विशेष : अनीता की आत्महत्या का सबब

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तमिलनाडु में एक मजदूर की बेटी अनीता ने मेडिकल कॉलेज में दाखिला न मिलने के कारण आत्महत्या कर ली। सरकार की अतिश्योक्तिपूर्ण नीति की शिकार अनीता की ‘खुदकुशी’ की खबर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर के साथ मोदी सरकार की ओर से घोषित ‘नारी शक्ति पुरस्कार-2017’ का विज्ञापन एक ही दिन दुनिया के सामने था..! कितनी विडम्बना है कि जिस देश में हम ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा बुलन्द करते हुए एक जोरदार मुहिम चला रहे हैं उस देश में हम एक प्रतिभा सम्पन्न बेटी की जिन्दगी को इसलिये नहीं बचा सके क्योंकि सरकार की नीति उसकी पढ़ाई में बाधक बन गयी। युवा सपनों का टूटना-बिखरना तो आम बात है लेकिन एक दलित बालिका के पढाई का सपना उसकी मौत का कारण बनना सरकार ही नहीं सम्पूर्ण राष्ट्रीयता पर एक बदनुमा दाग है। यह दाग ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के संकल्प पर भी लगा है। 


अनीता की आत्महत्या न केवल हमारी शिक्षा प्रणाली पर सवाल खड़े किये है बल्कि सरकार की नीतियों की पोल भी खोल दी है। खड़े हुए ज्वलंत सवालों में प्रमुख सवाल यह भी है कि यह कौन सी शिक्षा व्यवस्था है जिसमें अनीता को एक बोर्ड में इतने अच्छे नंबर आते हैं कि वो उस लिहाज से हर मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के लिए योग्य थी, लेकिन महज सिलेबस और नियमों में बदलाव से वह ‘अयोग्य’ हो गई. और उसके सपने ही नहीं टूटे बल्कि जीवन की सांसें भी शांत हो गयी। सवाल सरकार से यह भी पूछा जाना चाहिए कि जब 12वीं का सिलेबस हर राज्य के छात्रों के लिए अलग-अलग है तो ‘नीट’ की परीक्षा सिर्फ सीबीएसई बोर्ड के सिलेबस के ही अनुसार क्यों? क्या यह जानबूझकर राज्य शिक्षा बोर्ड्स से पढ़ने वाले स्टूडेंट्स के साथ किया जाने वाला अन्याय नहीं है? यह सर्वमान्य और सर्वज्ञात तथ्य है कि राज्य बोर्ड्स में पढ़ने वाले अधिकतर स्टूडेंट्स गरीब और कमजोर तबके से आते हैं. ‘नीट’ जैसे नियम इन छात्रों को मेडिकल जैसे प्रतिष्ठित कोर्सेज में एडमिशन लेने से रोकते हैं। अनीता के साथ भी यही हुआ। इस मामले में अनीता के पिता ने सवाल उठाया है कि आखिर मेरी बेटी का क्या दोष था? आखिर उसने यह कदम क्यों उठाया? इन सारे सवालों का अब जवाब कौन देगा? अनीता के पिता ने कहा, “अनिता ने हर मुश्किलों का सामने करते हुए पढ़ाई की। वह नीट को लेकर चिंतित थी। उसने क्या गलत किया था, इसका जवाब कौन देगा?” मुख्यमंत्री पलानीसामी द्वारा दी गई 7 लाख की सहायता राशि उनके परिवारवालों के भी जीवनभर आंसू नहीं रोक पाएगी। निर्धन मेधावी छात्रों को निःशुल्क कोचिंग के लिए भी संस्थानों को आगे आना होगा। सरकार की नीतियां एवं प्रक्रियाएं तो इतनी उलझनभरी होती हैं कि लाभ की खुशी कम और उलझनों के आंसू अधिक होते हैं।

यह सरकार की विडम्बनापूर्ण सोच एवं नीति ही है कि वह यह इच्छा रखती है कि छात्र दो तरह के सिलेबस में महारत हासिल करे, तभी उसका डॉक्टर बनने का सपना पूरा होगा। यह कैसी व्यवस्था है जिसमें सरकार जो करें वो ही सही हो। एक आदर्श शासन व्यवस्था वह होती है जिसमें कम से कम कानून हो और जीवन विकास के रास्ते सुगम हो। अनीता के मौत की वजह हमारी व्यवस्था द्वारा बनाए गए उटपटांग नियम हैं। इस तरह के नियमों को बदले बिना अनीता जैसे पिछडे़ एवं दलित मेधावी छात्र-छात्राओं को बचाना नामुमकिन ही है। अनीता ने मजदूर-गरीब की बेटी होकर अपने हक की लड़ाई लड़ी। उसने देश की शीर्ष अदालत में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नीट) के खिलाफ लड़ाई लड़ी लेकिन फैसला उसके अनुरूप नहीं था। अनीता इसलिए परेशान थी कि उसने 12वीं कक्षा में 1200 में से 1176 अंक हासिल किए थे। गणित और विज्ञान में उसके 100 फीसदी अंक थे। वह डाक्टर बनना चाहती थी ताकि दूसरों को जीवनदान दे सके, मरीजों की सेवा कर सके लेकिन लोगों के जीवनदान देने के अपने सपने को पूरा होते हुए दिखाई न देने पर उसने खुद के जीवन को ही समाप्त कर दिया और पंखे से लटककर युवा सपनों का क्या हश्र होता है, उसकी वीभत्सता को उजागर कर दिया।  

