दुमका : संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसी दास व उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की मनायी गई जयन्ती


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दुमका (अमरेन्द्र सुमन) विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ रामचरित मानस के रचयेता संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसी दास व उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयन्ती पूरे धूमधाम से मनायी गईं। शिवपहाड़ स्थित वरीय नागरिक संघ भवन में 30 जुलाई को आहुत कार्यक्रम में उपरोक्त विद्वतजनों की जयंती के अवसर पर दुमका के साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों, काॅलेज शिक्षकों व अन्य ने संस्कार भारती के संयुक्त तत्वावधान में पुष्पांजलि सह विचार गोष्ठी का आयोजन कर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उनके स्मरण व प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला गयां। तुलसी दास रचित भजन की प्रस्तुति कर गौरकांत झा, कुबेर झा व कश्यप नंदन ने इस अवसर पर   कार्यक्रम में समां बांध दिया। गोस्वामी तुलसी दास की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए शिक्षक सुधांशु शेखर, अरुण सिन्हा, सी एन मिश्रा, कमलाकांत प्रसाद सिन्हा, सेवानिवृत्त शिक्षक एन के झा, राजीव नयन तिवारी, ई0 के0 एन0 सिंह, सहजानन्द राय, व डा0 रामवरण चैधरी ने विश्व के मानचित्र पर गोस्वामी तुलसी दास रचित रामचरित मानस को कालजेय कृति बतलाया। अपने-अपने विचार प्रकट करते हुए वक्ताओं ने कहा कि भगवान श्रीराम के चरित्र व पूरे अयोध्या प्रकरण पर जिस तरह तुलसी दास ने एक-एक शब्दों के माध्यम से पूरे ग्रंथ को अविस्मरणीय बना दिया युगांे-युगांे तक उसकी भरपाई असंभव है। तुलसी दास के साहित्य व उसके बाद के समाज पर उनके दर्शन का प्रभाव पर विस्तार से चर्चा की गई। तुलसी दास की प्रासंगिकता विषय पर आयोजित कार्यक्रम के प्रारंभ में विद्यापति झा ने कार्यक्रम के उद्देस्यो पर प्रकाश डाला। बाद में झारखंड कला केंद्र के कला दल द्वारा तुलसीदास के भजन गाए गए। कार्यक्रम में मंच संचालन की जिम्मेवारी अमरेंद्र सुमन ने बखूबी निभाईं। व्याख्याता  खिरोधर प्रसाद यादव, शैलेन्द्र सिन्हा, कृष्ण नंदन सिंह, सहजानंद राय, मनोज घोष, अंजनी शरण, बाल कृष्ण ठाकुर, राहुल रंजन, अशोक सिंह, एवं अन्य गणमान्य उपस्थित थे। दुमका के साहित्यकार बन्धुओं सहित बुद्धिजीवियों व कला दल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तुलसी जयंती व प्रेमचंद जयंती के आयोजन को सफल बनाने में़े अंजनी शरण व कश्यप नंदन ने महती भूमिका निभाई। हिन्दी साहित्य में कालजयी भूमिका व रचनाधर्मिता के लिये कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर उन्हें भी पूरे श्रद्धाभाव से याद किया गया। उनकी अमर कृतियों को सार्वकालिक बताते हुए वक्ताओं ने हिन्दी साहित्य में उसे मील का पत्थर कहा। 

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