डोकलाम गतिरोध:भारत-चीन के आर्थिक संबंधों का नया आयाम

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नयी दिल्ली 20 अगस्त, भारत और चीन के बीच डोकलाम को लेकर पिछले दो माह से जारी तनातनी दोनों देशों के संदेह भरे संबंधों का एक पहलू भर है। दोनों देशों के बीच 1962 के बाद कोई प्रत्यक्ष युद्ध नहीं हुआ है लेकिन आर्थिक मोर्चे पर शह और मात का खेल चलता रहता है। डोकलाम गतिरोध दोनों देशों की व्यापारिक तथा आर्थिक संबंधों के लिए चिंता का सबब बना हुआ है। चीन ने हाल के दशक में दक्षिण एशिया में अपनी पहुंच बढाने के लिए व्यापार, वित्तीय मदद, निवेश और राजनयिक संबंधों का सहारा लिया है। चीन के दक्षिण एशिया में बढ़ते कदम भारत के लिए राजनीतिक रूप और आर्थिक रूप दोनों तरह से घातक हैं। भारत नेपाल, श्रीलंका, भूटान और बंगलादेश के साथ अच्छे व्यापारिक संबंध रखता है अौर इसी वजह से वह अब तक इन देशों के लिए सबसे अच्छा व्यापारिक साझेदार रहा। लेकिन चीन पिछले कुछ दशक के दौरान दक्षिण एशियाई देशों के लिए सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है। वह 2005 में भारत काे पछाड़ते हुए बंगलादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया और उसे सस्ते सूती तथा अन्य कपड़े निर्यात करने लगा। हालांकि नेपाल और श्रीलंका में चीन अभी भारत से पीछे है लेकिन वह व्यापार का यह अंतर बड़ी तेजी से पाट रहा है। भारत श्रीलंका का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है लेकिन 2005 से वहां चीन का निर्यात कई गुणा बढ़कर चार अरब डॉलर का हो गया है। चीन ने इसके अलावा पाकिस्तान में भी चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के विकास के लिए 46 अरब डॉलर के निवेश की योजना बनायी है। जो चीन के महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड (ओबीओअार) कार्यक्रम का अहम हिस्सा है। लेकिन चीन के भरसक प्रयास के बावजूद भारत ने ओबीओआर कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर दिया है। भारत सीपीईसी को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मानता है और उसने ओबीओआर कार्यक्रम का इसीलिये बहिष्कार किया है जिससे चीन के मन में अपने इस कार्यक्रम की सफलता को लेकर संदेह पैदा हो गया है। अफगानिस्तान में भारत और चीन दोनों का व्यापार एक अरब डॉलर से कम है और दोनों देश वहां अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं। भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह के रास्ते तो चीन पाकिस्तान के रास्ते गुजरने वाले आर्थिक गलियारे के रास्ते अफगानिस्तान में अपनी आर्थिक पकड़ मजबूत बनाना चाहते हैं।

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