विशेष आलेख : मर्जी का रिश्ता मित्रता !!

किस हद तक जाना है ये कौन जानता है,
    किस मंजिल को पाना है ये कौन जानता है,
    दोस्ती के दो पल जी भर के जी लो,
    किस रोज बिछड जाना है ये कौन जानता है.!
हर रिश्तों से पवित्र दोस्ती का रिश्ता 

ज्यादातर रिश्ते तो हमें जन्म से ही मिलते हैं। कहते हैं कि हमारे जीवन में आने वाला हर रिश्ता भी भगवान पहले से तय करके रखता है। सिर्फ दोस्ती का ही एक रिश्ता ऐसा होता है, जिसे हम अपनी मर्जी से चुनते हैं। ये वो रिश्ता है जो कभी हंसाता है, तो कभी रुलाता है, तो कभी जीने का सलीखा सिखाता है। कच्चे धागे में अनमोल मोती सा... चाहे मीलों दूर ही सही, पर आंखों की ज्योति सा... कभी सच्चा सा, कभी झूठा सा... कभी हमें मनाता... मिन्नतें कर के, कभी हमसे ही रूठा सा... मुश्किलों में जो छोड़ते नहीं, करता मैं गर गलत, समझाते हैं सही... मिल जाए वो मुझे, कट जाए यह सफर, जी जाऊं जिंदगी, ना कोई हो फिकर.. ऐसे हैं मेरे यार। 

friendship
वैसे तो दोस्ती का कोई दिन नहीं होता क्योंकि ये तो ऐसी खुशी है जो हर दिन हर पल सेलिब्रेट होती है। लेकिन दुनिया है न ..हर दिन को किसी रंग या किसी रूप में रिश्तों से जोड़ देती है इसलिए उसने ‘फ्रेंडशिप डे‘ को भी बना दिया। एक ऐसा दिन, जिस दिन हम अपने सबसे अच्छे दोस्त को याद करते हैं और उसे अहसास दिलाने की कोशिश करते हैं कि उसकी हमारी जिंदगी में क्या अहमियत है। दोस्ती में बिना शब्दों के अभिव्यक्तियों से ही बहुत कुछ कहा जाता हैं। कर्ज दोस्‍ती का अदा कौन करेगा, जब हम ही न रहे तो दोस्‍ती कौन करेगा। ऐ खुदा मेरे दोस्‍त को सलामत रखना, वरना मेरे जीने की दुआ कौन करेगा। जी हां दोस्ती की भावना कुछ ऐसी ही होती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि जिन्दगी एक बार ही मिलती है और दोस्ती उसे बेहतरीन बनाती है। कहते है दोस्ती जीवन का सबसे खास रिश्ता होता है। बिल्कुल निःस्वार्थ, एक-दुसरे के लिए हर मुसीबत और सुख-दुख में साथ रहते हैं। कुछ तो हर मुश्किल घड़ी में साथ रहते हैं। वो हमारी हिम्मत भी बढ़ाता है और हौसला भी देता है, ताकि मुश्किल से लड़कर दोबारा खड़े हो सकें। खुशी में हम अपनी काबिलियत का दंभ भरते हैं और नाकामी, उसके सिर डाल देते हैं। लेकिन वो कभी बुरा नहीं मानता...। 

मतलब साफ है यह एक ऐसा रिश्ता है, जिसे समझा कम और महसूस ज्‍यादा किया जा सकता है। अर्थात दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जिसे हम बनाते हैं। दोस्त से हम अपने दिल की सारी बातें कह सकते है। प्रेम, विश्वास और आपसी समझदारी के इस रिश्ते को ही दोस्ती कहते हैं। दोस्ती का रिश्ता जात-पांत, लिंग भेद तथा देशकाल की सीमाओं को नहीं जानता। कहा जा सकता है दोस्ती, एक सलोना और सुहाना अहसास है, जो संसार के हर रिश्ते से अलग है। दोस्त वह विश्वसनीय शख्स होता है जिसके समक्ष आप अपने मन की अंतिम परत भी कुरेद कर रख देते हैं। अलग-अलग रंगों से सजी दोस्ती कदम-कदम पर अपना रूप दिखाती है। कई दोस्त दोस्ती की गरिमा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर देते हैं। दोस्ती कहने को तो सिर्फ एक शब्द है, लेकिन इस एक शब्द के कई रंग, कई रूप मौजूद हैं। मौज, मस्ती, हंसी, मजाक, आजादी, अपनापन, दुख, आंसू, सहारा और भी न जाने क्या-क्या। दोस्ती का हर रंग, हर रूप एक मखमली एहसास से भर देता है। यह दिल को एक अनकहा सुकून देने वाला होता है। तमाम मौजूदा रिश्तों के जंजाल में यह मीठा रिश्ता एक ऐसा सत्य है जिसके लिए शब्द नहीं है। भारत में तो प्राचीन सभ्यता से ही दोस्ती की कई मिसालें देखने को मिलती हैं। राम जी ने दोस्ती के वास्ते ही सुग्रीव की मदद की थी, भगवान कृष्ण और सुदामा की दोस्ती की मिसाल तो जमाना आदि काल से देता आ रहा है। 


