हरितालिका तीज विशेष : पूरी होगी अमर सुहाग की कामना

सुहागनों के लिए सबसे उत्तम व्रत है हरितालिका तीज। हरतालिका तीज व्रत भगवान शिव और मां पार्वती के पुनर्मिलन के पर्व के रूप में मनाया जाता है। कहते है महादेव और मां पार्वती को अगर विधि विधान से पूजा एवं व्रत कर ली जाय तो मिल जाता है अमर सुहाग का वरदान। इस दिन शिव-पार्वती की संयुक्त उपासना से मिल जाता है अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद। मिल जाता है विवाह योग्य कन्याओं को मनचाहा वर। इसलिए हर स्त्री करती है यह व्रत 



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मौजूदा समय में पारिवारिक मतभेद बढ़ने और रिश्तों में सामंजस्य की कमी आम बात है। ऐसे में हमारे पर्व-त्योहार संबंधों की उष्मा को जीवंत बनाए रखने में अहम् भूमिका निभा रहे हैं। अपनत्व और भावनात्मक लगाव को पोषित कर रहे हैं। हरतालिका तीज का पर्व ऐसा ही त्योहार है जो पति-पत्नी के रिश्तों को सामजंस्य और समर्पण के भाव से जोड़ता है। यही वजह है कि यह त्योहार मौजूदा समय में और भी प्रासंगिक लगता है, जब परिवार बिखर रहे है और अपनों के बीच ही दूरियां पैदा हो गयी है। रिश्तों के बदलते समीकरणों के दौर में यह पर्व जुड़ाव की सीख देता है। सांझी खुशियां सहेजने का भाव पैदा करता है। तभी तो जीवन की आपाधापी को भूल महिलाएं पूरे मान-मनुहार के साथ अपने जीवन साथी के आयुष्य और मंगल की कामना करती हैं। बेशक, पति-पत्नी जीवन रुपी गाड़ी के दो पहिए हैं, जिनका संतुलित रहना और एक साथ चलना जिंदगी को गति देता है। वैवाहिक जीवन में इसी संतुलन और साथ के मायने रेखांकित करते हुए हरितालिका तीज का त्योहार एक सुंदर संयोग बनाता है। कहा जा सकता है परंपरा के निर्वहन और दाम्पत्य जीवन में प्रेम के उल्लास का पर्व है हरितालिका तीज। 


यह त्योहार उम्रभर के साथ और स्नेह की कामना करने का भाव लिए हैं। इस दिन सुहागिन स्त्रियां निर्जला व्रत रख कर शिव गौरी की पूजा करती है। अपने सुहाग की लंबी उम्र, संबंधों में प्रगाढ़ता, उनके स्वास्थ्य एवं परिवार के सुख समृद्धि का आर्शीवाद मांगती है। चूकि मां गौरी कुआरेपन में यह व्रत किया था इसलिए मनचाहा वर पाने और जीवन में मिलने वाले सुखद संसार की कामना के लिए कुआरी कन्याएं भी इस व्रत को करती है। इस व्रत को ‘हरतालिका तीज‘ इसीलिए कहते हैं, क्योंकि पार्वती की सखी उन्हें पिता के घर से ‘हर‘ कर घनघोर जंगल में ले गई थी। ‘हरत‘ अर्थात हरण करना और ‘आलिका‘ अर्थात सखी, सहेली। इस व्रत को कई जगहों पर बूढ़ी तीज तो कहीं गौरी तृतीया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष हरतालिका तीज 24 अगस्त को मनाई जाएगी। संकल्प शक्ति का प्रतीक और अखंड सौभाग्य की कामना का परम पावन व्रत हरतालिका तीज हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने वाली सुहागिन महिलाओं का सौभाग्य अखंड बना रहता है और उसे सात जन्मों तक पति का साथ मिलता है। 