नया भारत निर्मित करते हुए हम युवा पीढ़ी से अपेक्षा करते हैं कि वे सपने देखें है, हमारी युवापीढ़ी सपने देखती भी है, वह अक्सर एक कदम आगे का सोचती है, इसी नए के प्रति उनके आग्रह में छिपा होता है विकास का रहस्य। कल्पनाओं की छलांग या दिवास्वप्न के बिना हम संभावनाओं के बंद बैग को कैसे खंगाल सकते हैं? सपने देखना एक खुशगवार तरीके से भविष्य की दिशा तय करना ही तो है। किसी भी युवा मन के सपनों की विविधता या विस्तार उसके महान या सफल होने का दिशा-सूचक है। स्वप्न हर युवा मन संजोता है। यह बहुत आवश्यक है। खुली आंखों के सपने जो हमें अपने लक्ष्य का गूढ़ नक्शा देते हैं। लेकिन सरकार की नीतियां इन युवा सपनों को क्या सचमुच पंख लगाना चाहती है या अन्य राजनीतिक दांवों की भांति उनकी सच्चाई दूसरी ही होती है? नीट परीक्षा ‘एक राष्ट्र एक परीक्षा’ के प्रारूप पर आधारित है। यह एक अच्छा कदम हो सकता है लेकिन देशभर में पाठ्यक्रम भी समान होना चाहिए। अनीता ने सुप्रीम कोर्ट में यह भी सवाल उठाया था कि नीट परीक्षा ग्रामीण इलाकों के छात्रों के साथ न्याय नहीं करती। अब तमिलनाडु में अनीता की आत्महत्या को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। अनीता को दलित छात्रा बताकर तूफान खड़ा किया जा रहा है। हैदराबाद यूनिवर्सिटी के पीएचडी छात्र रोहित वेमुला के आत्महत्या करने के बाद भी खूब राजनीति हुई थी। वह दलित था, नहीं था इस पर जोरदार बहस हुई थी। कुछ लोग मोदी सरकार की आलोचना करने में लग गए हैं कि यह सरकार दलितों, वंचितों तक शिक्षा पहुंचाने के खिलाफ है। छात्र सड़कों पर आकर प्रदर्शन करने लगे हैं। काश! हम रोहित वेमुला हो या अनीता- उन्हें एक छात्र के रूप में देखा होता। काश! यह पता लगाने की कोशिश होती कि आखिर ऐसे कौन से कारण हैं कि छात्र आत्महत्याएं कर रहे हैं। रोहित और अनीता ही नहीं, कई अन्य छात्र भी आत्महत्याएं कर चुके हैं। छात्र-छात्राओं का आत्महत्या करना और वह भी शिक्षा के नाम पर बेहद गंभीर स्थिति है, त्रासदी से कम नहीं है।


एथेंस के शासकों को सुकरात का इसलिए भय था कि वह नवयुवकों के दिमाग में अच्छे विचारों के बीज बानेे की क्षमता रखता था। लम्बे समय तक इस सोच का सर्वथा अभाव रहा। इस पीढ़ी में उर्वर दिमागों की कमी नहीं है मगर उनके दिलो दिमाग में विचारों के बीज पल्लवित कराने वालेे ‘सुकरात’ जैसे लोग दिनोंदिन घटते जा रहे हैं। कला, संगीत और साहित्य के क्षेत्र में भी ऐसे कितने लोग हैं, जो नई प्रतिभाओं को उभारने के लिए ईमानदारी से प्रयास करते हैं? हेनरी मिलर ने एक बार कहा था- ‘‘मैं जमीन से उगने वाले हर तिनके को नमन करता हूं। इसी प्रकार मुझे हर नवयुवक में वटवृक्ष बनने की क्षमता नजर आती है।’’ हमारे देश में कुछ लोगों का कहना है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी युवापीढ़ी को अपने साथ ले चलने में समर्थ है। उनकी यह क्षमता दूसरी पार्टियों के लिय भय का कारण बनी। लेकिन अनीता की मौत ने इन स्थितियों को धुंधलाया है। महादेवी वर्मा के शब्दों में ‘‘बलवान राष्ट्र वही होता है जिसकी तरुणाई सबल होती है।’’ जिसमें मृत्यु का वरण करने की क्षमता होती है, जिसमें भविष्य के सपने होते हैं और कुछ कर गुजरने का जज्बा होता है, वही तरुणाई है। हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां हैं, जो इस पीढ़ी को उनके सपने पूरे करने में बाधक बन रही है। कहीं सम्पूर्ण युवापीढ़ी और उनके सपने राजनीति स्वार्थ पूर्ति के हथियार मात्र तो नहीं है?

आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, यह जीवन से पलायन है। लेकिन आत्महत्या के निर्णय का कारण जो स्थितियां बनती है, वे भी उस समाज एवं शासन व्यवस्था की सबसे बड़ी नाकामी का प्रतीक होती है। अनीता ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठायी, काफी विरोध भी किया, संघर्ष करते हुए वह हार गयी, तब उसने आत्महत्या का कदम उठाया। यह कदम अमानवीय या कानून विरोधी है, लेकिन इसका कारण दोषपूर्ण नीतियां एवं शासन व्यवस्था है, जिसे सुधारे बिना छात्र-छात्राओं की आत्महत्याओं को नहीं रोका जा सकता।



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- ललित गर्ग-
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