बिहार में बाढ़ से अरबों का हुआ नुकसान, राष्ट्रीय आपदा घोषित करे सरकार: माले

बाढ़ रोकथाम में सरकार ने दिखाई आपराधिक लापरवाही, जल संसाधन विकास मंत्री इस्तीफा दें. बाढ़ राहत कार्य में लगायी गयी शत्र्तों को वापस ले सरकार, दलित-गरीबों-अकलियतों से भेदभाव बर्दाश्त नहीं. सभी बाढ़ पीड़ितों को अविलंब 100 दिन की अग्रिम मजदूरी व 15 हजार रु. दे सरकार. 15 हजार रु. प्रति एकड़ की दर से सभी किसानों को फसल मुआवजा भी मिले. गरीबों के लिए पक्के मकान की व्यवस्था करे. सरकार की लालफीताशाही के खिलाफ 9 सितंबर को उत्तर बिहार में पश्चिम चंपारण से किशनगंज तक एनएच किया जाएगा जाम.



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पटना 1 सितंबर, पिछले एक महीने से संपूर्ण उत्तर बिहार में प्रलयंकारी बाढ़ की बर्बादी-तबाही मची हुई है. अब तक सैकड़ो लोग मारे गये हैं, हजारो पशुधन मारे गये हैं, गरीबों का सारा अनाज बर्बाद हो गया है, झोपड़िया दह-बह गयी हैं तथा अब गांव-गांव में भूखमरी है, चूल्हे नहीं जल रहे, चारा के अभाव में मवेशियों की लगातार मौत हो रही है. लगभग बिहार के 19 जिलों में लोगों का जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है, बल्कि उसे नए सिरे से आरंभ करने की चुनौती है. इसलिए इस विपदा को अविलंब राष्ट्रीय आपदा घोषित करना चाहिए और युद्ध स्तर पर राहत अभियान चलाये जाने की जरूरत है. लेकिन यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के प्रधानमंत्री महज 500 करोड़ की सहायता की घोषणा करके अपने दायित्व से मुक्ति पा ली है. यह बिहार की जनता से घोर मजाक है. बिहार में बाढ़ का प्रकोप हर साल आता है. लेकिन पहले की तरह इस बार भी बिहार सरकार का जल संसाधन विभाग निष्क्रिय बना रहा. तटबंधों व नदियों के रखरखाव में घोर उपेक्षा बरती गयी है. इसके बावजूद जल संसाधन विकास मंत्री बयान दे रहे हैं कि चूंकि नहरों पर किसान बस गये हैं और वे अनाज का ढेर लगाते हैं, इसलिए चूहे भी बड़ी संख्या में पैदा हो गये हैं, और इन्हीं चूहों ने तटबंध की मिट्टी खोद दी, जिसकी वजह से बाढ़ आया. यह बयान बेहद शर्मनाक है. मंत्री महोदय यह नहीं बताते कि कटाव स्थलों पर कहीं भूल से भी बालू बैग अथवा तटबंध बचाने के लिए अन्य कोई सामान नहीं था. ऐसे गैर जिम्मेवराना वक्तव्य के लिए जल संसाधन विकास मंत्री को अविलंब उनके पद से हटा देना चाहिए. यह सरकार की आपराधिक लापरवाही का नतीजा है कि बाढ़ की वजह से व्यापक पैमाने पर नुकसान हुआ है.

