विचार : जल से नहीं, श्रद्धा से करें भगवान शिव को प्रसन्न

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मशीनीकरण से प्रदूषण व तापमान बढ़ रहा है। जलवायू परिर्वतन के कारण वर्षा कम हो रही है जिससे नदियों में जल घटता जा रहा है। नदियों में पानी की कमी के कारण भूजल दोहन बढ़ा जिससे भूजल स्तर 200 से 400 फूट तक नीचे चला गया है। इसी कारण अनेक बार अति वर्षा विनाश का कारण भी बनती है। श्रावण मास और उसमें शिवरात्रि पर्व पर जल का विशेष महत्व है क्योंकि पूरे मास शिवजी का जलाभिषेक किया जाता है। इतिहास साक्षी है कि शिवालय नदी या तालाब के किनारे स्थित होते थे और भगवान शिव को अर्पित जल, नदी तालाब में चला जाता था जबकि अब वह जल, जिसे भक्तजन प्रसाद रुप में ग्रहण भी करते हैं, पूरे देश में कराड़ों लीटर पानी सीवर में चला जाता है। शिवरात्रि की अग्रिम शुभकामनाएं के साथ रमेश गोयल, राष्ट्रीय अध्यक्ष ‘पर्यावरण-प्रेरणा एवं ‘राष्ट्रीय मन्त्री पर्यावरण‘ 2015-16 भारत विकास परिषद् ने शिव भक्तों से अपील है कि पानी की कमी को ध्यान में रखते हुए श्रावण मास में प्रतिदिन और शिवरात्रि पर्व पर शिवलिंग पर बाल्टियां भर भर कर नहीं बल्कि केवल लोटा भर जल ही चढ़ाएं। अनेक कथाएं प्रचलित प्रचलित हैं कि महादेव मनोभाव व श्रद्धा से ही प्रसन्न होते हैं, जल की अधिक मात्रा से नहीं। कविता की इन पंक्तियों को ध्यान में रखकर पूजा करें कि ’’पूजा और पूजापा प्रभुवर इसी पूजारिन को समझें, दान दक्षिणा और न्यौछावर इसी भिखारिन को समझें’’। मन्दिरों के प्रबन्धकों को वाटर हारवैस्टिंग या रिचार्जर लगवाने चाहिएं ताकि भक्तों द्वारा शिवलिंग पर चढाया गया शुद्ध जल सीवर में ना बहकर सीधा जमीन में चला जाएगा जोे भूजल स्तर सुधारने में सहायक हो। उन्होंने शिव भक्तों से आग्रह किया है कि जल की बढ़ती कमी को ध्यान में रखते हुए चिन्तन करें और अन्यथा न लें व शिवालयों को जल संरक्षण सिस्टम के साथ जोड़ें।  

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