बिहार : केंद्र सरकार से दलित क्रिश्चियनों को संवैधानिक अधिकार देने का आग्रह

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पटना। साम्प्रदायिक कार्ड खेलने वाली सरकार केंद्र में है। इस सरकार राज्य सभा और लोक सभा में बहुमत प्राप्त है। इस परिस्थिति में सुप्रीम कोर्ट ने दलित क्रिश्चियन को एससी के तहत आरक्षण दिए जाने को लेकर केंद्र सरकार से एक बार फिर जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि दलित क्रिश्चियन को एससी कोटा के तहत आरक्षण क्यों नहीं दिया जाना चाहिए। अदालत ने दलित क्रिश्चियन की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार से जवाब की मांग की है। दलित क्रिश्चियनों ने हिंदू, सिख और बौद्ध समाज के लोगों को दिए जाने वाले एससी के तहत आरक्षण की तरह रिजर्वेशन की मांग की है। 21 अगस्त को चीफ जस्टिस जेएस खेहर और डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने केंद्र को इस संबंध में नोटिस जारी किया। ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन (एआइसीयू) ने अदालत में संविधान (एससी) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका दाखिल की थी। इस पैरा में कहा गया है कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से अलग लोगों को एससी के तहत नहीं माना जाएगा। न्यायालय के समक्ष यह एक लंबे समय से जारी मुद्दा है, जिस पर एक संवैधानिक पीठ का फैसला होना चाहिए। याचिका ने अनुसूचित जाति वर्ग में दलित क्रिश्चियन को संविधान के तहत आरक्षण का लाभ प्राप्त करने योग्य की मांग की है।


पृष्ठभूमिः
यह मामला भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लाया गया है जहां एक दशक से भी ज्यादा समय से लटका हुआ है। इसे संवैधानिक पीठ को स्थानांतरित कर दिया गया है, जिसे अभी स्थापित किया जाना बाकी है। सरकार ने अभी तक अपना विचार कोर्ट को नहीं बताया है। 26 नवंबर2014 को संविधान दिवस चर्चा में वित्र मंत्री अरूण जेटली ने इसी श्रेणी के मुसलमानों और ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के खिलाफ जोरदार बहस की। इस सरकार के एक वरिष्ठ सदस्य का यह रुख 2009 में संसद में पेश किए गए भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर रंगनाथ मिश्रा राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट की सिफारिशों (2007) के समक्ष चुनौती है। इससे दलित क्रिश्चियनों और पिछड़े मुस्लिमों के न्याय के लिए लंबे समय से चलने वाले आंदोलन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। संवैधानिक आदेश, 1950, के अंश को कम्यूनल कम्बैट द्वारा अप्रैल 2010 में प्रकाशित किया गया था। पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा की रिपोर्ट अदालत के समक्ष महत्वपूर्ण साक्ष्य है, और धार्मिक अल्पसंख्यकों ने इससे बहुत उम्मीद की है। संसद में 18 दिसंबर, 2009 को पेश की गई मिश्रा पैनल रिपोर्ट ने धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को पिछड़े वर्गों के रूप में परिभाषित किया है और नौकरी, शिक्षा और कल्याणकारी योजनाओं में सभी अल्पसंख्यकों के लिए 15 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की है। आईएएनएस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का तब (2009) 1.2 अरब आबादी थी और अल्पसंख्यकों में मुस्लिम सबसे अधिक जो करीब 14 प्रतिशत थी। इसके बाद ईसाइयों की आबादी 2.3 प्रतिशत, सिखों की 1.9 प्रतिशत, बौद्धों की 0.8 प्रतिशत, जैनों की 0.4 प्रतिशत और पारसी सहित अन्य की आबादी 0.6 प्रतिशत थी। रिपोर्ट के अनुसार "संस्थानों में अनुशंसित 15 प्रतिशत निर्धारित सीटों पर मुसलमानों के लिए 10 प्रतिशत और अन्य अल्पसंख्यकों के लिए शेष 5 प्रतिशत होना चाहिए।" 

आयोग ने अन्य बातों के साथ शिक्षा, सरकारी नौकरी और सामाजिक कल्याण योजनाओं में पिछड़े वर्ग के कोटा के तहत अल्पसंख्यकों को 15 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए सिफारिशें की। इस 15 प्रतिशत आरक्षण में से मुस्लिम समुदाय के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की गई है और शेष 5 प्रतिशत अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लिए। आयोग ने अनुसूचित जातियों की सूची में दलित ईसाई और दलित मुसलमानों को शामिल करने की सिफारिश की। राजनीतिक रूप से भाजपा और आरएसएस के लिए, इसमें दलितों को शामिल करते हुए, मुख्य मुद्दा चुनाव राजनीति में प्रतिनिधित्व का है। एक बार अगर दलित मुसलमानों और दलित ईसाईयों को आरक्षण दे दिया जाता है और वे इस श्रेणी में आरक्षण का लाभ लेते हैं तो वे ग्राम पंचायतों से लोकसभा तक वे इस श्रेणी में चुनाव लड़ने के पात्र होंगे। अगर सरकार रामनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करती है, तो ईसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने के पात्र हो जाएंगे। बताते चले कि पटना महाधर्मप्रांत के महाधर्माध्यक्ष  बी.जे.ओस्ता और विकर जेनरल फादर मैथ्यू उज्जुथल ने दलित क्रिश्चियनों को भी एसटी की तरह व्यवहार कर आरक्षण सुविधा देने की मांग करते रहे। इन दोनों का निधन हो जाने के बाद मांग पर ब्रेक लग गया।  जबकि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्यों न दलित क्रिश्चियनों को आरक्षण दिया जाये। इस समय ईसाई समुदाय के लोग बीजेपी का दामन थामे हैं। पटना से राजन साह और बेतिया  से रवि माइकल को चाहिये बीजेपी के नेतृत्व करने वालों को पत्र लिखकर दलित क्रिश्चियनों को संवैधानिक अधिकार दिलवा दें।

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