यही वजह है कि तीज के पर्व का अनुष्ठान हर तरह से दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने के भावों से जुड़ा है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मां गौरी ने इसी व्रत से भगवान शिव को पति रुप में पाया था। इस दौरान मां पार्वती के तप से न सिर्फ भगवान शिव का आसन डोल गया, बल्कि धरती, आकाश और पाताल तक कंपन करने लगे थे। भगवान शिव को स्वयं पार्वती जी को वरदान देने आना पड़ा। मां पार्वती ने वर स्वरूप भगवान शिव को पति रूप में मांगा। बाद में उनका विवाह भगवान शिव के साथ संपन्न हुआ। मान्यता है कि तभी से महिलाएं मनोवांछित पति, सुखद दांपत्य जीवन एवं पति की दीर्घायु के लिए इस व्रत को करती आ रही है। कहीं-कहीं इस दिन सास अपनी बहुओं को सुहाग का सिंधारा देती हैं। मान्यता है कि इस व्रत से सुहागिन स्त्रियों के सौभाग्‍य में वृद्धि होती है और शिव-पार्वती उन्हें अखंड सौभाग्यवती रहने का वरदान देते हैं। इस दिन महिलाएं हाथों में नई चूड़ियां, मेहंदी और पैरों में अल्ता लगाती हैं और नए वस्त्र पहन कर मां पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। यह दिन स्त्रियों के लिए श्रृंगार तथा उल्लास से भरा होता है। उल्लास, आस्था और प्रेम का यह पर्व यकीनन एक सुंदर उत्सव है। जिसमें शिव-गौरी के पूजन योग्य दाम्पत्य जीवन को प्रतीक मान खुद के लिए सौभाग्य मांगा जाता है। यूं भी भगवान शंकर और माता पार्वती को जन्म-जन्मांतर का साथी माना गया है। उनके अनूठे स्नेह का नाता इतना जीवंत लगता है कि एक आम दंपत्ति के लिए भी वे प्रेरणादायी है। उनका पूजन प्रेमपगी सोच और समर्पण को अपने संसार का हिस्सा बनाने की भावना लिए होता है। 

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बरसात के इस मौसम में जब पानी की बौछारें वसुंधरा के ऊपर इठलाते इंद्रधनुषी चुनरियों के रंग एक अलग ही छटा बिखेर देते हैं। प्रकृति का यह खिला-खिला रुप रिश्तों को भी नई चमक देता है। यही वजह है कि यह पर्व प्रकृति से भी जुड़ा है। अपनों की कुशलता की कामना का भाव लिए स्त्रियां पारंपरिक तरीकों से सोलहों श्रृंगार करती हैं तथा मां पार्वती से आर्शीवाद मांगती हैं कि उनकी जिंदगी में ये रंग हमेशा हरा-भरा रहें। स्नेह और समर्पण का प्रतीक बन मिठास घोलने वाला हरितालिका तीज का त्योहार दाम्पत्य जीवन के भावनात्मक बंधन की दृढ़ता को बल देता है जो कि आज के समय की दरकार है। पौराणिक मान्यताएं है कि सावन के ठीक बाद तीज पर महादेव की पूजा दोहरे पुण्य का भागी बनाता है। वृक्षों, फसलों, नदियों तथा पशु-पक्षियों को पूजकर उनकी आराधना की जाती है। ताकि समृद्धि के ये सूचक हम पर अपनी कृपा सदैव बनाए रखें। हरियाली तीज को भी इसी कड़ी में देखा जा सकता है। पूजन के बाद महिलाएं मिलकर शिव-गौरी के सुखद वैवाहिक जीवन से जुड़े लोकगीत गाती हैं। इन लोकगीतों की मिठास समूची प्रकृति में घुली हुई सी महसूस होती है। इसके साथ ही आनंद लिया जाता है सावन के झूलों का भी। झूलों पर ऊंची-ऊंची पेंग लेती महिलाओं का उत्साह देखते ही बनता है। उत्तर भारत की स्त्रियों का यह प्रिय पर्व केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं बल्कि प्रकृति का उत्सव मनाने का भी दिन है। इस पर्व को श्रावणी तीज या कजरी तीज भी कहते हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में महिलाएं इसे भावपूर्ण तरीके से मनाती हैं। वे दिन में व्रत रखती हैं, संध्याकाल पूजन करती हैं और रात्रि जागरण के साथ इस व्रत को पूर्णता देती हैं।


तीज से ही होती है पर्वो की शुरुआत 
भारतीय परम्पराओं के अनुसार तीज को पर्वों की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। कहा गया है, ‘आ गई तीज बिखेर गई बीज, आ गई होली भर गई झोली।‘ अर्थात तीज के साथ भारतीय पर्वों का सिलसिला शुरू हो जाता है जो होली तक चलता है। असल में हर त्योहार या उत्सव को मनाने के पीछे के पारंपरिक तथा सांस्कृतिक कारणों के अलावा एक और कारण होता है, मानवीय भावनाओं का। चूंकि प्रकृति मनुष्य को जीवन देती है, जल, नभ और थल मिलकर उसके जीवन को सुंदर बनाते हैं और जीवनयापन के अनगिनत स्रोत उसे उपलब्ध करवाते हैं। इसी विश्वास और श्रद्धा के साथ प्रकृति से जुड़े तमाम त्योहार तथा दिवस मनाए जाते हैं। मेहंदी भरे हाथों की खनक तथा सुमधुर ध्वनि के साथ छनकती चूड़ियां, माहौल को संगीतमय बना देती हैं। सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन की कामना से मनाई जाने वाली तीन तीजों में से एक हरियाली तीज प्रकृति के सुंदर वरदानों के लिए उसका शुक्रिया अदा करने का भी उत्सव बन जाती है।

