विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले में उमड़ा कांवरियों का सैलाब

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देवघर 25 जुलाई,  गंगाजल का संकल्प लेकर अपने पाप और दुखों के नाश की कामना लिये बिना रुके और थके सुल्तानगंज से देवघर तक की लंबी पदयात्रा के बाद भगवान शिव का जलाभिषेक करने के लिए बैद्यनाथधाम में कांवरियों का सैलाब उमड़ पड़ा है। कहते हैं सागर से मिलने का जो संकल्प गंगा का है वही दृढ़निश्चय भगवान शिव से मिलने का कांवरियों में भी देखा जाता है। तभी तो श्रावणी मेले के दौरान धूप-बारिश और भूख-प्यास भूलकर दुर्गम रास्तों पर दुख उठाकर अपने दुखों के नाश के लिए वे बाबा बैद्यनाथ की शरण में पहुंचते हैं। बोल बम का नारा है-बाबा एक सहारा है जैसे नारों और शिव गीतों से बिहार में भागलपुर जिले के सुल्तानगंज से लेकर झारखंड में देवघर जिला मुख्यालय में अवस्थित बाबा बैद्यनाथ धाम और बाबा बासुकीनाथ धाम तक लगभग 105 किलोमीटर का इलाका गूंजायमान हो रहा है। श्रावणी मेले के तीसरे सोमवार को बाबा बैद्यनाथ धाम में करीब एक लाख से अधिक और बासुकीनाथ धाम में 70 हजार से अधिक कांवरियों ने भगवान शंकर का जलाभिषेक किया। इस वर्ष 10 जुलाई से शुरू हुये विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले में पिछले 15 दिनों के दौरान बाबा बैद्यनाथ धाम में देश-विदेश से आनेवाले लगभग 20 लाख और बाबा बासुकीनाथ धाम में लगभग दस लाख से अधिक श्रद्धालु भोलेनाथ का जलाभिषेक कर चुके हैं। इन दोनों धामों में प्रतिदिन गेरुआ वस्त्रधारी कांवर यात्रियों का तांता लगा रहता है। बिहार में भागलपुर, मुंगेर, बांका और झारखंड में देवघर और दुमका जिले के नदियों, पहाड़ों और जंगलों से का पूरा इलाका गेरूआ वस्त्रधारी कांवर यात्रियों के रंग में रंग गया है। श्रावणी पूर्णिमा तक चलनेवाले विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले के समापन की तिथि जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही है वैसे-वैसे इस कांवर यात्रा में देश-विदेश से आनेवाले शिव भक्तों की संख्या बढ़ती जा रही है। 

इस बार दोनों शिवधामों में जलाभिषेक के लिए प्रतिदिन करीब एक लाख श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। बिहार और झारखंड सरकार के निर्देशन में पांच जिलों के प्रशासन द्वारा अपने-अपने इलाके से गुजरने वाले कांवर यात्रियों को सुविधा मुहैया कराने और इस लम्बी दूरी की पैदल यात्रा को सुगम बनाने के लिए सड़क, यातायात, स्वास्थ्य, 
रोशनी, आवासन एवं सुरक्षा के साथ कतारबद्ध पूजा-अर्चना की समुचित व्यवस्था की गयी है। मान्यता है कि सावन महीने में सुल्तानगंज के अजगैबीनाथ धाम में प्रवाहित उत्तरवाहिनी गंगा से कांवर में जल भर कर पैदल 105 किलोमीटर की दूरी तय कर देवघर में द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक प्रसिद्ध बाबा बैद्यानाथ धाम और यहां से करीब 42 किलोमीटर दूर दुमका जिले में अवस्थित बाबा बासुकीनाथ धाम में जलार्पण और पूजा-अर्चना करने से श्रद्धालु शिवभक्तों की सभी कामनायें पूर्ण होती हैं। इस कारण बैद्यनाथ धाम को दीवानी और बासुकीनाथ धाम को फौजदारी बाबा के नाम से जाना जाता है। बैद्यनाथ धाम की प्रसिद्धि रावणेश्वर धाम और हृदयपीठ रूप में भी है। मान्यताओं के अनुसार, एक समय राक्षसों के अभिमानी राजा एवं परम शिव भक्त रावण ने कैलाश पर्वत पर कठिन तपस्या कर तीनों लोक में विजय प्राप्त करने के लिए अपनी लंकानगरी में विराजमान होने के लिए औघड़दानी बाबा भोले शंकर को मना लिया। लंका जाने के लिए अनमने भाव से तैयार हुये