friendship
कृष्‍ण-सुदामा
दोस्ती कोई दीवार नहीं जानती, कोई अंतर नहीं समझती। कृष्‍ण-सुदामा की मित्रता भी हमें यही सीख देती हैं। बचपन के साथ जब कई साल मिलते हैं, तो कृष्‍ण द्वारका के राजा बन चुके होते हैं और सुदामा निर्धन। लेकिन इसके बावजूद कृष्‍ण, सुदामा से ऐसे मिलते हैं, जैसे उनकी मित्रता के बिना भगवान स्वयं कुछ नहीं। 

राम-हनुमान
भक्त और भगवान के बीच प्रेम कह लीजिए या मित्रता, रामचरितमानस में भगवान राम और उनके भक्त हनुमान के बीच ऐसा रिश्ता दिखा, जो अभूतपूर्व है। श्रीराम की सेवा हो, लक्ष्मण को बचाने की जुगत या माता सीता से मिलने को समंदर लांघना, हनुमान ने श्रीराम के लिए सब कुछ किया। और सीना चीरकर दिखाया भी कि उनके हृदय में भी भगवान ही बसे हैं। 

कर्ण-दुर्योधन 
महाभारत का जिक्र होता है, तो हमारा ध्यान कौरव-पांडवों के बीच कुरुक्षेत्र में लड़े गए युद्ध पर जाता है, लेकिन इसमें कर्ण और दुर्योधन की दोस्ती भी रेखांकित की जा सकती है। ऐसा कहा जाता है कि अपने भाइयों की मृत्यु पर एक आंसू ना गिराने वाला दुर्योंधन, कर्ण के चले जाने से फूट-फूटकर रोया था। कर्ण ने मित्रता निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 

पिता और पुत्र 
यूं तो हम में से ज्‍यादातर बचपन में मां की तुलना में पिता से कुछ डरते भी हैं और झिझकते भी हैं। लेकिन उम्र और समझ बढ़ने पर अहसास होता है कि पिता से बढ़िया और परिपक्व कोई दोस्त नहीं होता। हम उनसे अपने मन की हर बात कह सकते हैं और वो उन्हें समझते भी हैं, क्योंकि यही चीजें वो पहले खुद अनुभव कर चुके हैं। 

मां और बेटी 
कुछ इसी तरह का तालमेल मां और बेटी के बीच भी देखने को मिलता है। हम ऐसा नहीं कर रहे कि मां और बेटे के बीच प्रेम कम होता है, लेकिन मां-बेटी के बीच परस्पर सहयोग का जो स्तर देखने को मिलता है, वो लाजवाब है। अक्सर देखने को मिलता है कि कई बार बेटे माता-पिता का इतना ख्‍याल नहीं रख पाते, जितना बेटियां रखी पाती हैं। 

जय-वीरू
ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे...बीते करीब 40 साल से यह गाना दोस्ती को समझने-समझाने का जरिया बना हुआ है। सिक्का उछालकर अच्छाई की तरफ कोई फैसला करना हो या अपनी जान दांव पर लगाकर दोस्त को बचाना, जय और वीरू अपराधी होने के बावजूद हमें दोस्ती करनी और निभानी, दोनों सिखा गए। 