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सजना खातिर करती है सोलहों श्रृंगार 
इस व्रत के सुअवसर पर सौभाग्यवती स्त्रियां नए लाल वस्त्र पहनकर, मेंहदी लगाकर, सोलह श्रृंगार करती है। शुभ मुहूर्त में भगवान शिव और मां पार्वती जी की पूजा करती है। इस पूजा में शिव-पार्वती की मूर्तियों का विधिवत पूजन किया जाता है। हरितालिका तीज की कथा को सुना जाता है। माता पार्वती पर सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है। भक्तों में मान्यता है कि जो सभी पापों और सांसारिक तापों को हरने वाले हरितालिका व्रत को विधि पूर्वक करता है, उसके सौभाग्य की रक्षा स्वयं भगवान शिव करते हैं। ऐसा माना जाता है कि “तीज” नाम उस छोटे लाल कीड़े को दर्शाता है जो मानसून के मौसम में जमीन से बाहर आता है। हिन्दू कथाओं के अनुसार इसी दिन देवी पार्वती भगवान शिव के घर गयी थीं। यह पुरुष और स्त्री के रूप में उनके बंधन को दर्शाता है। 

कुंआरियों का होता है शीघ्र विवाह 
वास्तव में तीज का सम्बन्ध शीघ्र विवाह से ही है। अविवाहित कन्याओं को इस दिन उपवास रखकर गौरी की पूजा विशेष रूप से करनी चाहिए। ऐसा करने से कुंडली में कितने भी बाधक योग क्यों न हों, इस दिन की पूजा से नष्ट किये जा सकते हैं। पर इसका सम्पूर्ण लाभ तभी होगा, जब अविवाहिता इस उपाय को स्वयं करें। इस दिन, पूरे दिन उपवास रखना चाहिए। श्रृंगार करना चाहिए। श्रृंगार में मेहंदी और चूड़ियों का जरूर प्रयोग करना चाहिए। सायं काल शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और मां पार्वती की उपासना करनी चाहिए। वहां पर घी का बड़ा दीपक जलाना चाहिए। सम्भव हो तो मां पार्वती और भगवान शिव के मन्त्रों का जाप करें। पूजा खत्म होने के बाद किसी सौभाग्यवती स्त्री को सुहाग की वस्तुएं दान करनी चाहिए और उनका आशीर्वाद लेना चाहिए। इस दिन काले और सफेद वस्त्रों का प्रयोग करना वर्जित माना जाता है। हरा और लाल रंग सबसे ज्यादा शुभ होता है। 
मिलता है योग्य वर का वरदान 
हर माता-पिता का सपना होता है, समय पर बेटियों के हाथ पीले कर दें। लेकिन कभी-कभी ग्रहदोष या दूसरे कारणों से  विवाह में विलंब होने लगता है। मनचाहा वर नहीं हमल पाता है। प्रेम विवाह में रुकावटें होने लगती है। उम्र ज्यादा होने पर समस्या और भी बढ़ जाती है। ऐसे में अगर हरतालिका तीज के दिन कुआंरी कन्याएं व्रत रहकर विधि-विधान से पूजन-अर्चन करें तो वे मनचाहा जीवनसाथी पा सकती है। जबकि विवाहित महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन को और भी सुखद बना सकती है। 