इस बार का बाढ़ पहले से भिन्न स्वरूप का है. नदियों ने तटबंधों को बराज से काफी पहलेे तोड़ा, इसलिए बाढ़ का पानी नए-नए इलाकों में फैला. बाढ़ से बड़ा इलाका पूरी तरह प्रभावित हुआ. नेपाल में भारी बारिश व तबाही हुई. संभवतः यह हिमालय में आए किसी परिवर्तन की वजह से हो रहा है. भारत सरकार को चाहिए कि नेपाल के साथ मिलकर संयुक्त अध्ययन दल गठित करके आ रहे इस बदलाव का अध्ययन करे और बाढ़ का स्थायी समाधान निकाले. यह बेहद हास्यास्पद है कि सांइस और टेक्नोलाॅजी के जमाने में भी हम बाढ़ का पूर्वानुमान लगाने में असफल साबित हो रहे हैं. बाढ़ राहत के लिए सरकार ने आधारभूत संरचनाओं को आधार बनाया है. इस आधार पर बाढ़ से हुए नुकसान का सही आकलन नहीं हो सकता. इसमें पशुधन सहित कई चीजों को शामिल नहीं किया जा रहा है. व्यापक पैमाने पर अनाज का नुकसान हुआ है. इसलिए नुकसान का मुआइना व्यक्ति अथवा परिवार के आधार पर किया जाना चाहिए. राहत अभियान के लिए गठित टीमें दलित-गरीबों व अकलियत समुदाय के साथ भेदभाव भी बरत रही है. जो कुछ भी राहत अभियान चल रहा है, वह जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा है. इसलिए हमारी मांग है कि पहले की तरह सर्वदलीय अनुश्रवण टीम का गांव-गांव में गठन किया जाए और यही टीम लाभार्थियों की सूची बनाए तथा राहत सामग्री पहुंचाने की गारंटी करे. पंचायत स्तर पर सर्वदलीय अनुश्रवण की जो व्यवस्था वर्षों से कार्यरत थी उसे सरकार ने ध्वस्त करने का काम किया है और उसकी जगह ब्यूराक्रेसी के सिस्टम को खड़ा कर रही है. 


सरकार ने कहा था कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को बकरीद तक आवश्यक मात्रा में राहत सामग्री मिल जाएगी, लेकिन जमीन पर कहीं भी ऐसा नहीं हो रहा है. सरकार की जो लालफीताशाही है, उसकी वजह से दशहरे तक भी लोगों को राहत मिल जाए, इसकी उम्मीद कम ही है. बाढ़ की गंभीरता को देखते हुए तमाम गरीबों-मजदूरों के लिए मनरेगा की 3 महीने की अग्रिम मजदूरी, 3 माह का राशन व 15 हजार रु. उपलब्ध कराना चाहिए. हम बटाईदार किसानों सहित सभी किसानों के लिए 15 हजार रु. प्रति एकड़ फसल मुआवजे की भी मांग करते हैं. पशुधन क्षति का भी मुआवजा दिया जाना चाहिए और चारे की मुकम्मल व्यवस्था का ठोस इंतजाम करना चाहिए. यह देखने में आया कि पश्चिम चंपारण से लेकर किशनगंज तक जो बिहार का बोर्डर इलाका है, वहां बेहद गरीबी है. जिन लोगों के पास पक्का मकान था, वे तो किसी प्रकार बच गये और अपने सामान को भी बचा लिया. लेकिन जिनकी झोपड़ियां थीं, उनका सबकुछ बर्बाद हो गया. न तो वे अपनी जिंदगी बचा सके न अपना अनाज. इसलिए तमाम गरीबों के लिए पक्के मकान का इंतजाम किया जाना चाहिए. राहत अभियान में सरकार ने कई तरह की शर्तें थोप रखी हैं, जो दिखलाती है कि सरकार का असली इरादा क्या है? आधार कार्ड, बैंक खाता आदि की अनिवार्यता को समाप्त किया जाना चाहिए, क्योंकि इस बाढ़ में लोग ये सब कहां से लायेंगे. उसकी जगह वोटर लिस्ट के आधार पर चूल्हा को आधार बनाकर राहत अभियान चलाया जाना चाहिए. सरकार बाढ़ पीड़ितो को या तो कैश दे अथवा बियरर चेक जारी करे. इन मांगों से संबंधी एक मांग पत्र जल्द ही बिहार सरकार को सौंपा जाएगा और इस पर त्वरित कार्रवाई की मांग की जाएगी. यदि सरकार ऐसा नहीं करती है तो आगामी 9 सितंबर को प. चंपारण से किशनगंज तक एनएच को हम जाम करेंगे. बाढ़ पीड़ितों के राहत व अधिकार के लिए भाकपा-माले संपूर्ण बिहार में तत्परता से उतरी हुई है. राज्य स्तर पर भी राहत अभियान चलाया गया. हमारी पार्टी ने बाढ़ पीड़ितों के लिए 461694 रु. जमा किए हैं, जिसे जरूरतमंदों के पास अविलंब भेजा जा रहा है.
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