टॉम एंड जेरी 
हम सभी ने बचपन में यूं तो कई ऐसे कार्टून देखें होंगे, जिनमें दोस्ती भी होगी और रिश्ते भी। लेकिन टॉम और जेरी का ऐसा बेहतरीन रिश्ता दूसरा नहीं मिलता, जो दिन भर लड़ते रहें, लेकिन साझा मुसीबत सामने आने पर साथ हो जाएं। साथ रहें, तो लड़ें और अलग रहें, तो बोर हो जाएं। असलियत में क्या दोस्ती और दोस्त कुछ इसी तरह नहीं होते? हम सभी में टॉम और जेरी जो छिपा है। 

हम और ईश्वर
भगवान, खुदा, यीशू...कोई नाम दे लीजिए, ऊपरवाला एक ही है। हम जब मुसीबत में होते हैं, अक्सर इसी दोस्त के पास जाते हैं। वो हमारी हिम्मत भी बढ़ाता है और हौसला भी देता है, ताकि मुश्किल से लड़कर दोबारा खड़े हो सकें। खुशी में हम अपनी काबिलियत का दंभ भरते हैं और नाकामी, उसके सिर डाल देते हैं। लेकिन वो कभी बुरा नहीं मानता। 

मोदी-शाह
पीएम नरेन्द्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की ऐसी दोस्ती है जो देश और देश की राजनीति को एक नई शक्ल प्रदान की है। मोदी के भरोसे और अमित शाह के विश्वास ने आज देश की संसद को भगवा रंग में रंग दिया है। मोदी-शाह तेरी जीत ..मेरी जीत.. तेरी हार.. मेरी हारकृहर सबकुछ एक-दुसरे के पूरक हो गए है। जबकि यह सच है कि पीएम मोदी बहुत कम लोगों पर भरोसा करते हैं और बहुत कम लोग ही उनके निकट हैं, लेकिन उन कम लोगों में सबसे ऊपर नाम अमित शाह का है जो उनके हमराज और राजनीति के हमसफर बन चुके हैं। मोदी और अमित शाह की दोस्ती केवल 32 साल पुरानी है। इन 32 सालों में मोदी और अमित शाह ने देश की राजनीति को बेहद करीब से देखा है। अगर शाह के साथ मोदी ने गुजरात में हैट्रिक पूरी की है तो वहीं साल 2002 के दंगो का गम और दंश भी झेला है। तो वहीं अमित शाह जब जेल में थे तो उनके परिवार को भी संभालने का काम मोदी ने ही किया है। यह आपस में दोनों की समझदारी और प्यार ही है जो मोदी ने सभी लोगों को दरकिनार करते हुए साल 2014 के आम चुनावों में यूपी का चुनाव प्रभारी अमित शाह को बनाया और अमित शाह ने मोदी को पार्टी की जीत का तोहफा दिया। कुल मिलाकर शाह और मोदी की जोड़ी रमेश सिप्पी की फिल्म ‘शोले‘ के जय-वीरू से कम नहीं हैं। 


दोस्त के बिना जिंदगी अधूरी
एक पुरानी अंग्रेजी कहावत है, ‘अगर जिंदगी के अंत में आपके पास पांच दोस्त हैं, तो यकीन जानिए आपने एक शानदार जिंदगी जी है।’ यानी इनसान की दोस्ती ही तय करती है उसके जीवन की गहरायी। दोस्त तो आईने की तरह होता है, जिसके सामने आप सब कुछ कह सकते हैं, बेबाक, बेलाग लपेट। बिना सोचे समझे। दोस्त आपके शब्द नहीं, आपकी ‘भावनाओं’ को समझते हैं। खासकर इंटरनेट की दुनिया में तो दोस्ती में और प्रगाढ़ता दिखती है। यूं लगता है जैसे हर रिश्ता बस यहीं से होकर गुजरता है। ‘वॉट्स अप’ और ‘वी चैट्स’ जैसी मोबाइल वो एप्लिकेशन हैं, जो स्मार्टफोन के जरिए दोस्तों को एक धागे में पिरो कर रख दी हैं। फेसबुक तो बिछुड़ों को मिलाने के लिए खोया-पाया विभाग की तरह हो गया है। कितने ही लोग कह उठते हैं, ‘कब के बिछुड़े हुए हम आज यहां आके मिले’। ज्यादातर रिश्ते तो हमें जन्म से ही मिलते हैं और कहते हैं कि हमारे जीवन में आने वाला हर रिश्ता भी भगवान पहले से तय करके रखता है। सिर्फ दोस्ती का ही एक रिश्ता ऐसा होता है, जिसे हम अपनी मर्जी से चुनते हैं। दोस्त की खुशी में खुश और दुख में दुखी। दोस्त ने कोई उपलब्धि हासिल की तो ऐसा लगना, जैसे खुद ने आसमान छू लिया हो। दोस्त बीमार हो तो उसके लिए दिन-रात दुआ करना और उसकी सेवा में लगे रहना। दोस्ती की ये कुछ ऐसी भावनाएं हैं, जिन्हें सिर्फ एक दोस्त दूसरे दोस्त के लिए सिर्फ कर सकता है। ‘दोस्ती का एक उसूल है मैडम...नो सॉरी नो थैंक्यू‘। ‘दोस्ती की है तो निभानी तो पड़ेगी‘। ये फिल्मी डाॅलाग दोस्ती में चार चांद लगाते हैं। 

