रसगुल्ला बनेगा फिल्म स्क्रीनप्ले का हिस्सा

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कोलकाता 04 अगस्त, कोलकाता की गलियों और पुरी के मंदिरों से लेकर ग्लोबल फूड के नक्शे पर भारत को एक पहचान देने वाला मिठास का पर्याय रसगुल्ला अब सिनेमाघरों की सिलवर स्क्रीन पर भी फिल्म की कहानी का हिस्सा बनकर दर्शकों के सामने आयेगा। विन्डो और शिवप्रसाद-नंदिता के बैनर तले बनने जा रही फीचर फिल्म ‘ कोलकाता ऑफ 1960 ’ उन्नीसवीं शताब्दी के कोलकाता की पृष्ठभमि पर आधारित होगी तथा रसगुल्ले की खोज के इर्द गिर्द घूमती नजर आयेगी। फिल्म के निर्माता शिवप्रसाद मुखोपाध्याय हैं और इसका निर्देशन पावेल करेंगें। शिवप्रसाद के मुताबिक किशोरवय की प्रेम कहानी पर केंद्रित यह फिल्म रसगुल्ला की खोज के इर्द-गिर्द घूमती नजर आयेगी। जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रथम वर्ष के छात्र उज्जन गांगुली फिल्म में ‘रसगुल्ला केे कोलंबस’ के नाम से लोकप्रिय नवीन दास की भूमिका में नजर आयेंगे। बाबर नाम गांधी के जरिए खासी लोकप्रियता बटोरने वाले पावेल ने कहा कि रसगुल्ले की वास्तविक कहानी के संदर्भ में उन्होंने दो वर्ष तक शोध किया तथा प्रख्यात लेखक बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यासों ‘हुतुमपचार नोकशा’ और ‘अलालेर घोरेर दुलाल’ सहित 19वीं शताब्दी के बंगला साहित्य का भी अध्ययन किया है। पावेल ने कहा , “ फिल्म की केंद्रीय भूमिका के लिए कई नवोदित कलाकार मेरे पास आये। मैं सोचता था कि इन्हें कैसे नवीन चंद्र दास के रूप में बदल पाऊंगा। मैंने जब उज्जन को देखा , तब यकीन हो गया कि यही मेरा नवीन है। ”उन्होंने बताया कि फिल्म की शूर्टिग का कार्यक्रम उज्जन की परीक्षा समाप्त होने के बाद निर्धारित किया जायेगा। नवीन चंद्र दास को रसगुल्ला का पितामह बताया जाता है। वह रसगुल्ला के काेलंबस के नाम से भी लोकप्रिय हैं। माना जाता है कि छेने से बने रसगुल्ले को सबसे पहले उन्होंने ही तैयार किया था। बाद में उनके पुत्र के सी दास ने डिब्बाबंद रसगुल्ले की उपलब्धता को विस्तार देने का काम शुरु किया और धीरे-धीरे यह समूचे भारत के साथ पड़ोसी देशों पाकिस्तान और बंगलादेश में भी मिठाई के रूप में लोकप्रिय हो गया। उसने ब्रिटेन और अमेरिका के स्टोर्स और किचन में इसने अपनी जगह बना ली। रसगुल्ले की खोज को लेकर इस फिल्म में क्या दर्शाया जाता है यह उसके रिलीज होने के बाद ही पता लग पायेगा लेकिन रसगुल्ले की उत्पति को लेकर पश्चिम बंगाल और ओडीशा के बीच विवाद है। ओडिशा के लोगों का दावा है कि इसकी शुरुआत उनके राज्य से हुई है और वे अपने पक्ष में तर्क देते हैं कि यहां स्थित विश्वप्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ के मंदिर में रसगुल्ले का भोग चढ़ाया जाता है और ओडिशा से ही इसका शेष जगहों पर प्रसार हुआ है।

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