा कर रही है। बावजूद इसके पिया-मिलन की आस में नयी नवेली दुल्हनें मटियामेट हो उठती है। आखिर परदेसी प्रियतम जो नहीं आए। 


आंखों से आंसू टपक रहे हैं - टप-टप।
करूं कौन जतन अरी ऐ री सखी
मोरे नयनों से बरसे बादरिया
उठी काली घटा, बादल गरजें
चली ठंडी पवन, मोरा जिया लरजे
थी पिया-मिलन की आस सखी
परदेश गए मोरे सांवरिया 

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मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ अंचलों में तो रक्षाबन्धन पर्व को ‘कजरी पूर्णिमा’ के तौर पर भी मनाया जाता है। मानसून की समाप्ति को दर्शाता यह पर्व श्रावण अमावस्या के नवें दिन से आरम्भ होता है, जिसे ‘कजरी नवमी’ के नाम से जाना जाता है। कजरी नवमी से लेकर कजरी पूर्णिमा तक चलने वाले इस उत्सव में नवमी के दिन महिलायें खेतों से मिट्टी सहित फसल के अंश लाकर घरों में रखती हैं एवं उसकी साथ सात दिनों तक माँ भगवती के साथ कजमल देवी की पूजा करती हैं। घर को खूब साफ-सुथरा कर रंगोली बनायी जाती है और पूर्णिमा की शाम को महिलायें समूह बनाकर पूजी जाने वाली फसल को लेकर नजदीक के तालाब या नदी पर जाती हैं और उस फसल के बर्तन से एक दूसरे पर पानी उलचाती हुई कजरी गाती हैं। इस उत्सवधर्मिता के माहौल में कजरी के गीत सातों दिन अनवरत् गाये जाते हैं। कजरी भले ही पावस गीत के रूप में गायी जाती हो पर लोक रंजन के साथ ही इसने लोक जीवन के विभिन्न पक्षों में सामाजिक चेतना की अलख जगाने का भी कार्य किया है। कजरी सिर्फ राग-विराग या श्रृंगार और विरह के लोक गीतों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें चर्चित समसामयिक विषयों की भी गूंज सुनायी देती है। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान कजरी ने लोक चेतना को बखूबी अभिव्यक्त किया - 

हरे रामा सुभाष चन्द्र ने फौज सजायी रे हारी 
कड़ा-छड़ा पैंजनिया छोड़बै, छोड़बै हाथ कंगनवा रामा
हरे रामा, हाथ में झण्डा लै के जुलूस निकलबैं रे हारी। 

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कहा जा सकता है सावन सुख, समृद्धि, सुन्दरता, प्रेम, उल्लास का ही नहीं बल्कि इन सब के बीच कजरी जीवन के अनुपम क्षणों को अपने में समेटे यूं ही रिश्तों को खनकाती रहेगी और झूले की पींगों के बीच छेड़-छाड़ व मनुहार यूं ही लुटाती रहेगी। अर्थात कजरी हमारी जनचेतना की परिचायक है। जब तक धरती पर हरियाली रहेगी कजरी जीवित रहेगी। अपनी वाच्य परम्परा से जन-जन तक पहुंचने वाले कजरी जैसे लोकगीतों के माध्यम से लोकजीवन में तेजी से मिटते मूल्यों को भी बचाया जा सकता है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। सावन में स्त्री-पुरुष को कौन कहे, मंदिर में भगवान को भी झूले में बिठाकार झुलाया जाता है। भक्तों की भीड़ इस ‘झूलन‘ को देखने के लिए उमड़ पड़ती है। वे झूले में झूलते भगवान के दर्शन कर उन्हें झूम-झूमकर मनभावनी कजरी सुनाते हैं।





(सुरेश गांधी)
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