कारपेट इंडस्ट्री के जॉब वर्क पर जीएसटी घटने से कारोबारियों की बल्ले-बल्ले

  • जीएसटी 18 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी किया गया 

carpet-indutries-announcement-gst
वाराणसी (सुरेश गांधी )। जुलाई से जीएसटी लागू होने के बाद से सूरत से लेकर भदोही तक कपड़ा एवं कालीन व्यापारियों में हड़कंप मचा था। इस क्षेत्र में 18 फीसदी जीएसटी लगाये जाने के विरोध में कारोबारी हड़ताल पर थे। लेकिन अब वित्त मंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया है कि अब उन्हें जाॅब वर्क पर सिर्फ पांच फीसदी ही जीएसटी देना होगा। इससे कारोबारियों ने न सिर्फ राहत बताया है बल्कि जेटली का स्वागत भी किया है। सीइपीसी के चेयरमैन महाबीर प्रसाद उर्फ राजा शर्मा ने कहा कि सरकार ने कारपेट इंडस्ट्री को बड़ी राहत दी है। जॉब वर्क पर लगने वाले जीएसटी में बड़ी कमी कर दी गई है। उद्योग से जुड़े सभी जॉब वर्क पर जीएसटी 18 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दिया गया है। सीईपीसी के सीनियर मेम्बर उमेश गुप्ता, पियुश बरनवाल ने भी इसकी सराहना करते हुए कहा है कि सरकार ने उद्योग को बड़ी राहत दी है। 


गौरतलब है कि पिछले 19 जुलाई को कारपेट इंडस्ट्री पर सरकार द्वारा 18 प्रतिशत जीएसटी लगाए जाने के विरोध में बड़ी संख्या में कालीन निर्यातकों, बुनकरों व वूल कारोबारियों ने सड़क पर जुलूस निकालकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम संबोधित मांग पत्र अपर पुलिस अधीक्षक व एसडीएम को सौंपा था। कहा गया था कि जीएसटी कालीन उद्योग के लिए काला कानून है। इस काले कानून से न सिर्फ कालीन उद्योग तबाह हो जायेगा, बल्कि लाखों गरीब बुनकरों की दो वक्त का निवाला छिन जायेगा। करोड़ों रुपये की विदेशी मुद्रा भारत सरकार की झोली में नहीं आ पायेगा। सीईपीसी के चेयरमैन महावीर प्रसाद उर्फ राजा शर्मा ने कहा था कि कालीन उद्योग कृषि उद्योग की श्रेणी में आता है। अभी तक सरकार द्वारा इस पर उत्पाद शुल्क, सेवा कर, व्यापार कर नहीं लिया जाता था। किंतु केंद्र सरकार द्वारा जीएसटी के तहत कालीन की बिक्री पर 12 व निर्माण कार्यों पर 18 फीसदी कर लगा दिया गया है, जो न्यायोचित नहीं है। इसके चलते उद्योग बंदी के कगार पर पहुंच जाएगा। सीइपीसी के सीनियर प्रशासनिक सदस्य उमेश गुप्ता ने कहा कि कालीन उद्योग भदोही, मिर्जापुर समेत पूरे पूर्वांचल व दिल्ली, मुंबई, जयपुर, जम्मू कश्मीर आदि क्षेत्रों में फैला है। इस उद्योग में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रुप से तकरीबन बीस लाख से भी अधिक लोग जुडे है। यह उद्योग पांच हजार करोड़ से भी अधिक विदेशी मुद्रा भारत सरकार को अर्जित कराती है। बावजूद इसके सरकार की उपेक्षात्मक रवैये के चलते अन्य उद्योगों के मुकाबले कालीन उद्योग पिछड़ता चला जा रहा है। वैश्विक मंदी के चलते यह उद्योग कुछ ज्यादा ही प्रभावित है। ऐसे में अगर इस उद्योग को जीएसटी के दायरे में लाया जायेगा तो तबाही आ जायेगी। सरकार से मांग है कि कारपेट इंडस्ट्री से जीएसटी को अलग रखा जायें। 

Share on Google Plus

About आर्यावर्त डेस्क

एक टिप्पणी भेजें
loading...