दोस्‍ती है अनमोल!
अपने दुश्‍मन को हजार मौके दो कि वो तुम्‍हारा दोस्‍त बन जाए, और अपने दोस्‍त को एक भी ऐसा मौका ना दो कि वो तुम्‍हारा दुश्‍मन बन जाए। 
दोस्‍ती अच्‍छे से करो
बुरे दोस्‍त कोयले की तरह होते हैं। जब कोयला गर्म होता है, तो हाथ जला देता है और जब ठंडा होता है, तो हाथ काला कर देता है।
खून के रिश्‍तों जैसी...
ऊपरवाला जिन्‍हें खून रिश्‍ते में बांधना भूल जाता है, उन्‍हें दोस्‍त बनाकर अपनी गलती सुधारता है। 
दोस्‍ती की कदर जानिए...
कभी भी उसे नजरअंदाज मत करो, जो तुम्‍हारी परवाह करता है। वरना किसी दिन अहसास होगा कि तुमने पत्‍थर जमा करते-करते हीरा गंवा दिया। 
हंसाती है यारियां...
दोस्‍ती उनसे रखो, जो मुस्‍कुराते हो सदा। मुस्‍कुराने की अदाएं तुमको भी आ जाएंगी। 
हाथ मिलाते रहिए...
जिंदगी बहुत लंबी है, दोस्‍त बनाते चलो दिल ना मिले, हाथ मिलाते रहो। 
दिल से निभाओ दोस्‍ती...
एक साल में 50 मित्र बनाना आम बात है। 50 साल तक एक ही मित्र से मित्रता निभाना बड़ी खास बात है। 
ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे...

दोस्त जिंदगी है हमराज है। दोस्त है तो खुशियां हैं, शिकवे हैं, शिकायतें हैं। दोस्त न होते तो जीवन में राह कौन दिखता। दिल की बातें कौन सुनता और मन में कुछ कर दिखाने की उम्मीद कौन जगाता। वो दोस्त ही तो है जो सॉरी बोलने पर कहता है- पार्टी कब दे रहा है यार? और वो दोस्त ही तो है जिसकी एक जादू की झप्पी दिल को इस सुकून से भर देती है कि हम अकेले नहीं कोई है हमारे साथ।

कहां और कब हुई फ्रेंडशिप डे 
दोस्ती के प्रतीक के रूप में जाने वाले इस दिन की शुरुआत सन 1919 में हुई, जिसका श्रेय हॉलमार्क कार्डस के संस्थापक जॉएस हॉल को जाता है। लोग उन दिनों अपने दोस्तों को फ्रेंडशिप डे कार्ड भेजा करते थे। लेकिन व्यक्ति के जीवन में दोस्तों की अहमियत को समझते हुए और दोस्तों के प्रति आभार और सम्मान व्यक्त करने के उद्देश्य से अमेरिकी कांग्रेस ने सन 1935 में फ्रेंडशिप डे मनाने की घोषणा की। अमेरिकी कांग्रेस के इस घोषणा के बाद हर राष्ट्र में अलग-अलग दिन फ्रेंडशिप डे मनाया जाने लगा। भारत में यह हर वर्ष अगस्त माह के पहले रविवार को मनाया जाता है। 27 जुलाई, 2011 से संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस दिन को एकरूपता देने और पहले से अधिक हर्षोल्लास से मनाने के उद्देश्य से 30 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय फ्रेंडशिप डे घोषित कर दिया है। इसके जरिये जीवन में दोस्ती के महत्व को दर्शाया गया। यह माना गया कि आदमी के जीवन में दोस्ती का कोई विकल्प नहीं है। हालांकि आम तौर पर फ्रेंडशिप डे की शुरुआत 1960 के दशक में यूनाइटेड स्टेट अमेरिका से मानी जाती है। उस समय अमेरिका में राजनैतिक रैलियों से फ्रेंडशिप बैंड बांधने की परंपरा शुरू हुई थी जो अब पूरी दुनिया में फैल चुकी है और हर देश के यंग लड़के और लड़कियां फ्रेंडशिप बैंड बांधकर अपनी दोस्ती का इजहार करते है। 