पूजा विधि
हरतालिका तीज व्रत करने पर इसे छोड़ा नहीं जाता है। प्रत्येक वर्ष इस व्रत को विधि-विधान से करना चाहिए। इस दिन प्रातःकाल उठकर घर की साफ सफाई करके तिल व आंवले का उबटन लगाकर महिलाएं स्नान करती हैं। फिर ‘उमामहेश्वर सायुज्यसिद्धये हरतालिकाव्रतं करिष्ये‘ मंत्र से व्रत का संकल्प लेती हैं। तत्पश्चात् पार्वती और महादेव की प्रतिमा स्थापित कर मंत्रोच्चार के साथ उनका अभिषेक, पूजन और अर्चना करती हैं। अपने घर के मुख्य द्वार को केले के पत्तों से सजाकर पूरा दिन मां पार्वती का ध्यान रखते हुए अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। शाम को यथायोग्य दान देकर व्रत का समापन करती हैं। इस व्रत को प्रदोषकाल में किया जाता है। सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त को प्रदोषकाल कहा जाता है। यह दिन और रात के मिलन का समय होता है। पूजन के लिए भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की बालू रेत व काली मिट्टी की प्रतिमा हाथों से बनाएं। पूजा स्थल को फूलों से सजाकर एक चैकी रखें और उस चैकी पर केले के पत्ते रखकर भगवान शंकर, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद देवताओं का आह्वान करते हुए भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश का षोडशोपचार पूजन करें। सुहाग की पिटारी में सुहाग की सारी वस्तु रखकर माता पार्वती को चढ़ाना इस व्रत की मुख्य परंपरा है।  इसमें शिव जी को धोती और अंगोछा चढ़ाया जाता है। यह सुहाग सामग्री सास के चरण स्पर्श करने के बाद ब्राह्मणी और ब्राह्मण को दान देना चाहिए। इस प्रकार पूजन के बाद कथा सुनें और रात्रि जागरण करें। आरती के बाद सुबह माता पार्वती को सिंदूर चढ़ाएं व ककड़ी-हलवे का भोग लगाकर व्रत खोलें। इस व्रत को करने से पहले वाले दिन यानी द्वितीया के रोज शुद्ध शाकाहरी व्यंजनों का ही सेवन करना चाहिए और सोने से पहले दातून या मंजन करके सोना चाहिए ताकि अन्न का कोई टुकड़ा व्रत के दिन आपके मुंह में न रहे। इस व्रत को करने वाली महिलाएं सुबह चार बजे उठकर स्नानादि के बाद मन ही मन भगवान से अपने सुहाग की रक्षा की कामना करती हैं और फिर संध्याकाल में शिव-पार्वती की पूजा कर हरतालिका व्रत की कथा सुनती हैं। इस दिन भगवान शिव को गंगाजल, दही, दूध, शहद आदि से स्नान कराकर उन्हें फल समर्पित किया जाता है। इस दिन भजन कीर्तन के अलावा पूरी रात जगने का भी विधान है।

पूजन सामग्री 
पूजन के लिए - गीली काली मिट्टी या बालू रेत, बेलपत्र, शमी पत्र, केले का पत्ता, धतूरे का फल एवं फूल, अकांव का फूल, तुलसी, मंजरी, जनैव, नाडा, वस्त्र, सभी प्रकार के फल एवं फूल, फुलहरा (प्राकृतिक फूलों से सजा), मां पार्वती के लिए सुहाग सामग्री - मेहंदी, चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, माहौर, बाजार में उपलब्ध सुहाग पुड़ा आदि, श्रीफल, कलश, अबीर, चन्दन, घी-तेल, कपूर, कुमकुम, दीपक, घी, दही, शक्कर, दूध, शहद पंचामृत के लिए आदि।

ब्राह्मणों को दी जाती है श्रृंगार पेटी 
कथा श्रवण के पश्चात सुहागिन महिलाएं बाजार से लायी गयीं श्रृंगार पेटी या टोकड़ी को ब्राह्मणों के बीच दान करती हैं, जिसमें वस्त्र, आलता, बिंदी समेत शृंगार के कई सामान उपलब्ध होते हैं।  

समूहिक पूजा से बढ़ता है मेल-मिलाप 
तीज पर सामूहिक रूप से पूजन करने का एक महत्व यह भी है कि इस तरह स्त्रियां आपस में एक-दूसरे से घनिष्ठता के साथ जुड़ भी पाती हैं। तीज के दिन तीज मिलन का आयोजन भी आपसी जुड़ाव बनाने का ही एक प्रयोजन है। महिलाएं गीत गाती हैं, नृत्य करती हैं, हास-परिहास करती हैं। इस तरह वे हंसी-खुशी से तीज का उत्सव मनाती हैं। राजस्थान में तीज पर्व का विशेष महत्व है और इस दिन स्त्रियां दूर देश गए अपने पति के लौटने की कामना करती हैं। अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं। 

