देश सेवा ही एक भारत, श्रेष्ठ भारत की कल्पना को साकार कर सकता है : ठाकुर श्याम सुन्दर सिंह

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दुमका (अमरेन्द्र सुमन) जो बाहर से कड़क अथवा कठोर दिखता हो, जरुरी नहीं कि अन्दर से भी वह वैसा ही हो। यहाँ बात हो रही है एक ऐसे इंसान की जो बाहर से दिखता तो है कठोर, किन्तु अन्दर से वह उतना ही संवेदनशील, मर्मस्पर्शी व परोपकारी है। दीन-दुखियों को देखकर जिसका ह्नदय क्षण भर में ही पिघल जाता है। जो किसी को रोते-विलखते नहीं देख सकता। चाहे औरत हो, मर्द अथवा बच्चे। दरबार में जो भी पहुँच जाए, उसकी खातिरदारी करना वे भूलते नहीं। हर संभव मदद के लिये वे रहते हैं तैयार। धर्म-जाति, उँच-नीच, अमीरी-गरीबी, बाहरी-भीतरी के भेदभाव से कोसों दूर उनकी अपनी एक दुनिया है। बाहरी आडंबर, प्रचार-प्रसार व लोकप्रियता की वर्तमान परिभाषा से इतर हर व्यक्ति का सम्मान, उनका संस्कार बन चुका है। यह दिगर बात है कि धोखेबाजों, मक्कारों व भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध उनकी लड़ाई सदैव चलती रहती है। लीक से हटकर काम करने की उनकी इन्हीं सोंच का परिणाम है कि उप राजधानी दुमका सहित संताल परगना प्रमण्डल के अन्य जिलों व प0 बंगाल के सिउड़ी, वर्द्धमान, कोलकाता तक अधिकांश लोग ठाकुर साहब को आदर, सम्मान के भाव से देखते हैं। भीष्म पितामह की तरह अविवाहित जीवन जीने का संकल्प मन में पाले ठाकुर श्याम सुन्दर सिंह का अधिकांश समय अपने इलाके के गरीब-गुरुबों की समस्याओं के निराकरण में ही व्यतीत हो जाता है। वे मानते हैं, ईश्वर ने पृथ्वी पर मानव को पहले एक इंसान बना कर भेजा है। अपने-अपने स्वार्थ के वशीभूत लोगों ने धर्म के आधार पर इस धरती पर खुद को अलग कर लिया है। ठाकुर श्याम सुन्दर सिंह कहते हैं-न तो कोई उनका अपना है, और न ही कोई पराया। वे सबके लिये हैं और सब उनके लिये है। उनका मानना है, मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। शादी-ब्याह का मामला हो या फिर कोई गंभीर बीमारी का। केस-मुकदमा की बात हो या फिर घर-परिवार के आपसी झगड़ों का। जहाँ तक पहुँच है, लोगों की सेवा व सहयोग के लिये वे हमेशा तत्पर दिखते हैं। वर्तमान समय में जबकि अधिक से अधिक धन कमाने की लालसा में लोग पागल हुआ जा रहा, अब तक ठाकुर श्याम सुन्दर सिंह ने न तो पैसे संचय का कोई ख्वाब देखा और न ही आलिशान महल में विलासिता पूर्वक जीवन जीने का सपना ही पाला। बचपन से ही घर-परिवार के वातावरण से अलग हटकर एक होटल के छोटे से कमरे में अपने जीवन का बहुमूल्य समय व्यतीत कर दिया। कहने वाले तो उन्हें  मसीहा तक कह डालते हैं। ठाकुर श्याम सुन्दर सिंह के शब्दों में- जब भी कोई इंसान उनके करीब आता है उन्हें इस बात की जानकारी हो जाती है कि उसकी मंशा क्या है, वह क्या चाहता है। कुलकुली डंगाल में पत्थर खनन व्यवसाय से जुड़े ठाकुर श्याम सुन्दर सिंह अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा वैसे गरीब, जरुरतमंद लोगांे के हिस्से कर जाते हैं जो घर, परिवार व समाज से ठुकराए हुए होते हैं। जिन्हें देखने वाला कोई नहीं होता। शिकारीपाड़ा प्रखण्ड के संताल-पहाड़िया, अल्पसंख्यक व पिछड़ी जाति बहुल इलाकों के लोग ठाकुर साहब को मरांग बाबा अथवा भगवान का अवतार ही मानते हैं। अपनी बात समाप्त करते हुए ठाकुर साहब कहते हैं-इस जन्म में रखा ही क्या है, उपर वाले ने एक इंसान को जितनी उम्र  बख्शी है, पूरी स्वच्छता, सहजता व सहृदयता के साथ दूसरों की भलाई में उसे व्यतीत कर देना चाहिए। राष्ट्रीयता की भावना के साथ राष्ट्र निर्माण की दिशा में बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ते रहने का नाम ही भारत है। एक भारत, श्रेष्ठ भारत की कल्पना तभी साकार हो सकती है। 

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