देश का 33 फीसदी भू-भाग होगा वनाच्छादित : हर्षवर्द्धन

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नयी दिल्ली 12 सितंबर, केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री डॉक्टर हर्षवर्द्धन ने आज कहा कि सरकार देश के 33 प्रतिशत भू-भाग को वनाच्छादित करने तथा तीन अरब टन का अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, श्री हर्षवर्द्धन ने आज यहां ‘टिकाऊ भू और वन पारिस्थितिकी तंत्र : सिद्धांत से क्रियान्वयन तक’ विषय पर दो दिवसीय सम्मेलन के उद्घाटन के अवसर पर बोल रहे थे। उन्होंने इस अवसर पर वनों के महत्व को रेखांकित करते हुये कहा कि यह जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने तथा जैव विविधता को संरक्षित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं इसलिए इनका संरक्षण सबकी जिम्मेदारी है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सरकार देश के वन क्षेत्र को मौजूदा 24 फीसदी से बढ़ाकर 33 फीसदी करने के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही ढाई से तीन अरब टन का अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाने की तैयारी में भी है। यह काम वृक्षारोपण के विभिन्न सुनियोजित प्रयासों से पूरा किया जायेगा। उन्हाेंने इसके लिए लोगों और विशेषज्ञों से अभिनव सोच के साथ आगे आने की अपील करते हुये कहा कि नवोन्मेषण आज के वक्त का सबसे बड़ा तकाजा है। उन्हाेंने विकास से जुड़ी गतिविधियों और पर्यावरण सरंक्षण के बीच बेहतर संतुलन बनाये जाने की वकालत करते हुए सम्मेलन में उपस्थित वैज्ञानिकों और वन विशेषज्ञों से खर-पतवार की समस्या के समाधान के लिए नये तरीके ईजाद करने का अनुरोध किया। पर्यावरण मंत्री ने वनों को भारतीय परंपरा और संस्कृति का अभिन्न अंग बताते हुए कहा कि यही वजह है कि भारत बड़ी आबादी के बोझ के बावजूद आज भी अपनी वन संपदा को काफी हद तक बचाये रखने में सफल रहा है। उन्होंने इस अवसर पर वनों के संरक्षण तथा वन संसाधनों के न्यायसंगत इस्तेमाल के वास्ते जागरुकता पैदा करने के लिए ‘वुड इज गुड’ अभियान का शुभारंभ भी किया और कहा कि लकड़ी पर्यावरण के लिहाज से सुरक्षित होने के साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा का स्रोत भी है जो अपने पीछे कोई भी कार्बन फुट प्रिंट नहीं छोड़ता। अमेरिका की ‘एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट’ द्वारा संचालित कार्यक्रम फॉरेस्ट प्लस भारत सरकार के वन और पर्यावरण मंत्रालय को वनों के सरंक्षण के प्रयासों में मदद दे रहा है। इसका मूल उद्देश्य भारत सरकार को वन संपदा प्रबंधन के लिए ऐसी तकनीकी मदद मुहैया करानी है जाे उसे एक ऐसी अर्थव्यवस्था निर्मित करने में मदद कर सके जो कम कार्बन उत्सर्जित करने वाली हो और जिससे वनों की सेहत तथा जैव विविधता को बेहतर तरीके से संरक्षित किया जा सके।

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