पौराणिक मान्यताएं 
माता पार्वती द्वारा विवाह के बाबत पूछे गए जवाब में भगवान शिव ने कहा हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इस अवधि में तुमने अन्न न खाकर केवल हवा का ही सेवन किया। तुमने सूखे पत्ते चबाकर समय काटा। माघ की शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश कर तप किया था। वैशाख की जला देने वाली गर्मी में पंचाग्नी से शरीर को तपाया। श्रावण की मुसलाधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न जल ग्रहन किए व्यतीत किया। तुम्हारी इस कष्टदायक तपस्या को देखकर तुम्हारे पिता बहुत दुःखी और नाराज होते थे। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या और पिता की नाराजगी को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता द्वारा आने का कारण पूछने पर नारदजी बोले, हे गिरिराज! मैं भगवान् विष्णु के भेजने पर यहां आया हूं। आपकी कन्या की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर वह उससे विवाह करना चाहते हैं। इस बारे में मैं आपकी राय जानना चाहता हूं। नारदजी की बात सुनकर पर्वत राज अति प्रसन्नता के साथ बोले, श्रीमान! यदि स्वंय विष्णु जी मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वह तो साक्षात ब्रह्म हैं। यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। नारदजी तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर विष्णुजी के पास गए और उन्हें विवाह तय होने का समाचार सुनाया। परंतु जब तुम्हें इस विवाह के बारे में पता चला तो तुम्हारे दुःख का ठिकाना न रहा। तुम्हें इस प्रकार से दुःखी देखकर, तुम्हारी एक सहेली ने तुम्हारे दुःख का कारण पूछने पर तुमने बताया, मैंने सच्चे मन से भगवान शिव का वरण किया है, किन्तु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी के साथ तय कर दिया है। मैं विचित्र धर्मसंकट में हूं। अब मेरे पास प्राण त्याग देने के अलावा कोई और उपाय नहीं बचा। तुम्हारी सखी बहुत ही समझदार थी। उसने कहा, प्राण छोड़ने का यहां कारण ही क्या है? संकट के समय धैर्य से काम लेना चाहिए। भारतीय नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि जिसे मन से पति रूप में एक बार वरण कर लिया, जीवन पर्यन्त उसी से निर्वाह करे। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो भगवान् भी असहाय हैं। मैं तुम्हे घनघोर वन में ले चलती हूं जो साधना थल भी है और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें ढूंढ भी नहीं पाएंगे। मुझे पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे। तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर में न पाकर बड़े चिंतित और दुःखी हुए। वह सोचने लगे कि मैंने तो विष्णुजी से अपनी पुत्री का विवाह तय कर दिया है। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर नहीं मिली तो बहुत अपमान होगा, ऐसा विचार कर पर्वतराज ने चारों ओर तुम्हारी खोज शुरू करवा दी। इधर तुम्हारी खोज होती रही उधर तुम अपनी सहेली के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन रहने लगीं। भाद्रपद तृतीय शुक्ल को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण किया। रात भर मेरी स्तुति में गीत गाकर जागरण किया। तुम्हारी इस कठोर तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन हिल उठा और मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास पहुंचा और तुमसे वर मांगने को कहा तब अपनी तपस्या के फलीभूत मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा, मैं आपको सच्चे मन से पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए। तब तथास्तु कहकर मैं कैलाश पर्वत पर लौट गया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री नदी में प्रवाहित करके अपनी सखी सहित व्रत का वरण किया। उसी समय गिरिराज अपने बंधु-बांधवों के साथ तुम्हें खोजते हुए वहां पहुंचे। तुम्हारी दशा देखकर अत्यंत दुःखी हुए और तुम्हारी इस कठोर तपस्या का कारण पूछा। तब तुमने कहा, पिताजी, मैंने अपने जीवन का अधिकांश वक्त कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या के केवल उद्देश्य महादेवजी को पति के रूप में प्राप्त करना था। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। चूंकि आप मेरा विवाह विष्णुजी से करने का निश्चय कर चुके थे, इसलिये मैं अपने आराध्य की तलाश में घर से चली गयी। अब मैं आपके साथ घर इसी शर्त पर चलूंगी कि आप मेरा विवाह महादेवजी के साथ ही करेंगे। पर्वतराज ने तुम्हारी इच्छा स्वीकार कर ली और तुम्हें घर वापस ले गए। कुछ समय बाद उन्होंने पूरे विधि-विधान के साथ हमारा विवाह किया। भगवान शिव ने आगे कहा, हे पार्वती! भाद्र पद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के परिणाम स्वरूप हम दोनों का विवाह संभव हो सका। इस व्रत का महत्त्व यह है कि मैं इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से करने वाली प्रत्येक स्त्री को मन वांछित फल देता हूं।श् भगवान् शिव ने पार्वतीजी से कहा कि इस व्रत को जो भी स्त्री पूर्ण श्रद्धा से करेगी उसे तुम्हारी तरह अचल सुहाग प्राप्त होगा।




(सुरेश गांधी)
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