युवाओं की जिम्मेदारी
जैसे भी जो भी रिश्ते हैं उनको संवारने में युवाओं की ही अहम भूमिका है। इसलिए, अगर दोस्ती के रिश्ते में मिलावट हो रही है तो उसे दूर करने में युवाओं को ही अहम भूमिका निभानी होगी। 

बदल गए दोस्ती के मायने
समय के साथ जैसे दूसरी बातों में अंतर आया है उसी तरह दोस्ती जैसे पवित्र रिश्ते में भी अंतर आ चुका है। अब दोस्ती भी सोच-समझ कर करना पड़ती है। लोग कहने के लिए दोस्त होते हैं लेकिन आप उन पर भरोसा नहीं कर सकते। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां दोस्त ही धोखा कर जाते हैं। अब दोस्त काम के वक्त बनाए जाते हैं काम निकलते ही दोस्तों को भूलने में समय भी नहीं लगता।

बदलते परिवेश में जरुरी है दोस्त 
आज के न्यूक्लियर फैमिली के दौर में हर एक दोस्त जरूरी होता है। फ्रेंडशिप डे पश्चिमी सभ्यता की सोच और मांग है जहां के एकल जीवन में अकसर दोस्तों का महत्व बेहद कम हो जाता है। फ्रेंडशिप डे यानि दोस्ती का दिन। या यूं कहें मेट्रो कल्चर के बढ़ते प्रभाव के कारण खतरे यहां भी पनपने लगे हैं अकेलेपन के और ऐसे में हर एक दोस्त जरूरी होता है। क्योंकि एक सुकोमल और गुलाबी रिश्ता है दोस्ती, छुई-मुई की नर्म पत्तियों-सा। अंगुली उठाने पर यह रिश्ता कुम्हला जाता है। इसलिए दोस्त बनाने से पहले अपने अन्तर्मन की चेतना पर विश्वास करना जरूरी है। सचाई, ईमानदारी, परस्पर समझदारी, अमिट विश्वास, पारदर्शिता, समर्पण, सम्मान जैसे श्रेष्ठ तत्व दोस्ती की पहली जरूरत है। एक सच्चा दोस्त आपके विकसित होने में सहायता करता है। उसका निश्छल प्रेम आपको पोषित करता है। जिसके साथ आप अपनी ऊर्जा व निजता बांटते हैं। 

जमाने के प्रदूषण से बचना भी है जरूरी 
दोस्ती की नवविकसित नन्ही कोंपल को जमाने के प्रदूषण से बचाना जरूरी है। तमाम उम्र इंसान को एक अच्छे दोस्त की तलाश रहती है। इसी तलाश में यह पता चलता है कि दोस्ती का एक रंग नहीं होता। अकसर अच्छी दोस्ती को शक की दीमक लग जाती है जो अन्ततः उसे खोखला कर के छोड़ती है। लाइफ में फ्रैंड्स होने से लाइफ बड़ी ही रोचक हो जाती है। यारों दोस्ती बड़ी ही हसीन है ये न हो तो क्या फिर बोलो ये जिंदगी है...। फैं्रड्स के साथ रहने से कभी टेंशन नहीं होती। दोस्त अच्छा हो बुरा हो ये मैटर नहीं करता। बस, हर एक फ्रैंड जरूरी होता है। 





(सुरेश गांधी)
Share on Google Plus

About आर्यावर्त डेस्क

एक टिप्पणी भेजें
loading...