भगवान शंकर ने रावण को वरदान देते समय यह शर्त्त रखी कि लिंग स्वरूप को तुम भक्तिपूर्वक अपने साथ ले जाओ लेकिन इसे धरती पर कहीं मत रखना। अन्यथा यह लिंग वहीं स्थापित हो जायेगा। रावण की इस सफलता से इन्द्र सहित देवतागण चिंतित हो गये और इसका उपाय निकालने में जुट गये। कहते हैं कि रावण लिंग स्वरूप बाबा भोलेनाथ को लंकानगरी में स्थापित करने के लिए जा रहा था कि रास्ते में पड़नेवाले झारखंड के वन प्रांतर में अवस्थित देवघर में शिव माया से उसे भारी लघुशंका की इच्छा हुई, जिसे वह सहन नहीं कर पा रहा था। रावण बैजू नाम के एक गोप को लिंग स्वरूप सौंप कर लघुशंका करने चला गया। बैजू लिंग स्वरूप के भार को सहन नहीं कर सका और उसे जमीन पर रख दिया जिससे देवघर में भगवान भोलेनाथ स्थापित हो गये। लघुशंका कर लौटे रावण ने देखा बाबा भोलनाथ जमीन पर विराजमान हो गये हैं तो वह परेशान हो गया और उन्हें जमीन से उठाने का बहुत प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हो सका। इससे गुस्से में आकर उसने लिंग स्वरूप भोलेनाथ को अंगूठे से जमीन में दबा दिया जिसके निशान आज भी बैद्यनाथ धाम स्थित द्वादश ज्योर्तिलिंग पर विराजमान है। उस लिंग में भगवान शिव को प्रत्यक्ष रूप में पाकर सभी देवताओं ने उसकी प्राण प्रतिष्ठा कर उसका नाम बैद्यनाथ धाम रखा। 
कहते है बाद में यही ज्योर्तिलिंग बैजनाथेश्वर और रावणेश्वर धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ जो श्रद्धालुओं की सभी कामनाओं की पूर्ति करनेवाला और दर्शन मात्र से सभी पापों को हरनेवाला माना जाता है। इस दिव्य ज्योर्तिलिंग के दर्शन से सभी पापों का नाश और मुक्ति की प्राप्ति होती है। बैद्यानाथ धाम की गणना उन पवित्र तीर्थ स्थलों में की जाती है जहां द्वादश ज्योर्तिलिंग के अलावा शक्ति पीठ भी स्थापित है। श्रद्धालुओं में मान्यता है कि राजा दक्ष द्वारा आयोजित महायज्ञ में अपमानित सती और विष्णु भगवान के सुदर्शन चक्र से खंडित सती का अंग सम्भवतः 51 स्थानों पर गिरा था। इन अंगों में सती का हृदय बैद्यनाथ धाम में गिरा था। इस कारण इस पवित्र धाम को चिताभूमि के साथ सिद्धपीठ और हृदयपीठ के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन काल में घने जंगलाें और पहाड़ों से घिरे इस वन प्रांतर के बीच अवस्थित बाबा बैद्यनाथ धाम और बासुकीनाथ धाम तांत्रिक और सिद्ध महात्माओं के लिए सिद्धिप्राप्ति का आकर्षक केन्द्र भी रहा है। मान्यता है कि राजा भगीरथ के कठिन तप से धरती पर अवतरित हुई गंगा के पवित्र जल को समस्त प्राणियों को पाप से मुक्ति देनेवाला माना जाता है। सदियों से धरती के समस्त प्राणियों को अपने पवित्र जल से गंगा जीवन प्रदान करती है। राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की मुक्ति के लिए गंगा धरती पर अवतरित होने को राजी हो गयी थी। भगवान शंकर ने गंगा के वेग को कम करने के लिए उन्हें अपनी जटाओं में समेट लिया था ताकि गंगा ऊपरी सतह को फोड़कर धरती में न समा जाये। शिव की जटा में गंगा को अपनी स्वतंत्रता में कमी प्रतीत होने लगी तो वह ब्रह्मा जी से बोलीं, “आप मुझे इस कष्ट से बचाइये। ब्रह्म्मा जी ने कहा, हे गंगा तुम अति सौभग्यशाली हो जिसे भगवान शंकर ने अपने शीश पर धारण कर रखा है। उनके इस कथन पर गंगा मैया बोलीं आपका कहना ठीक है लेकिन क्या यह स्वर्गलोक में निवास करने वाली गंगा का अपमान नहीं होगा। मेरे पवित्र जल का धरती के अच्छे और बुरे लोग उपयोग करेंगे और इससे मुझे ग्लानी होगी। इस पर ब्रह्मा जी ने गंगा को वरदान दिया कि तुम्हारे पवित्र जल से जितने अच्छे या बुरे लोग स्नान करेगे उससे कहीं