साहित्यिक चोरी मामले में बिहार CM नीतीश कुमार पर 20 हजार रुपये का जुर्माना

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हाईकोर्ट ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार साहित्यिक चोरी मामले में राहत देने से इंकार कर दिया। अदालत ने नीतिश कुमार के उस आवेदन को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने अपना नाम पक्षकारों से हटाने का आग्रह किया था। अदालत ने उन पर 20 हजार रुपये जुर्माना भी किया है। जेएनयू के पूर्व शोधकर्ता व राजनेता ने उसके शोध की चोरी कर किताब छापने का आरोप लगाया है।  संयुक्त रजिस्ट्रार संजीव अग्रवाल ने अर्जी खारिज करते हुये कहा यह कानून का दुरुपयोग है। याची को नीतीश कुमार को इस मामले में पक्षकार बनाने का पूरा अधिकार है। नीतीश कुमार की दलीलों को खारिज करते हुये मामले में गवाही शुरु करने का निर्देश दिया गया है। संयुक्त रजिस्ट्रार ने नीतीश कुमार का दलीलें खारिज करते हुये इस बात पर गौर किया कि याची के शोधकर्ता के दो सुपरवाइजर ने उसके शोध कार्य को मूल कार्य बताया था और किताब के विमोचन से एक दिन पहले 14 मई 2009 को जारी किया था। इसके मद्देनजर याची को नीतीश कुमार पर मुकदमा करने का पूरा अधिकार है। 


जेएनयू के पूर्व शोधकर्ता व लोकसभा का चुनाव लड़ चुके अतुल कुमार सिंह ने याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उनके शोध कार्य को नकल कर पटना स्थित एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एडीआरआई) के सदस्य सचिव शेबल गुप्ता ने किताब के रूप में छापा और इस किताब को नीतीश कुमार ने अनुलेखित किया था।  दूसरी ओर नीतीश कुमार ने अपनी अर्जी में कहा कि उनका किसी दूसरे प्रतिवादी या स्पेशल कैटेगरी स्टेटस: ए केस फॉर बिहार नामक पुस्तक से कोई भी प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध नहीं है। इस किताब को उन्होंने केवल अनुलेखित किया है न कि उसे लिखा है। इसलिये उनके खिलाफ इस सिलसिले में कोई मामला नहीं बनता। उन्हें केवल बदनाम करने की मंशा से याचिका में प्रतिवादी बनाया गया है। याची ने नीतीश कुमार समेत अन्य प्रतिवादियों शेबल गुप्ता, एडीआरआई व उसकी सहायाक संस्था सेंटर फॉर इकोनोमिक पोलिसी एंड पब्लिक फाइनेंस से 25 लाख हर्जाने की मांग की है। पेश याचिका में जेएनयू में 2006 से 2010 की अवधि में चीफ प्रोक्टर को पक्ष बनाया गया है। उनकी ओर से पेश अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा व कुशल कुमार ने कहा कि अतुल कुमार सिंह 2013 में जेएनयू में शोधकर्ता थे। इसलिये अब इस मामले से जेएनयू का कोई लेना देना नहीं है।
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