विशेष : बाढ के दौरान पशुओं का विशेष ध्यान रखना जरुरी

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नयी दिल्ली 20 अगस्त, पशु वैज्ञानिकों का कहना हैं कि बाढ़ के दौरान किसानों को आर्थिक नुकसान से बचने के लिए पशुओं की देखभाल पर विशेष ध्यान देना चाहिये और उन्हें फफूंद संक्रमित चारे और दूषित पानी पिलाने से बचने के अलावा दुधारू मवेशियों का दूध प्रति दिन निकालना चाहिये ताकि थनैला जैसी बीमारियों से बचा जा सके । बाढ प्रभावित क्षेत्रों में इन दिनों आमतौर पर आर्द्रता काफी अधिक हो जाती है जिसके कारण चारे में फफूंद का संक्रमण हो जाता है। इसे खिलाने से पशुओं में कई प्रकार की बीमारी हो सकती है । पहले से भंडारित भूसा , कटे सूखे चारे और ‘हे’(पौष्टिक चारा) आदि भी उच्च आद्रर्ता के कारण फफूंद संक्रमित हो सकते हैं । चारे को खिलाने के पहले इसकी जांच करा लेनी चाहिये । राष्ट्रीय पशु पोषण एवं शरीर क्रिया विज्ञान संस्थान बेंगलूरू के वैज्ञानिकों के अनुसार बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के पशुओं को पहले से भंडारित उपयुक्त सूखा चारा खिलाना चहिये । ऐसे क्षेत्रों में चारे वाले वृक्ष के पत्ते को पशुओं को खिलाने में उपयोग में लाना चाहिये । चारागाहों के पानी से ढूबे होने के कारण घास सड़ -गल और संक्रमित हो जाती है। इसलिए बाढ़ के बाद पशुओं काे चरने के लिए नहीं भेजना चाहिये । वैज्ञानिकों के अनुसार बाढ प्रभावित क्षेत्रों में कम दूध देने वाले पशुओं को छह से सात किलो चारा , अधिक दूध देने वाले पशुओं को नौ से दस किलो चारा तथा बैल को पांच -छह किलो चारा देना चाहिये । बछड़े और बछिया को दो -तीन किलो तथा भेड़ और बकरी को एक से दो किलो चारा देना चाहिये । 


पशुओं के रहने के स्थान पर पानी भरे होने की स्थिति में उसके खुर में लगन , लंगड़ापन ,श्वसन रोग तथा मांसपेशियों में तनाव की संभावना बनी रहती है । ऐसी स्थिति में उसका तुरंत उपचार कराया जाना चाहिये । विशेषज्ञों की सलाह है कि पशुओं को हर हालत में सूखे स्थान पर रखने का प्रबंध करना चाहिये । पशु विशेषज्ञों का मानना है कि बाढ के दौरान सबसे अधिक पानी प्रदूषित हो जाता है जिसे पिलाने से कई प्रकार की बीमारियों की संभावना बढ जाती है । ऐसी स्थिति में दूषित पानी काे कैल्शियम कार्बोनेट से शुद्ध करके पशुओं को पिलाना चाहिये । दुधारु पशुओं का दूध प्रति दिन निकालना चाहिये अन्यथा इसमें थनैला रोग होने की संभावना काफी बढ जाती है । विशेषज्ञों की राय है कि बाढ के बाद ज्यादातर पशु आहार दूषित हो जाता है जो उसे खिलाने लायक नहीं रहता है । ऐसे में बाढ़ से सुरक्षित आसपास के स्थानों से भूसे या सूखे चारे को मंगाना चाहिये । आजकल मशीन के माध्यम से चारे का ठोस पिंड बनाया जाता है जिससे उसका फैलाव काफी कम हो जाता है जिससे परिवहन खर्च में काफी कमी आती है । संस्थान का मानना है कि बाढ संभावित क्षेत्रों में पहले से ही पशु चिकित्सकों , पशु पोषण विशेषज्ञों , लोक स्वास्थ्य विशेषज्ञों , स्वैच्छिक कार्यकताओं और गैर सरकारी संगठनों की एक टीम बनानी चाहिये जो किसानों में जागरुकता के साथ ही संकट की स्थिति में आवश्यक प्रबंध कर सके ।
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