अधिक लोग तुम्हारे पवित्र जल को भगवान शंकर के मस्तक पर अर्पित करेंगे।” कहते हैं कि ब्रहमा जी के इस वरदान के कारण गंगा का पवित्र जल शिव भक्त बैद्यनाथ धाम सहित विभिन्न शिवालयों में श्रद्धा पूर्वक अर्पित करते हैं। मान्यता है कि गंगा में स्नान करने और इस जल को बैद्यनाथ धाम द्वादश ज्योर्तिलिंग पर अर्पित करने से प्राणियां के सभी जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। इस कारण प्रतिवर्ष सावन माह में देश-विदेश के लाखों श्रद्धालु बैद्यनाथ धाम और बासुकीनाथ धाम में गंगा जल अर्पित करने पहुंचते है। 

मान्यता के अनुसार त्रेता युग से कांवर में गंगाजल भर पैदल यात्रा कर बैद्यनाथधाम में जल अर्पित करने की परम्परा शुरू हुई। जानकारों के अनुसार, त्रेता युग में भगवान राम का अवतार हुआ था। आनन्द रामायण के अनुसार, राज्याभिषेक के बाद भगवान श्रीराम अपनी पत्नी सीता और तीनों भाईयों के साथ सुल्तानगंज उत्तरवाहिनी गंगा का जल लेकर पूर्ण विधि-विधान के साथ बैद्यनाथधाम में भोलेनाथ का जलाभिषेक किया था। पुराणों में वर्णन है कि लंका के राक्षसों के लंकाधिपित राजा रावण ने भी हरिद्वार से गंगा जल लाकर भगवान शंकर पर अर्पित किया था। कहते हैं द्वापर और अब कलियुग में भी कांवर यात्रा कर जलार्पण करने की परम्परा कायम है। इस कांवर यात्रा में बोल बम का विशेष महत्व है। ब्रहमा, विष्ण और महेश के संक्षिप्त नाम से बम शब्द बना है। यात्रा के क्रम में पंचाक्षरी मंत्र ओम नमः शिवाय की तरह दो अक्षरों का बम एक महामंत्र है। कांवर यात्री सुल्तानगंज में उत्तरवाहिनी गंगा में स्नान-ध्यान करने के बाद कांवर में जल भर कर अपनी 105 किलोमीटर लम्बी पैदल यात्रा प्रारम्भ करते हैं। दुर्गम मार्गों पर चल कर लाखों पैदल यात्री तीन-चार दिन में और डाक बम बिना रुके 24 घंटे के भीतर अपनी यात्रा पूरी करते हैं। देवघर में जलार्पण के बाद अधिकांश तीर्थ यात्री वाहनों से करीब 42 किलोमीटर की दूरी तय कर प्रसिद्ध बाबा बासुकीनाथ धाम आते है और जलाभिषेक करते है। मान्यता है कि इस धाम में पूजा-अर्चना करने से शिव भक्तों की मनोकामना शीघ्र पूर्ण होती है। मान्यताओं के मुताबिक कभी दक्षिण निषेध नामक देश में रमणीक मनोहारी दारूक वन में बाबा बासुकीनाथ धाम अवस्थित है, जहां कभी राक्षसों ने मनोहारी नगर बसाया था। इस दारूक वन क्षेत्र और जल मार्ग से गुजरनेवाले लोगों को राक्षस कैद कर लिया करता था। इसमें शिव भक्त सुप्रिय भी शामिल था। सुप्रिय ने राक्षसों के अत्याचार से मुक्ति के लिए भोलेनाथ की अराधना की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर और पार्वती प्रकट हुए और सुप्रिय को राक्षसों का नाश करने के लिए पशुपातस्त्र दिया, जिससे सुप्रिय ने राक्षसों का नाश किया। सुप्रिय बाबा भोलेनाथ और पार्वती से सर्वजन हिताय यहां निवास करने की मनोकामना लेकर आराधना में लीन हो गये। भोलनाथ ने सुप्रिय को इसी क्षेत्र में पार्वती के साथ निवास करने का वरदान दिया। बाद में इस दारूक वन में कंदमूल की तलाश में मनुष्य आकर बसने लेगे। इसमें बासु नामक एक सदाचारी भी आया था। कंदमूल की तलाश के लिए जमीन खोदने के क्रम में वहां खून बहने लगा। यह देख बासु व्याकुल हो कर घर चला गया। उसी समय आकाशवाणी हुई, “हे बासु! मैं बाबा बासुकीनाथ हूं। चिंता छोड़ तुम मेरी पूजा-अर्चना करो। आज से लोग बासु नाम से यहां मेरी पूजा करेंगे।” बासु ने जमीन से प्रकट भोले शंकर की पूजा अर्चना की और सुख-समृद्धि से सम्पन्न हुआ। इस कारण बाबा बासुकीनाथ ज्योर्तिलिंग का प्रादुर्भाव हुआ। 

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